सा विद्या या विमुक्तये
– वासुदेव प्रजापति आज शिक्षा क्षेत्र में औपचारिक और अनौपचारिक शब्दों का प्रयोग बहुत होता है, किन्तु इन दोनों शब्दों के सही अर्थ के बारे…
– वासुदेव प्रजापति जिस समाज में जितने अधिक शिक्षित व्यक्ति होते हैं, वह समाज उतना ही अधिक विकसित होता है। एक शिक्षित व्यक्ति अपनी भाषा…
– वासुदेव प्रजापति हमारे समाज में शिक्षित व्यक्ति का महत्त्व सदैव रहा है। यदि कोई व्यक्ति अशिक्षित है, तो समाज में उसे कभी मान-सम्मान प्राप्त…
– वासुदेव प्रजापति जीवन में जितनी महत्त्वपूर्ण मन की शिक्षा और कर्म की शिक्षा है, उतनी ही महत्त्वपूर्ण शास्त्र की शिक्षा भी है। जहाँ मन…
– वासुदेव प्रजापति मन की शिक्षा से तात्पर्य है, सदाचार की शिक्षा, सद्गुणों की शिक्षा व चरित्र की शिक्षा। इन सबको मिलाकर एक ही शब्द…
– वासुदेव प्रजापति आज का युग विज्ञान का युग माना जाता है। कुछ लोग तो आज के युग का देवता विज्ञान को ही मानते हैं।…
– वासुदेव प्रजापति हम इतिहास को राजकीय इतिहास के रूप में ही पढ़ाते हैं। सांस्कृतिक इतिहास भी होता है, इसका हमें भान ही नहीं है।…
– वासुदेव प्रजापति अब तक इस बिन्दु की स्पष्टता हुई होगी कि इकोनोमिक्स के सिद्धांतों पर चलने से सर्वजनहिताय व सर्वजनसुखाय का उद्देश्य सिद्ध नहीं…
– वासुदेव प्रजापति समाजशास्त्र एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य के साथ रहने की व्यवस्था का शास्त्र है। साथ-साथ रहने की व्यवस्था किन सिद्धान्तों पर हुई…
– वासुदेव प्रजापति प्रथम भाग में हमने जाना कि भाषा की मूल इकाई अक्षर है और इसकी व्याप्ति सम्पूर्ण जीवन है। अक्षर के विभिन्न पदार्थों…