शिशु शिक्षा 37 – अनौपचारिक शिक्षा कैसे?

✍ नम्रता दत्त

सजीव सृष्टि का परिचय

आज पार्थ की मम्मी को ऑफिस से घर लौटने में देर हो गई थी और तीन वर्ष के पार्थ ने रो रोकर घर सिर पर उठा रखा था। परेशान होकर उसकी दादी मां उसे सोसायटी के पार्क में घुमाने ले गईं। शाम का समय था इसलिए पंछियों के झुंड आसमान में उङान भरते हुए अपने घोंसलों को लौट रहे थे। दादी ने जैसे ही उन पंछियों की तरफ पार्थ का ध्यान खिंचवाया तो उसकी रोने की आवाज धीरे-धीरे शान्त होने लगी। वह दादी की गोद से नीचे उतर गया और दादी को पंछी दिखाने लगा। फिर तो उसने बगीचे में उङती तितलियों का भी आनन्द लिया और पार्क में लगी हरी घास पर भी बैठकर खेलने लगा। उसकी मम्मी ने भी दादी को फोन करके बताया कि वह घर आ गई हैं। दादी ने पार्थ को घर चलने के लिए कहा परन्तु वह अब घर जाना नहीं चाहता था।

यही है सजीव सृष्टि से आत्मीयता, जो शिशु को प्राकृतिक रूप से मिलती है। अबोध शिशु तो स्वाभाविक रूप से इस आत्मीयता में जीता है परन्तु अभिभावक उसे यह वातावरण देते ही नहीं। उनके पास समय का अभाव है या तो वह अपनी ही उलझनों में उलझे हैं। अतः वे बच्चे को पशु पक्षी भी मोबाइल पर ही दिखा देते हैं।

कक्षा छट्ठी के बच्चे पिकनिक पर जाते हुए जब खेतों के पास से निकले तो खेत में फूलगोभी लगी हुई थी। वे देखकर बहुत खुश हुए और एक दूसरे को हैरानी से बताने लगे, देख, गोभी लगी हुई है। उनकी हैरानी के कारण का अनुमान तो आपने लगा ही लिया होगा और पुस्तक में पढकर भी 11 वर्ष का बच्चा कितना सीखता है इस बात का भी पता चल गया होगा। बस यही अन्तर है सजीव सृष्टि में और निर्जीव सृष्टि में। अतः जीवन में अनुभव हेतु सीखने का कार्य बाल्यावस्था में अनौपचारिक शिक्षा के माध्यम से ही संभव है।

शिशु के प्राकृतिक स्वभाव का लाभ उठाते हुए अभिभावकों को उसे प्रकृति (वृक्ष, वनस्पति, कीट-पतंग, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी) दर्शन करवाना ही चाहिए। इसमें रहकर वह न केवल प्रसन्नता/आनन्द का अनुभव करता है बल्कि उसे उनके रहने, खाने और उनकी आवाज आदि के विषय में जानकारी भी होती है। प्रकृति का यह सानिध्य उसे प्रकृति/सृष्टि से प्रेम करने का संस्कार सीखाता है। हम सबको एक ही भगवान ने बनाया है यह भाव/संस्कार जागृत करता है। प्रकृति/सृष्टि से प्रेम का यह संस्कार उसे भविष्य में प्रकृति/सृष्टि को हानि पहुंचाने से बचाता है। भावी जीवन में यही संस्कार उसे स्व/स्वार्थ अथवा परिवार (छोटा स्वरूप) से ऊपर उठकर सम्पूर्ण सृष्टि एक परिवार है (वसुधैव कुटुम्बकम्) के भाव से जोङता है। काम छोटा सा है परन्तु संस्कार निर्माण की दृष्टि से इसके परिणाम बङे हैं। अतः जब भी संभव हो उसे प्राकृति के बीच में ले जाएं और उसके दर्शन कराकर उसे प्रत्येक (वृक्ष, वनस्पति, कीट-पतंग, जीव-जन्तु, पशु-पक्षी) और नदी, पहाङ, झरने, सूर्य-चन्द्रमा आदि के विषय में बताएं।

मानव सृष्टि से परिचय

जन्म के पश्चात् धीरे-धीरे शिशु का परिचय मानव सृष्टि से बढ़ता जाता है। जन्म के पश्चात वह केवल माता को जानता है, पिता को जानता है और फिर धीरे-धीरे परिवार के अन्यों सदस्यों को भी जानने लगता है। तीन वर्ष में विद्यालय में प्रवेश लेता है तो समाज के छोटे स्वरूप से जुङ जाता है। रिश्तों को समझने लगता है। अपने और अजनबी को पहचानने लगता है। ऐसे में सभी रिश्तों और स्थानीय वातावरण की अपनी मर्यादाएं हैं, ऐसा उसे व्यवहार के द्वारा सीखाने की आवश्यकता होती है। अतः उसके सीखने और समझने के लिए उसे उचित वातावरण देकर उचित संस्कार देने की आवश्यकता है। वह तो सब काम करके सीखना चाहता है, परन्तु परिवार के सदस्य उसे हर कार्य करने से रोक देते हैं। उसकी कर्मेन्द्रियां विकासशील हैं, उन्हें काम चाहिए। वह घरवालों को जो भी काम करते हुए देखता है वह करना चाहता है जैसे – मां यदि कपङों की तह लगा रही है तो वो तह लगाना चाहता है। परन्तु मां उसके हाथ से कपङे छीन लेती हैं। परिवार के सदस्यों को ऐसा नहीं करना चाहिए। उसकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उसे छोटे छोटे कार्यों में सहयोगी बनाना चाहिए जैसे – भोजन के समय बर्तन रखना। सब्जियों को छांटकर अलग-अलग करना आदि।

छोटी छोटी संस्कारित कहानियों के माध्यम से उसे संस्कारित व्यवहार करना सीखाना चाहिए जैसे – अपने सामान का ध्यान रखना, उसे यथा स्थान रखना, बांटकर खाना, घर का बना भोजन खाना, अतिथियों का सत्कार करना आदि आदि। इन सबसे उसकी स्वयं तथा अन्यों (मानव सृष्टि ) के प्रति व्यवहारिक समझ विकसित होती है। इससे वह अनायास ही स्वावलम्बी, सहयोगी, स्वस्थ एवं संस्कारित होता जाएगा।

इसके लिए परिवार के सदस्यों में भी अनुशासित दिनचर्या का पालन करने एवं घर को व्यवस्थित रखने के संस्कार होने आवश्यक हैं क्योंकि बच्चा अनुकरण से सीखता है। परिवार में यदि आतिथ्य सत्कार होता है और अतिथि को देव माना जाता है तो बच्चा भी यह संस्कार स्वतः ही धारण कर लेगा। इसी प्रकार धीरे-धीरे विद्यालय में कैसे रहना, मन्दिर में कैसे जाना, किसी रिश्तेदार के घर में कैसा व्यवहार करना, बगीचे में जाकर क्या क्या ध्यान रखना, दूसरों की वस्तु न लेना, सार्वजनिक सम्पति को नुकसान नहीं पहुंचाना, बङों का सम्मान करना जैसी बातें सीखाने की उचित अवस्था/आयु यही है। इसे ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने प्रारम्भिक बाल्यावस्था में ‘देखभाल’ कहा है। इस देखभाल में संस्कारित शिक्षा अन्तर्निहित है जो आगे चलकर शिक्षा का आधार बनेगी। इसीलिए यह अवस्था सीखने की नींव है।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)

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