ज्ञान की बात 56 (भाषा का सांस्कृतिक स्वरूप – भाग दो)

 – वासुदेव प्रजापति

प्रथम भाग में हमने जाना कि भाषा की मूल इकाई अक्षर है और इसकी व्याप्ति सम्पूर्ण जीवन है। अक्षर के विभिन्न पदार्थों के साथ जुड़कर अनेक रूप बनते हैं। इसलिए अक्षरों के उच्चारण का बहुत बड़ा शास्त्र बना है। उच्चारण के उस शास्त्र को शिक्षा कहते हैं। आज हम अंग्रेजी शब्द एज्यूकेशन को शिक्षा कहते हैं, उस अर्थ में यह शिक्षा नहीं है। वेद के ६ अंगों में से एक अंग का नाम शिक्षा है, जो उच्चारण शास्त्र है। शिक्षा के शास्त्रों में पाणिनीय शिक्षा व याज्ञवल्क्य शिक्षा प्रमुख हैं।

वाणी के चार रूप हैं

जिस प्रकार अव्यक्त ब्रह्म व्यक्त होकर विश्वरूप धारण करता है, उसी प्रकार अव्यक्त शब्द भी विविध व्यक्त रूप धारण करता है। यह एक निश्चित प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के चार चरण हैं। अक्षर या वाणी के चार रूप हैं। परा, पश्यन्ति, मध्यमा तथा वैखरी। परा वाणी ब्रह्म रूप है, इस स्तर पर वह नादब्रह्म है। दूसरी पश्यन्ति, यह वाणी का मूल रूप है। जिसका सम्बन्ध मूलाधार चक्र के साथ है। इस स्तर पर शब्द संकल्पना का रूप धारण करता है। तीसरी मध्यमा, यह वाणी का भावरूप है। इसका सम्बन्ध अनाहत चक्र के साथ है, जो हृदय स्थान में है। वाणी का चौथा रूप है, वैखरी। वैखरी पूर्ण व्यक्त रूप है, यह कानों को सुनाई देता है। वेद का अंग वेदांग कहलाता है, शिक्षा एक वेदांग है। शिक्षा परा वाणी को वैखरी तक लाने की प्रक्रिया सिखाने वाला शास्त्र है।

यहाँ हम बिना बोले संवाद करने का एक प्रसंग जानेंगे।

अद्भुत संवाद

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक गुरुजी का मद्रास प्रवास निश्चित हुआ। इस प्रवास में संघ के कार्यक्रमों के अतिरिक्त एक कार्यक्रम पांडीचेरी जाकर श्रीमाँ से मिलना भी था। मद्रास प्रवास तो हुआ परन्तु किसी कारणवश पांडीचेरी जाने का कार्यक्रम स्थगित हो गया। दूसरी बार मद्रास प्रवास में श्रीमाँ से मिलने जाना तय हुआ। परन्तु दूसरी बार मद्रास प्रवास ही स्थगित हो गया। तीसरी बार पुनः प्रवास हुआ। इस बार तो श्रीमाँ से मिलने जाने को प्रमुखता दी गई। मद्रास से पांडीचेरी श्री अरविन्द आश्रम गए। गुरुजी के साथ दो-तीन कार्यकर्ता भी थे। वहां आश्रम में कुछ समय प्रतीक्षा भी करनी पड़ी, तब जाकर बुलावा आया। गुरुजी ने श्रीमाँ के कक्ष में प्रवेश किया। दूर से ही परस्पर मौन अभिवादन हुआ। गुरुजी श्रीमाँ के सामने पांच-छ: कदम की दूरी पर बैठ गए। साथ के तीनों कार्यकर्ता भी गुरुजी के दो कदम पीछे बैठ गए। लगभग दस-बारह मिनट तक सभी मौन बैठे रहे। न गुरुजी कुछ बोले और न श्रीमाँ ने कुछ कहा। कुछ समय पश्चात गुरुजी खड़े हुए, पुनः दोनों ने मौन अभिवादन किया और गुरुजी कक्ष से बाहर आ गए।

साथ के तीनों कार्यकर्ताओं को कुछ भी समझ में नहीं आया। एक वरिष्ठ कार्यकर्ता को गुरुजी के इन तीनों प्रवास की सम्पूर्ण जानकारी थी, उनके लिए भी यह अत्यधिक आश्चर्य की बात थी। इसलिए उन्होंने जिज्ञासावश गुरुजी से पूछ ही लिया। गुरुजी! इतने प्रयत्नों के पश्चात तो श्रीमाँ से मिलने का योग बना, किन्तु आप तो बिना बातचीत किए ही लौट आए? तब गुरुजी ने बताया कि हमारी बातचीत हो गई। बातचीत हो गई? आप दोनों में से एक भी शब्द बोला नहीं गया, फिर बातचीत कैसे हो गई? बातचीत के लिए बोलना आवश्यक नहीं, हमारे मध्य जितना संवाद होना था, वह पूर्ण हुआ और मैं इस संवाद से संतुष्ट होकर लौट रहा हूँ।

यह अद्भुत संवाद हमें बताता है कि बातचीत के लिए वैखरी वाणी आवश्यक है, किन्तु संवाद के लिए नहीं। यदि संवाद करने वाले समान आध्यात्मिक स्तर के मनीषी हैं तो मध्यमा वाणी के धरातल पर भी संवाद सम्भव है।

भाषा के चार कौशल हैं

भाषा के प्रमुख चार कौशल मान्य हैं। ये चार कौशल हैं – सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना। इन चारों में सुनना और बोलना मूल कौशल है, जबकि पढ़ना और लिखना वाचिक रूप का वर्ण रूप में रूपान्तरण है। जो सुना वही बोलना अर्थात् सुनना दूसरे के बोलने का अनुसरण करना है। इसी प्रकार जो लिखा है वही पढ़ना अर्थात् पढ़ना दूसरे के लेखन का अनुसरण करना है। इसका अर्थ यह है कि भाषा कभी भी अकेले नहीं सीखी जाती, दो मिलकर ही सीखी जाती है। अतः भाषा सीखने में सिखाने वाले की भूमिका अधिक महत्त्वपूर्ण है।

व्युत्पत्ति का शास्त्र निरूक्त है

भाषा का दूसरा अंग है, पद। हम पद को शब्द भी कहते हैं। यहाँ शब्द मात्र ध्वनि नहीं है, ध्वनि के साथ कुछ और भी है। ध्वनि रूप अक्षरों के साथ जब जीवन में व्याप्त अर्थ जुड़ता है, तब वह ध्वनि समूह पद बनता है। पदों की रचना का एक विस्तृत शास्त्र है। पदों की रचना व्युत्पत्ति कहलाती है और व्युत्पत्ति के शास्त्र को निरूक्त कहते हैं। पद एक ऐसी व्यवस्था है, जिसका अनुरणन, आकार, क्रिया आदि बातों से सम्बन्ध है। यह कृत्रिम व्यवस्था नहीं है, अपितु अत्यन्त सार्थक व्यवस्था है।

इसकी सार्थकता का एक उदाहरण समझते हैं। ‘हृदय’ नामक पद तीन क्रियाओं का वाचक है। ये क्रियाएँ हैं – आहरति, ददाति व यमयति। आहरति अर्थात् लाता है, ददाति अर्थात् देता है और यमयति अर्थात् नियमन करता है। आहरति का ‘हृ’, ददाति का ‘द’ तथा यमयति का ‘य’ मिलकर पद बना ‘हृदय’। ये तीनों क्रियाएँ लाता है, देता है और नियमन करता है, हृदय के तीन कार्य हैं। इस प्रकार सार्थक पद रचना होती है। अर्थात् पदों की निश्चिति जीवन के अर्थ से जुड़कर होती है।

भाषा श्रेष्ठतम अभिव्यक्ति है

जीवन के सभी पहलुओं को शब्दों में व्यक्त करने का साधन भाषा है। जीवन में घटनाएँ होती हैं, सजीव-निर्जीव वस्तुएँ होती हैं, अनेक व्यवस्थाएँ होती हैं, मनोभाव होते हैं, विचार और संस्कार होते हैं। सार रूप में यह कहा जा सकता है कि व्यक्तिगत जीवन और समष्टिगत जीवन में जो कुछ भी होता है, भाषा उन सबकी शाब्दिक अभिव्यक्ति है। इस प्रकार भाषा का सम्बन्ध सम्पूर्ण जीवन से है।

जीवन में अभिव्यक्ति के अनेक माध्यम हैं, जैसे – संगीत, चित्र, अभिनय, कलाएँ आदि। भाषा इन सब अभिव्यक्तियों में श्रेष्ठतम है। क्योंकि भाषा नादब्रह्म का आविष्कार है। नादब्रह्म अपने भौतिक स्वरूप में भी सूक्ष्मतम है, इसमें अनन्त सृजनशीलता है। समाधि अवस्था के अनुभव की अभिव्यक्ति के समय वह मंत्र रूप में प्रकट होती है।

हम देखते हैं कि जीवन का अनुभव जितना व्यापक और गहरा होता है, अर्थ का बोध भी उतना ही गहरा होता है। भाषा स्वत: उस अनुभव को व्यक्त करने योग्य बन जाती है। संत कबीर अशिक्षित कवि माने जाते हैं, परन्तु उनकी भाषा उनके अनुभवों को व्यक्त करने में समर्थ थीं। तात्पर्य यह है कि भाषा जीवन के बोध का अनुसरण करती है। जबकि बिना अनुभव के अलंकृत शब्द मात्र निरर्थकता का ही आभास करवाते हैं।

भाषा की शैली

विभिन्न अभिव्यक्तियों में भाषा के साथ उच्चारण शास्त्र, व्युत्पत्ति शास्त्र, व्याकरण शास्त्र और अलंकार शास्त्र जुड़े हुए हैं। विभिन्न छन्द एवं अलंकार के विनियोग से बनने वाली शैली अलंकार शास्त्र का विषय है। सन्धि उच्चारण शास्त्र का अंग है तथा समास शब्द रचना से सम्बन्धित विषय है। पदलालित्य, अर्थ गौरव व उपमा शैली के ही अंग है। कवियों की शैली की विशेषता बताने वाला श्लोक यह कहता है –

दण्डिन:  पदलालित्यम्   भारवैर्थगौरवं।

उपमा कालिदासस्य माघे सन्ति त्रयोगुणा:।।

भाषा की शोभा

शुद्ध भाषा, मधुर भाषा, ललित भाषा, प्रभावी भाषा, सार्थक भाषा, भावपूर्ण भाषा में सब भाषा की शोभा बढ़ाते हैं। इसी प्रकार मन, बुद्धि, चित्तादि अन्य:करण और हृदय भाषा को समृद्ध बनाते हैं। संगीत भाषा की मधुरता बढ़ाता है।

जीवन के घनिष्ठतम अनुभव भाषा को समृद्ध बनाते हैं। पंचमहाभूतों के साथ आत्मीयता, वनस्पति और प्राणीजगत के प्रति स्नेह और मनुष्यों के साथ सद्भाव जीवन का सार्थक अनुभव प्रदान करते हैं और भाषा इनका अनुसरण करती है।

भाषा सीखना अर्थात् ये सभी बातें सीखना। भाषा मात्र श्रवण, भाषण, पठन व लेखन के कौशलों तक सीमित नहीं है। शुद्ध, मधुर, दमदार, अर्थपूर्ण उच्चारण, शास्त्र शुद्ध व्याकरण, आशय के अनुरूप शैली और परावाणी से अनुस्यूत वैखरीवाणी भाषा प्रभुत्व के लक्षण हैं। भाषा सिखाते समय इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है।

भाषा मूल से सिखानी चाहिए

व्यावहारिक जीवन में व्यापक स्वाध्याय से शब्द सम्पत्ति बढ़ती है। व्याकरण के अध्ययन से भाषा शुद्ध होती है। अलंकार शास्त्र के अध्ययन से शैली का विकास होता है। निरूक्त के अध्ययन से अर्थवाहिता बढ़ती है। काव्य के अध्ययन से सृजनशीलता का विकास होता है। परन्तु यदि जीवन के साथ तादात्मयता नहीं है तो यह सारा अध्ययन निरर्थक हो जाता है।

अतः भाषा सिखाना मूल से प्रारम्भ करना चाहिए। सीधा व्याकरण पढ़ना अथवा चारों कौशलों पर ध्यान केन्द्रित करना या प्रश्नोत्तर बल देना अधिक उपयोगी नहीं होता। भाषा अन्य सभी विषयों का आधारभूत विषय है। भाषा का यह महत्त्व समझकर उसके अध्ययन-अध्यापन की योजना बनानी चाहिए। व्यवस्था करते समय मूल को समझना अनिवार्यतः आवश्यक होता है। शिक्षा के सम्बन्ध में भी यही आवश्यक है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

और पढ़ेंभारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 55 (‘भाषा’ का सांस्कृतिक स्वरूप भाग एक)

Facebook Comments

One thought on “ज्ञान की बात 56 (भाषा का सांस्कृतिक स्वरूप – भाग दो)

Leave a Reply

Your email address will not be published.