सा विद्या या विमुक्तये
– वासुदेव प्रजापति
आज की नई पीढ़ी भारत के स्वतंत्रता संग्राम से अनभिज्ञ है। उसने न जवाहरलाल नेहरु को देखा है न उसे सुभाषचन्द्र बोस के दर्शन का सौभाग्य मिला है। स्वाधीन भारत के शासकों ने देश की नई पीढ़ी को नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विषय में कुछ भी नहीं बताया, फिर भी भारत की वर्तमान तरुण पीढ़ी को नेहरुजी व नेताजी में से किसी एक को चुनने के लिए कहा जाए तो निश्चय ही सुभाषचन्द्र बोस को ही वे सर्वप्रिय नेता के रूप में चुनेंगे। क्योंकि नेताजी का नाम लेने मात्र से आधुनिक भारत के तरुणों और किशोरों के हृदयों में जैसा विद्युत-संचार होता है, वैसा जवाहरलाल नेहरू का नाम लेने से नहीं होता। ठीक यही स्थिति हमारे देश के राष्ट्रगीत वंदे मातरम की है। स्वाधीन भारत ने कभी भी वंदे मातरम् का सत्य इतिहास नई पीढ़ी को नहीं बताया। “कोटि-कोटि हृदयों के प्राण स्पंदन और सहस्रों हुतात्माओं का चेतना मंत्र है, वंदे मातरम्।” वन्देमातरम् के उत्कर्ष और अपमान के इतिहास से आज की पीढ़ी पूर्णतया अनभिज्ञ है। जबकि जवाहरलाल नेहरू द्वारा लाया गया राष्ट्रगान, जन गण मन सबको याद है। अतः नई पीढ़ी को वन्देमातरम् का सत्य इतिहास बताना इस गोष्ठी का उद्देश्य है।
हमारे देश की अनेक बातें हमसे छुपाई गई हैं। जैसे हमें बताया गया कि देश को आजादी बिना खड्ग और बिना ढाल के अहिंसात्मक आंदोलनों से मिली है। जबकि वास्तविकता यह है कि अनेक देशभक्तों ने देश को स्वतंत्र करवाने के लिए फाँसी के फंदों को चूमा था, अपना रक्त बहाया था, अपना बलिदान दिया था तब जाकर हमें आजादी मिली है। आजादी से पहले वन्देमातरम् ही देश के लिए उत्सर्ग का पवित्र भाव भरने वाला स्वदेश मंत्र था। इस पवित्र मंत्र से प्रेरणा लेकर ही देशभक्त जब मिलते थे, तब परस्पर वन्देमातरम् का सम्बोधन करते थे। प्रत्येक छोटे-बड़े समारोह में वन्देमातरम् गाया जाता था। सभी बड़े बड़े राजनेता वन्देमातरम् को ही देश का राष्ट्रगान मानते थे। स्वतंत्रता से पूर्व तक जन-गण-मन को गाया नहीं जाता था। “वन्देमातरम् की व्यथा-कथा” पुस्तक के लेखक श्री चतुर्भुज जी तोषनीवाल लिखते हैं कि मैं कलकत्ता में अनेक वर्ष रहा हूँ, अतः बंगाली भाषी हूँ। अनेक सामाजिक व राजनैतिक कार्यक्रमों में जाना होता था। वन्देमातरम् गान को असंख्य बार सुना, परन्तु जन-गण-मन केवल एक बार ही सुनने को मिला। फिर क्यों पहले वन्देमातरम् का अंगभंग किया और बाद में इसको पदच्युत् कर दिया? क्यों वन्देमातरम् के स्थान पर अचानक जन-गण-मन को राष्ट्रगान बना दिया गया? इस षड्यंत्र के पीछे कौन था? ऐसे सभी प्रश्नों के उत्तर इस लेख में आपको सुनने को मिलेंगे। यहाँ एक बात की ओर आप सबका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ कि मैं जन-गण-मन का विरोधी नहीं हूँ और न इसका अपमान करना चाहता हूँ। मैं तो केवल इतना चाहता हूँ कि वन्देमातरम् के साथ जो षडयंत्र किया गया है, उसे उजागर करूँ। अन्यथा आज भी मैं जन-गण-मन को राष्ट्रगान होने के नाते उसका श्रद्धापूर्वक गान करता हूँ और उसके सम्मान में खड़ा होता हूँ और चाहता हूँ कि सभी देशवासी जन-गण-मन को वैसा ही सम्मान दें।
स्वदेश मंत्र वन्देमातरम् का अवतरण
वन्देमातरम् राजर्षि बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की चेतना में अवतीर्ण हुआ पवित्र मंत्र है। हमारे देश में ऋषि मंत्र द्रष्टा होते हैं। मंत्र वह होता है जो ऋषियों की चेतना में स्वयं अवतीर्ण होता है। इस कसौटी पर वंदे मातरम् खरा उतरता है वन्देमातरम् शुद्ध रूप में भारतमाता के लिए गाया गया पवित्र गान है। वन्देमातरम् गाने से देशभक्तों के हृदयों में भारतमाता के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने का भाव स्वत: स्फूर्त होता है।
वन्देमातरम् का अर्थ है, मैं माता की वंदना करता हूँ, अर्थात मैं भारत माता को प्रणाम करता हूँ। हम वैदिक काल से पृथ्वी माता की वंदना करते आए हैं। पृथ्वी को माता मानकर उसकी वंदना करना हम भारतीयों की रग-रग में रचा-बसा है। वैदिक साहित्य में मातृ वंदना गायी गई है। ऋग्वेद में “बन्धुर्मेमाता पृथिवी महीयम्” कहा गया है। जिसका भाव है, यह विशाल पृथ्वी मेरी माता है। यजुर्वेद कहता है, “नवो मातरे पृथिव्यै” का भाव भी यही है कि पृथ्वी हमारी माता है। और अथर्ववेद का यह प्रसिद्ध सूक्त हम सबने सुना है, “माता भूमि: पुत्रोंsहं पृथिव्या:” भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ। वेदों के अतिरिक्त भी संस्कृत साहित्य में मातृभूमि की वंदना अनेक शास्त्रों में वर्णित हैं। जैसे हमने लक्ष्मण व राम का वह संवाद सुन रखा है कि लंका विजय के पश्चात् लक्ष्मण राम से कहते हैं कि भैया! अयोध्या में तो भरत राज्य कर ही रहे हैं। क्यों न हम अपने हाथों से विजित इस स्वर्णनगरी लंका में ही रह जायें। प्रत्युत्तर में श्रीराम कहते हैं –
“अपि स्वर्णमयी लंका न में लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।।”
हे लक्ष्मण! यह सत्य है कि लंका सोने की है, परन्तु यह मुझे नहीं रुचती। क्योंकि जन्म देने वाली माँ और जन्मभूमि मेरे लिए स्वर्ग से भी बढ़कर है। स्पष्ट है कि जन्मभूमि की मातृरूप में वंदना करने की भारत में परंपरा रही है। इसी परंपरा में अनेक बंगाली लेखकों जैसे माइकेल मधुसूदन दत्त, भूदेव मुखोपाध्याय एवं बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपनी-अपनी कृतियों में जन्मभूमि का मातृरूप में दर्शन किया है। बंकिम बाबू ने अपनी कृति ‘मेरा दुर्गोत्सव’ में अपनी दिव्य दृष्टि से सप्तमी पूजा के दिन जन्मभूमि का दशभुजा देवी दुर्गा के रूप में अपूर्व दर्शन किया था। कुछ समय के उपरान्त उनकी लेखनी से उसी दिव्य दृष्टि द्वारा आकारित दुर्गा माता का रूप सन् 1875 में ‘वन्देमातरम्’ गान के रूप में अवतरित हुआ। तब से लेकर अब तक 150 वर्ष पूर्ण हुए हैं, इसलिए 2026 में हम वन्देमातरम् का 150वाँ जयन्ती वर्ष मना रहे हैं। बंकिम बाबू ने 8 वर्ष बाद सन् 1883 में इस गान को अपने उपन्यास ‘आनन्द मठ’ में प्रकाशित किया था। तब वन्देमातरम् गान के सम्बन्ध में उन्होंने अपनी पुत्री से कहा था – “देखना! एक दिन ऐसा आएगा कि बंगभूमि इस गान को सुनकर नाचने लगेंगी, केवल बंगाल ही नहीं सारा भारतवर्ष इस गान से प्रेरणा ग्रहण करेगा।” इतना ही नहीं, वन्देमातरम् के व्याख्याकार श्री अरविन्द घोष ने अपने प्रबन्ध ‘ऋषि बंकिम चंद्र’ में तीन बातों पर विशेष बल दिया है। “पहली बंकिम बाबू की समस्त रचनाओं का श्रेष्ठ भाव है, स्वदेश धर्म। दूसरी, जिस नवीन प्रेरणा से ओत-प्रोत होकर हम स्वाधीनता की दिशा में अग्रसर हो रहे हैं, उसके प्रेरणादाता एवं राष्ट्रगुरु हैं, बंकिमचंद्र। और तीसरी बात, उनका सर्वोत्कृष्ट योगदान है, जननी जन्मभूमि का मातृरूप में दर्शन करना।”
बंगभंग आन्दोलन में वन्देमातरम्
अंग्रेजों ने देश के स्वाधीनता आन्दोलन को कमजोर करने के लिए पहले बंगाल का विभाजन किया था। उस समय बंगाल क्रान्तिकारी गतिविधियों का गढ़ था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार भी डाक्टरी की पढ़ाई करने कलकत्ता गए थे और पढ़ाई के साथ-साथ क्रान्तिकारी गतिविधियों में सक्रिय भाग लिया था। वे क्रान्तिकारी संस्था अनुशीलन समिति के सदस्य थे। उनका गुप्त नाम कोकेन था। ऐसे सभी क्रांतिकारियों की कमर तोड़ने के लिए उन्होंने सन् 1905 में बंग-भंग का निर्णय लिया था। 7 अगस्त 1905 के दिन कलकत्ता के टाउन हॉल में बंग-भंग के विरोध में एक बहुत बड़ी सभा हुई। उस सभा में पहली बार वन्देमातरम् का जयघोष लगा और उसी दिन से यह जयघोष देशभक्तों का स्वदेश मंत्र बन गया। उस दिन से लेकर आजादी पाने तक न जाने कितने ही हजारों आबाल-वृद्ध स्वतंत्रता के पुजारियों ने वन्देमातरम् के सात्त्विक बल के सहारे असंख्य व अमानुषिक अत्याचार सहते हुए फाँसी के फन्दों को चूमा था। अंग्रेजों के द्वारा साम-दाम-दण्ड-भेद रूपी सभी दाँव-पेच लगाने के बाद भी वे आन्दोलन को समाप्त नहीं कर पाए। अन्ततः विवश होकर उन्हें सन् 1911 में अपना बंग-भंग का निर्णय वापस लेना पड़ा। अर्थात् अंग्रेजों द्वारा किए गए बंगाल-विभाजन को देशभक्तों ने रोक दिया। अंग्रेजों की इस विफलता के मूल में देशभक्तों को मर मिटने की प्रेरणा देने वाला यह स्वदेश मंत्र, वन्देमातरम् ही प्रमुख शस्त्र था।
स्वतन्त्रता संग्राम में वन्देमातरम् देशभक्तों का प्रमुख शस्त्र बन गया था। फलतः अंग्रेजों ने इस स्वदेश मंत्र से भयभीत होकर वन्देमातरम् बोलने पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया। परन्तु देशभक्तों ने वंदे मातरम् जयघोष के प्रतिबन्ध को अमान्य कर दिया, हमें अपनी माता की जय बोलने से कोई नहीं रोक सकता। यहाँ मुझे पुनः डॉ.हेडगवार के विद्यार्थी काल का एक प्रसंग याद आता है। वे नागपुर की नीलसिटी हाईस्कूल में पढ़ रहे थे। उन्हें ज्ञात हुआ कि निरीक्षक महोदय निरीक्षण करने हेतु उनके स्कूल में आने वाले हैं। तब उन्होंने अपने विश्वस्त साथियों के साथ वन्देमातरम् जयघोष की योजना बनाई। इस योजना की कानोंकान किसी को भनक तक नहीं लगने दी। निर्धारित दिन निरीक्षक महोदय स्कूल में आए और उनकी कक्षा में ज्योंही पैर रखा त्योंही पूरी कक्षा ने खड़े होकर वन्देमातरम् से उनका स्वागत किया। निरीक्षक महोदय क्रोधित हुए और दूसरी कक्षा में चले गए। वहाँ भी उनका स्वागत वन्देमातरम् जयघोष से ही हुआ। अब तो निरीक्षक आग बबूला हो गए और प्रधानाध्यापक को तुरन्त अनुशासन हीनता के लिए कठोर कार्यवाही करने का आदेश देकर चले गए। प्रधानाचार्य ने सबसे पूछताछ की परन्तु किसी भी बालक ने कुछ भी नहीं बताया। जब उन्होंने निर्दोष बालकों को पीटना शुरु किया तब डाक्टर जी आगे आए और स्वीकार किया कि यह सारी योजना मेरी थी। प्रधानाचार्य ने डाक्टरजी को उसी समय स्कूल से निष्कासित कर दिया। यह सजा पाकर भी डाक्टरजी प्रसन्न थे क्योंकि भारतमाता की जय बोलने में उन्हें गौरव एवं स्वाभिमान की अनुभूति होती थी।
ऐसा ही प्रसंग कलकत्ता के नेशनल कॉलेज के एक विद्यार्थी सुशील सेन का है। एक आन्दोलन में उसने अंग्रेज सार्जेंट के दुर्व्यवहार से क्रोधित होकर उसे जोर का घूँसा मार दिया। सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और जज के सामने पेश किया। जज किंग्सफोर्ड ने सुशीलसेन को पन्द्रह बेंतों की सजा सुनाई। ज्योंही उसकी नंगी पीठ पर बेंत पड़ती वह जोर से वन्देमातरम् जयघोष लगाता। पन्द्रह ही बेंतों पर वह बड़े गर्व से वन्देमातरम् जयघोष लगाता रहा। यह तो कुछ भी नहीं, अंग्रेज वन्देमातरम् घोष से इतने अधिक भयभीत थे कि अमानवीय अत्याचारों से कुछ क्रांतिकारियों की मृत्यु हो जाने पर भी भयभीत और आतंकित अंग्रेजों ने उनके शवों को गहरे समुद्र में डूबोया था। इसी तरह क्रांतिकारी सूर्यसेन जिन्हें फाँसी की सजा मिली थी, उन्हें वधस्थल ले जाते समय वे वंदेमातरम का जयघोष लगाते जा रहे थे, इसलिए उनको इतनी निर्दयतापूर्वक लाठियों से पीटा गया कि वे बेहोश हो गए और बेहोशी की हालत में ही उन्हें फाँसी दे दी गई। स्वदेश के लिए सर्वस्व बलिदान करने की प्रेरणा देने वाले शक्तिशाली स्वदेश मंत्र का स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् तत्कालीन सत्ताधीशों ने तिरस्कार करके अपने मस्तक पर जो कलंक का टीका लगाया है, वह सदियों तक अमिट रहेगा।
क्रमशः
(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)
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