– राजेन्द्र सिंह बघेल

होनहार बिरवान
मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के बघपुरा ग्राम में 21 जुलाई 1930 को एक कृषक परिवार में श्री लज्जाराम तोमर का जन्म हुआ था। शिक्षा जगत में उनका नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। वे अत्यंत सदाचारी व विभिन्न सद्गुणों से युक्त एक महामनीषी थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से 1945 में विद्यार्थी जीवन में ही उनका संपर्क आ गया था। परास्नातक एवं बी.एड की शिक्षा प्राप्त करके एक विद्यालय में प्राध्यापक के पद पर कार्य करते रहे। इसी क्रम में श्रद्धेय भाऊराव देवरस (तत्कालीन प्रांत प्रचारक) की प्रेरणा से श्री तोमर जी ने सुभाष पार्क आगरा में सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की। शिशु मंदिरों की व्यवस्था शिशु से कक्षा पंचम तक रहती है। श्रद्धेय तोमर जी अत्यंत प्रयोग धर्मी थे अतः शिशु मंदिर से आगे की शिक्षा व्यवस्था के लिए सरस्वती विद्या मंदिर की योजना को विस्तार देते हुए आगरा के उत्तर विजयनगर में एक इंटरमीडिएट कॉलेज की अत्यंत प्रभावी रचना की।
इस विद्यालय के वह संस्थापक प्रधानाचार्य रहे। मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के महत्वपूर्ण योगदान की बड़ी स्पष्ट संकल्पना उनके मन में आरंभ से ही थी। इसी का परिणाम है कि विद्या मंदिरों के संचालन हेतु 1972 में भारतीय शिक्षा समिति उत्तर प्रदेश का गठन किया तथा जिसके वह संस्थापक मंत्री भी थे। आज सर्वदूर पूरे देश में उससे संबद्ध वे विद्या मंदिर एक श्रेष्ठतम कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।
ऐसे श्रद्धेय तोमर जी से जुड़े कुछ प्रसंगों का वर्णन पाठकों के समक्ष करना मैं उचित समझता हूँ।
शिक्षा के लिए उनका समर्पित जीवन
सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज उत्तर विजयनगर के प्राचार्य रहते वह पूरे प्रदेश में विद्या मंदिरों एवं संपर्कित विद्यालयों के उत्तरोत्तर प्रगति एवं गुणवत्ता विकास के लिए अध्यापकों के सम्मेलन में प्रत्यक्ष उपस्थित रहकर मार्गदर्शन करते थे। 1977 की जुलाई में मैंने उनके प्रथम दर्शन बलरामपुर विद्यालय में प्रधानाचार्य रहते किया था। उस समय बलरामपुर तत्कालीन गोंडा जिले की एक तहसील का केंद्र था। जिले में उस समय शिक्षा प्रसार समिति गोंडा के अंतर्गत चलने वाले सात इंटरमीडिएट कॉलेज थे। सभी का नाम भारतीय इण्टर कॉलेज था। यह विद्यालय गोंडा नगर, रेहरा बाजार, उतरौला, कटरा बाजार, और राप्ती नदी पार तराई के मथुरा बाजार, पिपरा बाजार एवं शिवपुरा में स्थित थे। इन विद्यालयों के 120 अध्यापकों व प्राचार्यों का त्रिदिवसीय सम्मेलन हमारे शिशु मंदिर में आयोजित था। विभिन्न सत्रों में मैंने प्रत्यक्ष उपस्थित रहकर श्रद्धेय तोमर जी की वाणी सुनी थी। शिक्षा के प्रति उनकी गहरी सोच, लगन व प्रत्यक्ष कार्यक्रमों का वर्णन सुनकर मुझमें उनके प्रति अत्यंत श्रद्धा भावना जागी। इन तीन दिनों की अवधि में कुछ समय उनसे प्रत्यक्ष संवाद करने का भी अवसर मिला।
एक वर्ष बाद वह पुनः बलरामपुर आए और इस जिले के प्रत्येक इंटर कॉलेज का प्रवास किया। हिमालय की तलहटी में स्थित राप्ती नदी को पार करने हेतु नाव का सहारा लेकर साइकिल से ही यह प्रवास उनके साथ मैंने भी किया। शिक्षा का दीप जलाकर उन ज्योतियों को बेहतर प्रकाश देने वालों के लिए साधनों का कोई महत्व नहीं होता; इस प्रवास में मैंने उनके साथ रहकर यह प्रत्यक्ष अनुभव किया था।
श्रेष्ठ संगठक व पंचपदी अधिगम पद्धति के सूत्रधार
विद्या भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री के रूप में कार्य करते हुए कई वर्ष उनका केंद्र जय विलास पैलेस ग्वालियर में भी था। अपनी संस्थाओं की शिक्षा व्यवस्था में विद्वानों का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन मिले; इस हेतु विद्वत् परिषद की रचना उनके श्रेष्ठ विचारों का परिणाम है। अखिल भारतीय स्तर पर विद्वत् परिषद का गठन कर विद्वानों का एक वृहद सम्मेलन ग्वालियर में ही उन्होंने आयोजित किया था। यद्यपि हमारी भारत भूमि में शिक्षा को वास्तविक स्वरूप देने वाले मनीषियों की कमी कभी नहीं रही परंतु परकीय शासन की अवधि में एक लंबे समय तक हमने जब अपने ‘स्व’ का भाव बिसार दिया तो उसके दुष्परिणाम भी हमें और हमारी संततियों को भोगना पड़ा। विद्यार्थी के समग्र विकास की संकल्पना को क्रिया रूप में परिवर्तित करने हेतु शिक्षण की प्रभावी अधिगम पद्धति का सघन विचार श्रद्धेय तोमर जी की ही देन है। ‘पंचपदी अधिगम पद्धति’ जिसे हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उत्कट स्थान प्राप्त हुआ है, उसके प्रणेता तो वही रहे हैं।
1984 के अक्टूबर मास में कुरुक्षेत्र के श्रीमद् भगवतगीता विद्यालय के परिसर में अखिल भारतीय प्रधानाचार्य सम्मेलन आयोजित हुआ था। सम्मेलन के अनेक सत्रों में से एक विशेष सत्र में ‘पंचपदी अधिगम पद्धति’ का सविस्तार वर्णन मैंने श्री लज्जाराम जी के श्री मुख से पहली बार सुना था। इस पद्धति के आधारभूत पदों का वर्णन सुनकर अपने विद्यालयों में अनेक आचार्य/प्राचार्यों ने इसे कार्य रूप देने की योजना बनाई। इसे प्रयोग रूप में मैंने स्वयं अपनाया और इसके पदों में निहित उद्देश्यों को समझने का प्रयत्न किया। थोड़े समय में ही इसके परिणाम विद्यार्थियों के मध्य मैंने अनुभव किया।
‘पंचपदी अधिगम पद्धति’ व ‘पंचमुखी शिक्षा’ के विकास में प्रमुख योग दानी
वर्ष 1985 से पूर्व अपनी कार्य रचना में अधिकतम विद्यालय आठवीं कक्षा स्तर तक ही थे। हाई स्कूल स्तर तक कुछ गिनती के विद्यालय ही थे। पंचपदी अधिगम पद्धति का क्रियान्वयन अपने अनेक सरस्वती विद्या मंदिरों में अपनाना आरंभ हो चुका था। इस पद्धति की उपयोगिता को देखते हुए इसे संबल प्रदान करने हेतु 1985 में 14 दिनों का एक अखिल भारतीय स्तर पर (विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात के) आचार्यों का प्रशिक्षण वर्ग नैनीताल के सरस्वती विहार में आयोजित हुआ। यद्यपि इस वर्ग में अधिकतम विद्या मंदिरों के आचार्य और प्रधानाचार्य को बुलाया गया था पर आज के उत्तराखंड सहित संपूर्ण उत्तर प्रदेश के शिशु मंदिरों से छह प्रधानाचार्यों को भी बुलाया गया। उनमें से मैं स्वयं भी 14 दिन सरस्वती विहार के इस प्रशिक्षण वर्ग में सहभागी रहा। श्री लज्जाराम जी पूरे समय वर्ग में रहे और पद्धति के विकास के सभी आयामों पर गहरी नजर रख रहे थे। उत्तर प्रदेश के भारतीय शिक्षा समिति के मंत्री श्री राम सहाय पुरवार और गोरखपुर के श्री रवीन्द्र मिश्र व कानपुर के श्री नरेंद्र बहादुर सिंह भी वर्ग में अपना महत्वपूर्ण योगदान कर रहे थे।
पंचपदी अधिगम पद्धति के प्रत्येक पद के सैद्धांतिक व व्यावहारिक पदों पर विशद चर्चा होती थी। प्रत्येक प्रशिक्षु ने एक-एक पाठ योजना बनाकर प्रत्यक्ष शिक्षण किया। पूरे दिन और रात्रि के सत्र में भी श्रद्धेय तोमर जी प्रत्यक्ष उपस्थित रहकर गहन पर्यवेक्षण व आकलन कर रहे थे। योग शिक्षा का हमारी शिक्षा व्यवस्था में कितना गहरा प्रभाव है, इस हेतु योग की कक्षा वह स्वयं लेते थे। पाठ सहगामी-क्रियाकलाप यथा छात्र संसद, उसकी परिषदें व विभाग, छात्र न्यायालय व छात्र बचत बैंक का प्रत्यक्षीकरण सरस्वती विहार के छात्रों के सहयोग से मान्यवर लज्जाराम जी के आंखों के सामने किया गया।
पद्धति के विकसित होने पर उसका परिणाम आचार्यों के माध्यम से विद्यालय स्तर पर प्रत्येक विद्यार्थी तक पहुंचेगा, इसीलिए तो वह इस प्रशिक्षण वर्ग में क्षण-क्षण व पल-पल के साक्षी बने थे।

योजना के क्रियान्वयन के साक्षी
वर्ष 1985 में सरस्वती विहार के वर्ग के पश्चात जहां-जहां से प्रतिभागी आए थे उनमें से अधिकतम स्थान पर उन्होंने प्रत्यक्ष जाकर क्रियान्वयन की स्थिति के आकलन की योजना बनाई। दिसंबर 1986 में वह तत्कालीन फैजाबाद-अयोध्या के विद्यालय में पधारे; उन दिनों मैं वहां शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य का दायित्व निर्वहन कर रहा था। क्योंकि नगर के एक अन्य विद्या मंदिर से भी तीन प्रशिक्षु सरस्वती विहार गए थे एतदर्थ दो दिन का प्रवास उन्होंने नगर के लिए बनाया था। अपने विद्यालय में कुल 18 आचार्य उस समय कार्यरत थे। उन सभी को पंचपदी अधिगम पद्धति की विस्तृत जानकारी कराई गई थी तथा शिक्षण में इसका प्रत्यक्ष प्रयोग सभी आचार्य कर रहे थे। प्रार्थना सभा के बाद से लेकर सायंकाल अवकाश से पूर्व तक श्री तोमर जी ने एक-एक आचार्य से विस्तृत बात की और पद्धति के क्रियान्वयन की स्थिति का आकलन भी किया। सायंकाल सभी के साथ बैठकर यथेष्ट मार्गदर्शन भी किया। यही प्रक्रिया दूसरे दिन अगले विद्यालय में भी जाकर पूर्ण किया। बाद में जब भी मेरा बैठना उनके साथ होता पद्धति के क्रियान्वयन की चर्चा अवश्य करते थे। कार्य का नियोजन, पूरी क्षमता के साथ उसका क्रियान्वयन व उसके परिणाम की स्थिति का पूर्ण आकलन करना उनके कार्य रचना का भाग था। उनके इस प्रवास में हम सबने यह प्रत्यक्ष अनुभव किया था।
कार्यकर्ता की परख
1985 के बाद श्रद्धेय तोमर जी का केंद्र एक लंबी अवधि तक निराला नगर लखनऊ ही रहा। उस अवधि में परिसर स्थित विद्यालय के प्रधानाचार्य का दायित्व मुझ पर था। विदित है कि उनका आत्मीय व्यवहार व स्नेह अपने देश के अलग-अलग कार्यकर्ताओं को मिलता रहा। यह सौभाग्य मुझे सुलभ था। लखनऊ केंद्र पर रहते तो अनेक कार्यकर्ता बाहर से आते; उनसे वह यथा समय खूब बात करते थे। प्रवास में रहते समय औपचारिक कार्यक्रम के बाद सायंकाल उनका टहलने का स्वभाव नियमित रहा। उस समय कोई न कोई कार्यकर्ता उनके टहलने के समय साथ अवश्य रहता। टहलते-टहलते वह वार्ता करते और उसके गुण एवं क्षमताओं की परख भी कर लेते; साथ ही किसी जिम्मेदारी के कार्य का प्रस्ताव भी उसके समक्ष रखते थे।
वर्ष 1988, मार्च की बात है लखनऊ जिले के एक विद्यालय के प्रधानाचार्य श्री माधवेंद्र सिंह होली के अवसर पर उनसे मिलने आए। काफी देर तक बातचीत हुई; माधवेंद्र सिंह की क्षमताओं और परिश्रमी होने का भान उन्हें था। चलते-चलते उन्हें एक प्रस्ताव अंडमान निकोबार के पोर्ट ब्लेयर में विद्यालय की जिम्मेदारी संभालने का दिया और उसे माधवेंद्र सिंह ने स्वीकार भी कर दिया। अनेक वर्षों तक उन्होंने प्रधानाचार्य रहकर वहां का कार्य सफलतापूर्वक किया। अनेकानेक कार्यकर्ताओं की परख कर उन्हें दायित्व देकर जीवन पथ पर आगे बढाने का हुनर उनमें गजब का था।
स्मरण रहेगा उनका स्नेहपूर्ण व्यवहार
एक दिन पूर्वाह्न 11:00 बजे वह मेरे कार्यालय में अकस्मात आए; शिष्टाचार वार्ता के बाद एकदम पूछ पड़े विद्यालय में इस समय क्या हो रहा है प्रधानाचार्य जी? मूल्यांकन की दृष्टि से व्यावहारिक एवं प्रयोग आधारित ज्ञान का परीक्षण उस समय प्रत्येक कक्षा में आचार्य गण कर रहे थे तो मैंने भी वैसा ही उत्तर उन्हें दिया। फिर बोल पड़े; क्या आपके साथ मैं भी इस कार्य का अवलोकन कर सकता हूँ? खुशी-खुशी मैंने हां किया और उनके साथ चल पड़ा। कक्षा के बाहर से ही उन्होंने वह सब जानने की कोशिश की जो वहां संपन्न हो रहा था।
- 1. कक्षा में कहीं छात्रों से उनकी वाचन क्षमता, शब्द भंडारण की क्षमता, कविता पाठ या अभिव्यक्ति की परख एवं पाठ में वर्णित मूल्यों की जानकारी ली जा रही थी।
- 2. तो कहीं मानचित्र में स्थित राज्यों की सीमा पर दूसरे राज्य और उनकी राजधानी का नाम पूछने और बच्चों द्वारा तैयार किए गए मॉडल संबंधी वार्ता हो रही थी।
- 3. कहीं विज्ञान के विभिन्न पाठों से जुड़े प्रयोग करते हुए बच्चों से संबंधित सिद्धांत/उद्देश्य की जानकारी, सहायक सामग्री, क्रिया विधि और परिणाम की परख तथा सामान्य जीवन में उसके उपयोग की जानकारी आचार्य गण कर रहे थे।
- और कहीं हस्त कौशल विषय से जुड़े अनेक क्रियाकलाप करते हुए विद्यार्थियों के कार्य की परख आचार्य गण कर रहे थे।
सब कुछ लगभग लगभग सवा घंटे में उन्होंने अपनी आंखों से देखा और फिर मैं उनके साथ अपने कार्यालय में आ गया। उन्होंने कहा वैसे तो यह चाय पीने का समय नहीं है पर आपके साथ अभी चाय पियेंगे। इस अवधि में जो कुछ भी उन्होंने देखा था उस पर अनेक बातें मेरे उत्साह को बढ़ाने वाली थी। बात-बात में मेरे विश्वास को वह और अधिक विश्वास दे गए थे। यह कहते हुए “किसी भी विषय वस्तु की सम्यक जानकारी तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक वह सीखने वाले के व्यवहार में परिवर्तित ना हो जाए और वह अपने आगामी जीवन में उसका भरपूर उपयोग न कर सके”। साथ ही एक और बात की जानकारी दी कि हमारे स्टाफ में से ही किसी ने उन्हें यह बताया था कि परीक्षण में बहुत अधिक समय प्रधानाचार्य जी लगाते हैं। इस पर उन्हें लगा कि क्यों न विद्यालय चलकर ही इस विषय की प्रत्यक्ष जानकारी की जाए। इस पर मुझे लगा कि वह अखिल भारतीय स्तर के पदाधिकारी रहते मुझे अपने कार्यालय में भी बुलाकर इस विषय में पूछताछ कर सकते थे, पर नहीं वह स्वयं आए, मेरे साथ विद्यालय परिसर में घूम कर सब कुछ देखा और पूरी बात की। चाय के बाद उन्होंने शिशु मंदिर संदेश मासिक पत्रिका के तत्कालीन संपादक श्री हरीश जी को बुलाकर यह कहा “ज्ञान के व्यावहारिक स्वरूप की जानकारी व उसकी परख” विषय पर प्रधानाचार्य जी के साथ एक साक्षात्कार कीजिये और संदेश पत्रिका में प्रकाशित करिए। बाद में वह लेख प्रकाशित हुआ। उनका यह व्यवहार एक कार्यकर्ता के रूप में मेरे जीवन में अविस्मरणीय है, ऐसी थी उनकी विनम्रता और गुण ग्राहकता।
कथनी और करनी में कोई अन्तर नहीं
वर्ष 1996 में मुझे प्रदेश स्तर पर विद्यालयों के निरीक्षण, पर्यवेक्षण व प्रशासनिक कार्यों की जिम्मेदारी दी गई। कार्य का केंद्र भी लखनऊ तय किया गया। दायित्व ग्रहण करने के बाद मैं श्रद्धेय तोमर जी से मिलने व आशीर्वाद लेने गया उनके कार्यालय गया। मिलने पर वह बहुत प्रसन्न हुए, काफी देर तक उनसे बात करने के बाद विदा लेना चाहा तो उन्होंने एक पत्रिका मुझे दी और कहा कि इसे पढ़ना। पत्रिका साथ लेकर मैं वापस आ गया और यथा समय उसे आद्योपांत पढ़ा। पढ़कर मुझे लगा कि उसमें वर्णित साहित्य मेरे आगामी कार्य को दिशा देने वाले हैं। जिम्मेदारियां निभाते समय सांगठनिक सोच, कार्य की योजना, उसे पूरा करने का संकल्प, उसके क्रियान्वयन में सब की भागीदारी और कार्य परिणामकारी तो बने ही साथ ही मूल्यों की रक्षा भी हो; इसका संपूर्ण संदेश भी मिल गया। वह पत्रिका उस काल की थी जब वह उत्तर विजयनगर आगरा में प्राचार्य पद पर कार्यरत थे। तभी ध्यान में आया कि वह जिन बातों का आग्रह और संदेश अपने वक्तव्य में आचार्य, प्राचार्य तथा समिति के कार्यकर्ताओं के मध्य रखते थे वह सब कुछ प्राचार्य रहते क्रियान्वित कर चुके थे। विद्यालय में परिणामकारी अधिगम, छात्र संसद, उनकी परिषदों व विभागों में विद्यार्थियों की भागीदारी, योग आधारित शिक्षा सामाजिक सरोकारों से युक्त क्रियाकलाप व विद्यालय में संस्कारक्षम वातावरण कैसे बने; इन सब विषयों से जुड़े कार्य उनके परिसर में क्रियान्वित होते थे। तभी तो उनकी ओजपूर्ण वाणी से जो संदेश मिलता था उन्हें पूरा करने हेतु कार्यकर्ता पूर्ण मनोयोग से लग जाते थे। मनीषियों की कथनी व करनी में अंतर नहीं होता – यह अमर संदेश वह दे गए।
किसी लेख में संबंधित वर्णन की एक सीमा होती है एतदर्थ उनकी जन्म जयंती पर हम उन्हें स्मरण करते हुए संक्षेप में यह कह सकते हैं कि वह एक शिक्षा दार्शनिक, मनोविज्ञानी तथा मूलतः एक आध्यात्मिक प्रवृत्ति के महामनीषी थे। वह स्वयं को बीज बनकर बो गए थे।।
(लेखक शिक्षाविद है और विद्या भारती के अखिल भारतीय प्रशिक्षण संयोजक रहे हैं।)