सा विद्या या विमुक्तये
✍ नम्रता दत्त
शिशु के जीवन के प्रारम्भ्कि पांच वर्ष सीखने की नींव के वर्ष होते हैं। पांच वर्ष की यह सीख/शिक्षा सम्पूर्ण जीवन की नींव का कार्य करती है। नींव मजबूत होगी तो भवन (जीवन) मजबूत होगा। अतः इस अवस्था में शिशु के विकास को समझकर ही उसे सही वातावरण दिया जा सकता है। सामान्यतः माता-पिता/परिवार के सदस्य शिशु को छोटा समझ कर उसे अपने ढंग से सिखाने का प्रयास करते हैं। परन्तु शिशु का महज शरीर ही छोटा है, उसकी अन्तःप्रेरणा बहुत बङी है। इसी के कारण वह एक साधक/योगी है। इस अन्तःप्रेरणा के कारण ही वह माँ की गोद से अपने पैरों पर चलना, स्वयं भोजन खाना, अपने भावों को हाव भाव के साथ व्यक्त करना (भाषा) आदि आदि …..सीखता है अर्थात् हाथ, पैर और वाणी की कर्मेन्द्रियों साधने का अखण्ड प्रयास करता है। शिशु की अन्तःप्रेरणा के बिना यह सब कार्य माता-पिता अनेकों प्रयास के बाद भी नहीं सीखा सकते। यह सब ही शिशु की कर्मेन्द्रियों के विकास की क्षमताएं हैं। कुछ क्षमताएं प्रत्यक्ष रूप से विकसित होती हैं जैसे शारीरिक एवं प्राणिक क्षमताएं (वृद्धि और विकास) और कुछ अप्रत्यक्ष रूप से विकसित होती हैं जैसे, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक (अन्तःकरण को प्रभावित करने वाली) क्षमताएँ। इस सोपान में 3 से 5 वर्ष तक के शिशु की क्षमताओं के विकास की ही संक्षिप्त बात करेंगे। ये क्षमताएं पांच प्रकार की होती हैं –
घर में बना आयु के अनुरूप पौष्टिक भोजन, शान्त वातावरण में सुखद बिस्तर पर ली गई भरपूर नींद, घर में किए गए घरेलू कार्य एवं मैदान में किए गए खेल आदि के रूप में किये गये व्यायाम से शारीरिक क्षमताओं का विकास होता है।
अनौपचारिक शिक्षा – वैसे तो शारीरिक विकास के उपरोक्त मापदण्डों के अनुसार वृद्धि और विकास होना ही शारीरिक विकास है परन्तु इस अवस्था में ज्ञानेन्द्रियों को सही दिशा देना (अनुभव प्राप्ति हेतु) और प्राप्त अनुभव को अभिव्यक्त करने के लिए कर्मेन्द्रियों को सही वातावरण देना ही अनौपचारिक शिक्षा है। उदाहरण के लिए श्वेता अपने तीन वर्ष के बेटे और पांच वर्ष की बेटी को अपने साथ मन्दिर लेकर जाती है और जैसे पूजा अर्चना वह स्वयं करती है वैसे ही बच्चों को भी करने को कहती है। अतिथियों के आने पर वह स्वयं उन्हें सादर वंदन करती हैं और बच्चों को भी करने को कहती है। बच्चे जो भी आँख से देखते और कान से सुनकर अनुभव करते हैं वे उसकी अभिव्यक्ति अपनी कर्मेन्द्रियों (हाथ और वाणी) से करते हैं। अतः पहले करके दिखाना और फिर करने का मौका/वातावरण देना ही अनौपचारिक शिक्षा है। हाथ (पकङना, फेंकना, उछालना आदि), पैर (चलना, दौङना, कूदना आदि) वाणी (सुनकर, बोलकर और समझकर उचित जवाब देना) जैसी क्षमताओं को विकसित करने के लिए शिशुओं को सम्बन्धित गतिविधियां करने का अधिक से अधिक वातावरण देना चाहिए।
अगले सोपान में बौद्धिक (विज्ञानमयकोश) और आध्यात्मिक (आनन्दमयकोश) क्षमताओं के विकास की चर्चा करेंगे।
(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह-संयोजिका है।)
और पढ़ें : शिशु शिक्षा 38 – संस्कार एवं चरित्र निर्माण
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