-सोमदत्त शर्मा
भारतीय संस्कृति में संतों का योगदान अद्वितीय रहा है। भारत की यह भूमि युगों-युगों से तप, साधना और मानव कल्याण के लिए समर्पित महान विभूतियों की कर्मभूमि रही है। इन्हीं श्रेष्ठ संत परंपराओं में से एक हैं महान संत, दार्शनिक, कवि और अद्वैत साधक ब्रह्मलीन श्री श्री 1008 स्वामी नारायण गिरी जी महाराज, जिन्हें लोक में पंडित साधुराम के रूप में जाना जाता है। उनका जीवन भारतीय आध्यात्मिकता, कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का अनुपम उदाहरण है – एक ऐसा जीवन जो ‘नर से नारायण’ की यात्रा का सजीव प्रतीक बन गया।
आरंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि
पंडित साधुराम जी का जन्म हरियाणा राज्य की पवित्र भूमि कुरुक्षेत्र के ग्राम पबनावा में 13 दिसंबर 1904 (मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, विक्रम संवत 1960) को पंडित कृष्णलाल जी के घर हुआ। परिवार भगवद्भक्ति और वैदिक संस्कारों से परिपूर्ण था। उनके पिता त्रिकाल संध्या करते थे और दैनिक रूप से श्री आनंद बिहारी जी मंदिर में सेवा करते थे। एक दिव्य स्वप्न अनुभव के अनुसार, उनके पूर्वज पुत्र हरिनारायण ने पुनर्जन्म लिया और वही आत्मा नारायण शर्मा के रूप में वापस परिवार में आई। इस जन्म में वह बालक साधुराम कहलाया, जिसने आगे चलकर संन्यास धारण कर स्वामी नारायण गिरी जी के रूप में प्रसिद्धि पाई।
शिक्षा और गृहस्थ जीवन
गुरु महाराज ने प्रारंभिक शिक्षा गाँव बारना में आचार्य पंडित श्री भिक्षाराम जी से प्राप्त की। तत्पश्चात रंगवाला एवं दुर्गियाणा संस्कृत विद्यालय अमृतसर से ‘आचार्य’ की उपाधि ली और बोर्ड ऑफ आयुर्वेदिक एंड यूनानी सिस्टम ऑफ मेडिसिन, पंजाब से आयुर्वेदिक रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर बने। 1927 ईस्वी में उनका विवाह प्रसिद्ध वैदिक परिवार में हुआ, किंतु उनकी पत्नी कम आयु में ही स्वर्गवासी हो गईं। इस घटना ने उनके भीतर वैराग्य की लौ प्रज्वलित की। गृहस्थ रहते हुए भी वे सत्संग, स्वाध्याय और भजनोपदेश में निरंतर संलग्न रहे और “पबनावा ग्राम भजन मंडली” की स्थापना की।
संन्यास ग्रहण और देशाटन
समय आने पर पंडित साधुराम जी ने त्याग मूर्ति स्वामी चौदस गिरी महाराज जी से संन्यास दीक्षा प्राप्त की और ‘स्वामी नारायण गिरी जी’ बने। बारह वर्षों तक वे चारों धामों सहित भारतवर्ष के अनेक तीर्थों का भ्रमण करते रहे। यह काल उनका आत्मबोध और लोक शिक्षण का काल था। देशाटन के उपरांत जब वे अपने ग्राम पबनावा लौटे तो भव्य शोभायात्रा द्वारा उनका स्वागत हुआ। तत्पश्चात उन्होंने पुनः कुरुक्षेत्र को अपनी कर्मभूमि बनाया और हरियाणा के अनेक ग्रामों जैसे करोड़ा, भाणा, पाई, बरोट, नौच, सालवन, पबाना आदि में सत्संग, प्रवचन और भजनोपदेश के माध्यम से लोकजागरण किया।
साधु राम आश्रम की स्थापना
अपने ब्रह्मलीन होने से कुछ समय पहले उन्होंने अपने शिष्यों की विनती पर कुरुक्षेत्र में ‘साधु राम आश्रम’ की स्थापना 25 फरवरी 1988 को की। यह आश्रम आध्यात्मिक शिक्षा और लोककल्याण का केंद्र बन गया। 19 नवंबर 1989 को स्वामी नारायण गिरी जी ब्रह्मलीन हो गए। आज यह आश्रम सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट 1860 के अंतर्गत पंजीकृत है और हर वर्ष गुरु पूर्णिमा तथा मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी पर विशाल भजन-कीर्तन व भंडारे आयोजित किए जाते हैं।
साहित्यिक योगदान
स्वामी नारायण गिरी जी एक ओजस्वी साहित्यकार भी थे। उन्होंने समाज कल्याण और आत्मबोध के उद्देश्य से 17 प्रामाणिक ग्रंथों की रचना की, जिनमें प्रमुख हैं: पं. साधुराम की कापी (भजनोपदेश माला), श्रीमद्भगवद्गीता – ज्ञान प्रबोधिनी, दशरथ रामायण (तीन भाग), गुरु शिष्य संवाद, राम मिलन की राह, विचार तरंग, संकल्प शक्ति, जीव आत्मा और मन का संवाद, सत्संग महिमा, सतगुरु गीता, गर्भगीता, और श्री दत्तात्रेय जीवन चरित्र। इनकी ‘भजनोपदेश माला’ में 370 से अधिक भजनों का संकलन है। इन भजनों में कर्म, भक्ति, ज्ञान, योग, तथा मानव जीवन के गहन आध्यात्मिक रहस्यों का विवेचन लोकभाषा में किया गया है। इनका प्रमुख प्रभाव श्रीमद्भगवद्गीता पर आधारित है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों में ‘हरियाणवी लोकधारा’ नामक पाठ्यपुस्तक में इनके भजनों को शामिल किया गया। यह मान्यता इस बात का प्रमाण है कि पंडित साधुराम न केवल संत थे, बल्कि हरियाणवी लोकसाहित्य के समृद्ध संवाहक भी थे।
लोकजागरण और भक्ति परंपरा
पंडित साधुराम जी की भजनोपदेश माला ने साधना और भक्ति के मार्ग को जन-सुलभ बनाया। उनके भजनों में जीवन का तत्वज्ञान, कुसंग से बचने की प्रेरणा, और ईश्वर ध्यान की सरल विधि की व्याख्या है। उन्होंने श्वास-प्रश्वास के वैज्ञानिक रहस्य को ‘सोहं’ ध्यान के माध्यम से समझाया तथा कुंडलिनी जागरण के चक्रों का उल्लेख किया। उनके उपदेश साधारण जन के लिए आध्यात्मिक प्रयोगशाला बन गए। उन्होंने कहा कि सत्संग जीवन का सर्वोत्तम साधन है। इसी सिद्धांत पर चलते हुए उन्होंने भजन-मंडली परंपरा को स्थापित किया। परिणामस्वरूप हरियाणा के अनेक गांवों पबनावा, पाई, भाणा, बारना, सालवन, पबाना आदि में भजन मंडलियाँ बनीं, जो समानता व सामाजिक एकता का माध्यम बनीं।
सामाजिक समरसता और मानवता का संदेश
साधुराम जी जातिगत भेदभाव को नकारने वाले सर्वस्पर्शी संत थे। उनके शिष्यों में ब्राह्मण, राजपूत, गुर्जर, रैबारी, नाई, कुम्हार, अग्रवाल आदि सभी समुदायों के लोग सम्मिलित थे। उन्होंने कहा कि हर वह व्यक्ति “हरिजन” है जिसने काम, क्रोध, लोभ आदि पर विजय पा ली। उनके लिए भक्ति का मार्ग जाति, लिंग, संप्रदाय या सामाजिक स्थिति से ऊपर था।अद्वैत दर्शन की प्रतिष्ठापंडित साधुराम जी के साहित्य में अद्वैत वेदान्त का गहन दर्शन विद्यमान है। शंकराचार्य के कथन “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या” उनका आध्यात्मिक आधार था। उन्होंने अपनी काव्य रचनाओं और गद्य ग्रंथ “जीवात्मा और मन का संवाद” में स्पष्ट किया कि जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं। उनके भजनों में प्रश्नोत्तर शैली के माध्यम से तत्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि जैसे वेदांत सूत्रों का लोकभाषीय व्याख्यान प्रस्तुत है।

भारतीय ज्ञान परंपरा और योगविज्ञान
उनकी पुस्तक “राम मिलन की राह” में कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग का वैज्ञानिक विवेचन है। उन्होंने स्वर-विज्ञान और प्राणविद्या के सूक्ष्म ज्ञान से शरीर के भीतर की नाड़ियों इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना के शोधन की प्रक्रिया को सरल भाषा में बताया। उन्होंने प्रतिदिन की 21,600 श्वासों को देवतुल्य माना और प्राणशक्ति के जागरण को आत्म-उत्थान का साधन माना। भक्तियोग में उन्होंने प्रार्थना और नामजप के वैज्ञानिक रहस्य स्पष्ट किए, वहीं ज्ञानयोग में आत्मा को समस्त आनन्द का सार बताया। उनकी दृष्टि में शरीर एक रथ है, जिसकी दस इंद्रियां उसके अंग हैं—यह विचार उन्होंने ‘दशरथ रामायण’ में विस्तार से लिखा। भारत बोध और कुरुक्षेत्र महिमा ‘कुरुक्षेत्र पथ प्रदर्शक’ पुस्तक में उन्होंने 48 कोस की पवित्र भूमि, 767 तीर्थों और 9 नदियों का वर्णन किया। अपने भजनों में उन्होंने भारत की सांस्कृतिक अखंडता का गौरवपूर्ण चित्रण किया। उनके पदों में अहिंसा, गौ-संरक्षण और करुणा का संदेश झलकता है। वे मानते थे कि वही सच्चा हिंदू है जो जीव-हिंसा से दूर रहे और धर्म को करुणामय आचरण के रूप में जिए।
भाषा, शैली और काव्य-सौंदर्य
पंडित साधुराम जी की भाषा सरल, संगीतात्मक और लोकानुकूल थी। वे संस्कृत, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेज़ी सभी भाषाओं में निपुण थे। उनके भजनों में लय, छंद और अलंकारिक सौंदर्य के साथ हिन्दी-हरियाणवी मिश्रित शैली मिलती है। वे लोक की भाषा में शास्त्र का मर्म समझाने के अद्वितीय प्रतिभाशाली कवि थे। उनके भजनों में तत्सम, तद्भव, देशज, और विदेशी शब्दों का संतुलित प्रयोग दिखाई देता है ।उनके भजनों में कथा-शैली, तुलनात्मक दृष्टान्त, एवं संवादात्मक शैली का प्रयोग पाठक को आत्मानुभूति की ओर खींच लेता है। श्रीकृष्ण, राम और भक्त प्रह्लाद जैसी कथाएं उन्होंने प्रतीक रूप में उपयोग करके जीवन-दर्शन के गूढ़ संदेश को सरलतम भाषा में प्रस्तुत किया।
निष्कर्ष
संत नारायण गिरी उर्फ पंडित साधुराम जी का संपूर्ण जीवन भारतीय संत परंपरा की उज्ज्वल कड़ी है। उनके भजन, साहित्य, और उपदेश न केवल हरियाणा की लोकसंस्कृति को समृद्ध करते हैं बल्कि भारतीय अध्यात्म के सार्वभौमिक संदेश को पुनः जीवंत करते हैं। उनकी भजनोपदेश माला में लोक और वेद, अध्यात्म और विज्ञान, भक्ति और ज्ञान का सुंदर समन्वय है।वे जीवन के उस परम सत्य के साधक थे जिसे उन्होंने शब्द दिया — “नर से नारायण की यात्रा”। वास्तव में उनका जीवन, साहित्य और साधना उस परंपरा का जीवंत दीप है जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर आत्मज्ञान की पूर्णिमा से लोक को आलोकित करती है।
और पढ़े: सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ (सन् 1707-1807)
(लेखक पूर्व प्रधानाचार्य है एवं वर्तमान में विद्या भारती हरियाणा में शिशुवाटिका विभाग में पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता है।)