सा विद्या या विमुक्तये
– गोपाल माहेश्वरी
स्वदेशचंद्र जी आज सुबह से ही कुर्ता धोती पहनकर तैयार हो गए तो बेटे शिरीष ने पूछा “बाबूजी! आज कहाँ?” संघ की कोई बैठक है या कोई कार्यक्रम?” पिता-पुत्र दोनों ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे पर उनकी शाखाएं अलग अलग। स्वदेश चंद्र जी जिन्हें सब संघी मित्र सुदेश जी पुकारते थे और अन्य मिलने जुलने वाले सुदेश बाबू, वे प्रौढ़ शाखा के स्वयंसेवक थे, जबकि शिरीष जी तरुणों की शाखा के। संघ तो एक ही है बस आयुवर्ग से कार्यालय कालखंड थोड़े अलग रखे जाते हैं। शाखा से लौटकर पिताजी को यह वेश पहनते देखा तो शिरीष को आश्चर्य हुआ उसने जिज्ञासा से ही उन्हें टोका था।
“हाँ शिरीष! आज देश का एक बहुत बड़ा दिन है। बेटा! बताओ क्या है?”
शिरीष सोचने लगे ”वर्षप्रतिपदा तो निकल गई और हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव अभी आया नहीं? फिर क्या है आज?”
“बहुत बड़ा दिन है बेटा! तारीख कौनसी है आज?” सुदेश जी अपनी काली टोपी ठीक करते-करते बोले।
“आज तो दस मई है। आज क्या है? याद नहीं आ रहा।” शिरीष को कार्यालय जाने का समय हो रहा था वह स्नानघर में घुस गया। सुदेश जी मुस्कुराकर रह गए।
तभी उनकी बहू मालती ने कहा “बाबूजी! अल्पाहार करके जाइए, पता नहीं आपको किता समय लगेगा। आप अकेले जी जाएँगे या कोई संघी-साथी आ रहे हैं?” वह मेज पर अल्पाहार लगाते-लगाते पूछ रही थी।
सभी ने एक साथ बैठकर अल्पाहार किया।” आप अकेले जा रहे हैं कहीं?” शिरीष ने पूछा।
“बस यहीं एमवाय तक।” सुदेश जी ने सहज ही उत्तर दिया पर बेटे-बहू चौंक पड़े। इन्दौर में एमवाय एक बहुत बड़ा अस्पताल है, महाराजा यशवंतराव होलकर चिकित्सालय। लोग संक्षेप में एम वाय एच कहते हैं पर बोलचाल में इंदौरी लोग उसे एमवाय ही कह लेते हैं।
बेटे-बहू का चिंतापूर्ण भाव समझ कर सुदेश जी खिलखिलाकर हँसे और कहने लगे “बीमार नहीं हूँ, न भर्ती होना है …. अस्पताल कोई यह वेश पहनकर जाता है क्या?”
“तो अस्पताल नहीं जा रहे हैं?” बहू ने पूछा।
“जा तो वहीं रहा हूँ।” वे बातों के रस का आनंद लेने लगे।
शिरीष को जल्दी जाना था। वह उठते हुए बोला “किसी का स्वास्थ्य देखने या फल वगैरह बाँटने जाना होगा। अच्छा मैं तो चला, आपको वहाँ तक छोड़ दूँ?”
“नहीं नहीं छावनी से एमवाय इतना दूर भी नहीं, मैं पैदल ही जाऊँगा।” वे बोले।
“हाँ पर ट्राफिक खूब रहता है, सम्हलकर जाइए। अच्छा राम-राम।” शिरीष ने प्रतिदिन की भांति जाते समय पिता के चरण छुए।
“दादाजी! मैं चलूं?” उनके दस वर्षीय पोते नवीन ने उनका हाथ पकड़कर मनुहार की।
“चलना है?” वे सहमत होने के स्वर में बोले।
तभी सात वर्ष की भारती हठ करने लगी “भैया जाएगा तो मैं भी जाऊँगी, मैं भी जाऊँगी।”
मालती बोल पड़ी “बिलकुल नहीं। दादाजी को अपने काम से जाना है। वे अभी मंदिर नहीं जा रहे और बगीचे में शाम को ले जाएँगे। तंग मत करो। यहीं बैठकर ड्राईंग बनाना।”
“वैसे बहू! मैं भी बच्चों को वहाँ लेजाना चाहता हूँ।”
“येऽऽऽ” बच्चे ताली बजाकर उछलने लगे।
“पर बाबूजी! अस्पताल में बच्चों को ले जाना ठीक होगा? उस पर सड़क पर इतना ट्राफिक, आपको परेशानी होगी।”
“हम अस्पताल के अंदर रोगियों के बीच नहीं जा रहे और बच्चे जा रहे हैं तो ई-रिक्शा ले लेंगे। निश्चिंत रहो, परेशानी नहीं आनंद होगा। अभी तुम कह रही थी मैं मंदिर नहीं जा रहा हूँ। वैसे जा तो मंदिर ही रहा हूँ पर राम मंदिर या शिव मन्दिर नहीं।”
“आप ले जाइए बाबूजी! भोजन के समय तक लौट आएंगे न?” मालती ने विश्वास और विनम्रतापूर्वक कहा।
घर के सामने से ही जा रहे ई-रिक्शा को रोक कर तीनों में फिर एक रोचक बहस छिड़ गई। बड़ों के साथ जाते हैं तो बच्चों को न उनके न चाहने पर भी सुरक्षा की दृष्टि से बीच में बैठाया जाता था। पर आज तो बड़े केवल एक थे यानि दादाजी और बच्चे दो। नवीन ने मौका देखकर कहा “भारती सबसे छोटी है वह बीच में बैठेगी।”
“नहीं भैया! साइड में, तो मैं भी साइड में ही बैठूंगी।” भारती ने हठपूर्वक प्रतिवाद किया।
कोई बहुत लंबी दूरी तक तो जाना न था इसलिए सुदेश जी बोले “अच्छा, बीच में मैं बैठता हूँ।” उन्होंने सोचा बीच में बैठने से दोनों हाथों से दोनों बच्चों को सम्हालना सरल होगा। पर बच्चे भी नए युग के थे। भारती तपाक् से बोली “हाँ, दादाजी को सम्हालना हमारी जिम्मेदारी है, हम दोनों उन्हें सम्हाल लेंगे।”
दादाजी के साथ रिक्शे वाला भी यह सुनकर ठहाका लगाए बिना न रह सका। दस मिनट भी न लगे कि रिक्शा गंतव्य पर आ लगा।
रिक्शेवाले ने पूछा “बाबूजी! अस्पताल का गेट जरा आगे है, वहाँ उतारू।”
“नहीं भाई! हमें यहाँ ही उतार दो। अस्पताल नहीं जाना है।”
वे सड़क से पंद्रह बीस कदम अंदर चले गए। अंदर एक छोटे से पक्की झोंपड़ी जैसे स्थान में एक शाही पगड़ी पहने रौबीली मूछों वाले किसी महापुरुष की केवल छाती तक की प्रतिमा लगी थी। दादाजी ने उन्हें शीश झुकाया।
बच्चों ने भी प्रणाम किया। नवीन ने पत्थर पर लिखा नाम पढ़ा ‘राणा बख्तावर सिंह’।
भारती ने पूछा “दादाजी! ये कौन हैं? हम यहाँ क्यों आए हैं?”
“बच्चो! ये हैं अमझेरा के राजा राणा बख्तावर सिंह जी। अंग्रेजों के विरुद्ध मालवा व निमाड़ के वनवासियों को संगठित कर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते-लड़ते बलिदान देने वाले रणबांकुरों में इनका नाम सदैव अमर रहेगा।”
“लेकिन दादाजी! यहाँ लिखा है कि ये 10 फरवरी को बलिदान हुए थे तो हम आज यहाँ क्यों आए हैं?” नवीन ने कोतूहल से पूछा।
भारती भैया से पीछे कैसे रहती? उसने भी एक प्रश्न पूछा “आप कह रहे थे ये अमझेरा के राजा थे तो हम यहाँ क्यों आए हैं?”
सुदेश जी के लिए उत्तर देना आवश्यक था बल्कि बच्चों को यहाँ लाने का उद्देश्य भी इस बातचीत में पूरा हो रहा था। वे बोले “यहाँ इसलिए आए हैं कि ये नीम का पेड़ देख रहे हो न?” सुदेश जी ने पास ही स्थित एक नीम के पुराने पेड़ उस पेड़ के तने को छूकर हाथ मस्तक से लगाया। भावुकता से उनका कंठ भर आया “दुष्ट अंग्रेजों ने इसी पेड़ पर राणाजी को फांसी दी थी एकबार नहीं दो बार।”
“दो बार!! दो बार क्यों? दादाजी!” नवीन ने पूछ ही लिया।
“दो बार इसलिए कि राणाजी इतने हृष्ट-पुष्ट और बलशाली थे कि फांसी की रस्सी उनका भार ही न सह पाई, टूट गई।”
“अच्छा!!!” बच्चों ने आश्चर्य प्रकट किया।
“हाँ, और तब सारे नियम ताक पर रखकर उन्हें दोबारा फांसी दी गई। तब से यह पेड़ यहीं खड़ा, उस महान बलिदानी वीर की याद दिलाता रहता है।”
भारती के प्रश्न का तो उत्तर मिल गया था पर नवीन का प्रश्न छूट रहा था। उसने प्रश्न दुहराया तो दादाजी बोले “बेटा! दुःख की बात है कि लाखों की जनसंख्या वाले इस इन्दौर महानगर में अधिकतर लोगों को तो पता भी नहीं है कि यह कितनी ऐतिहासिक जगह है। कुछ देशभक्तों के प्रयत्न से यह पेड़ कटने से बचा है। वे गिनती के लोग आते हैं उनके बलिदान दिवस पर यहाँ। लेकिन…..” वे कहते-कहते कहते जैसे वे कहीं खो गए, एमवायएच के सामने के भरपूर भीड़ वाली कोलाहल भरी सड़क का सारा शोर जैसे उनके लिए गायब हो चुका था। वे एक हाथ से उस नीम के वृक्ष को छूते हुए आकाश की ओर देखते कहने लगे “कैसे कोई बलिदानी इतने व्यस्त और बड़े महानगर में भीड़ में एकांत काट रहा है शताब्दी दर शताब्दी। मनुष्य को फांसी दी जाती है पर उसकी स्मृतियों को भी कोई ऐसे फांसी पर लटकाए रखता है क्या? स्वतंत्रता पाकर इतने कृतघ्न हो गए हैं हम?” ये उद्गार बच्चों को समझ में नहीं आ सकते पर उन्हें समझाना ही होगा यह हर दादाजी-दादीजी का कर्तव्य है कि अपने पोते-पोतियों को यह समझाएँ कि स्वतंत्रता नहीं मिली है बिना खड्ग बिना ढाल।
वे कहने लगे “बच्चो! आज दस मई है। अठारह सौ सत्तावन में आज ही हमारी स्वतंत्रता के पहले महासंग्राम का आरंभ हुआ था। इतनी व्यापक क्रांति इसके पहले नहीं हुई थी कि तेरह बरस की मैना से लेकर अस्सी बरस के बाबू कुंवर सिंह एक साथ अपने-अपने स्थान पर लड़े, बलिदान हुए। तुम जानना चाहते हो न कि मैं आज यहाँ क्यों आया हूँ। अलग-अलग शरीर होते हुए भी देश की स्वतंत्रता के लिए मर-मिटने वाले सभी वीरों वीरांगनाओं का ध्येय एक ही था। देहरूप भिन्न पर ध्येयरूप एक ही। इसलिए अपने-अपने क्षेत्र के ऐसे वीर बलिदानियों को आज क्रांति दिवस पर याद कर हम उन एकात्म महापुरुषों को स्मरण करें तो उनके कभी न चुकाए जा सकने वाले ऋण को संभवतः अंशमात्र तो चुका पाएँ।”
धोती के पल्लू से अपने बहते आंसू पोंछते हुए वे बच्चों सहित राणाजी को प्रणाम करके पैदल ही सड़क की भीड़ में धंस गए। पास ही चौराहे पर हनुमान मंदिर था। वे प्रणाम करने रुके। शीश झुकाए नवीन बुदबुदाते हुए कह रहा था “हे हनुमानजी महाराज! मुझे भी राणाजी जैसा वीर बनाना।”
अचानक हवा का एक झोंका नीम के कुछ फूल उड़ाकर नवीन के झुके शीश पर बरसा गया। पता नहीं फूल उसी पेड़ के थे या दूसरे किसी के पर दादाजी को लगा मानो राणाजी की आत्मा आशीष देकर गुजरी है वहाँ से। फूलों की कड़वी शीतलता कितनी आरोग्यकारी थी।
(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)
और पढ़ें : नए भारत का संकल्प
Your email address will not be published. Required fields are marked *
Comment *
Name *
Email *
Website