सा विद्या या विमुक्तये
– गोपाल माहेश्वरी
“अरी मीनू! अपने पिताजी को कहना गैस सिलेंडर बुक किया कि नहीं।”
“क्या माँ! अभी नया सिलेंडर लगाए चार दिन भी नहीं हुए और आपको दूसरा भरवाना है!”
“रसोई मुझे बनानी पड़ती है बेटी! तुम बाप-बेटी को किसी दिन भोजन एक-आध घंटा देरी से मिले तो ताना मिलता है मुझे, रहने दो, आनलाइन कुछ मंगवा लेते हैं। समझी? लेकिन समझ लो, गैस की कमी होने वाली है और बाजार में भी कई रेस्टोरेंट्स बंद हो गए हैं। गैस न मिली तो क्या पकाएंगे और क्या खाएंगे?” माँ का स्वर बहुत चिंताभरा था।
“क्या माँ! ईरान की तरह मिसाइलें दाग रही हो। अरे, ऐसा कोई संकट नहीं है हम चालीस से अधिक देशों से क्रूड आइल खरीदते हैं। प्रधानमंत्री जी ने कहा है, पेनिक न हों, देश में अभी ऊर्जा का ऐसा कोई संकट नहीं है जिसका समाधान नहीं हो सके।”
“थोड़ा बहुत मैं भी समझती हूँ बेटी! आज नहीं तो कल, युद्ध लंबा खिंच गया तो प्रधानमंत्री भी क्या कर लेंगे?”
तभी पिताजी बाहर से आए। उनके हाथों में एक समाचार पत्र था। पहले ही पृष्ठ पर आधे पन्ने का बड़ा-सा चित्र छपा था जिसमें पेट्रोल पंपों पर भारी भीड़ दिख रही थी। वे बोले “हद है मूर्खता की किसी ने कहा, कौआ कान ले गया तो कान नहीं देखेंगे कौए के पीछे दौड़ने लगेंगे।”
“क्या हुआ? किसे मूर्खता का प्रमाणपत्र बांट रहे हो?” माँ का स्वर थोड़ा व्यंग्य भरा था।
“ये पेट्रोल डीजल के लिए बिना जरूरत भीड़ लगाने वालों को।” वे समाचार पत्र पर चित्र दिखाने लगे।
माँ जैसे उनसे सहमत न थी, बोलीं “जमाने को जाने दो, आपने अपनी कार और दोनों टूव्हीलर में फुलटैंक करवा लिया है न?”
पिताजी चिढ़ गए “अच्छा ऐसा करो कुछ ड्रम-कनस्तर भी दे दो, वह भी भरवा लेता हूँ। कहो तो लीटर दो-दो लीटर पी भी लें। थोड़ा स्टोर हो जाएगा।”
मीना समझ गई। घर में भी पेट्रोल और गैस महायुद्ध मचवा देंगे। अब उसे जैसे युद्धरत देशों में भारत जैसी भूमिका निबाहना थी। वह माता-पिता की चिंता समझ रही थी। लेकिन पिताजी वास्तविक परिस्थिति से परेशान थे और माँ काल्पनिक चिंता से ग्रसित थीं। तीन दिन का ईंधन उनकी गाड़ियों में भी था और दो महिने की गैस रसोई में भी। लेकिन अफवाहों का बाजार गर्म था एकदम निराधार संकट का आभासी भय अधिकांश को निर्बुद्ध बना रहा था।
मीना ने वातावरण बदलने का प्रयास करते हुए कहा “माँ! पिताजी! मेरा परीक्षा-परिणाम आ गया है और मैं हमेशा की तरह प्रथम आई हूँ।”
“अरे वाह! शाबास बेटी! बधाई, बधाई।” पिताजी ने उसे बगल में सटाते हुए कहा। माँ भी रसोई से निकलकर हाथ पोंछते हुए आई “शाबास मेरी बेटी! तेरी सारी मेहनत सफल हुई।” वे ममता से बेटी के सिर पर हाथ फेर रहीं थीं।
“ना माँ पिताजी! ऐसे खाली-माली बधाई नहीं, आपने वचन दिया था जो मांगूंगी मिलेगा।”
“हाँ हाँ, बता क्या चाहिए?” पिताजी ने कहा।
माँ ने भी प्रोत्साहित करते हुए बोली “बता बता, क्या चाहिए?”
“मुझे जाना है पूरी छुट्टी कहीं घूमने।”
“घूमने? पर बेटा अभी जैसी परिस्थिति चल रही है उसमें बाहर कहीं फंस गए तो गाड़ी का और अपना पेट भरना कठिन हो जाएगा।”
पिताजी बोले तो मीना के मस्तिष्क ने तुरंत खतरे की घंटी बजा दी कि कहीं फिर वही विषय न छिड़ जाए? क्योंकि पिताजी भी कहीं मन के एक कोने में आशंका तो पाले बैठे ही थे।
“पिताजी! मैं और मेरे सभी सहपाठियों ने इस बार एक अनोखी योजना बनाई है। हम सब इन छुट्टियों में सपरिवार अपने उन रिश्तेदारों से मिलने जाएंगे जो गांवों में रहते हैं।”
“और इससे क्या होगा?” माँ ने पूछा।
“इससे मेरे देश को सहायता मिलेगी।”
“कैसी सहायता? गाँव जाने से देश की समस्या का क्या संबंध?”
“संबंध है। यह ऊर्जा संकट हमेशा नहीं रहेगा। अभी यदि इसके बढ़ने की जितनी भी संभावना है उससे निपटने के लिए हम चलें अपने गांवों की ओर। एक तो वहाँ ऊर्जा के विकल्प सुलभ हैं। हम अपने फ्लेटों में चूल्हा नहीं जला सकते पर गांवों में सब जगह लकड़ी कंडे हैं, चूल्हे हैं। कई जगह गोबर गैस प्लांट है।”
“इंडक्शन चूल्हे तो यहाँ भी ले रहे हैं लोग।” माँ ने कहा।
“माँ! गर्मियों में वैसे ही बिजली की खपत अधिक होती है। सब गैस की जगह इंडक्शन चलाएंगे तो बिजली का भी संकट होने लगेगा। भोजन बनाने के अलावा कितने ही काम हैं जिनमें बिजली चाहिए ही चाहिए। तब?”
“मैं तो सोलर कूकर लाने की भी सोच रहा हूँ।” पिताजी ने जोड़ा।
“सोलर कूकर के लिए सबको छत या खुला आँगन चाहिए, वह शहरों में सबको कहाँ मिलेगा? यह एक अच्छा उपाय है पर सबके लिए संभव नहीं।”
“ऐसे तो सब शहर छोड़कर गाँव चल दिए तो गाँव इतने मेहमानों के बोझ से ही समाप्त हो जाएंगे। सब लकड़ी जलाएंगे तो बचे-खुचे जंगल भी गंजे हो जाएंगे रेगिस्तान बन जाएंगे।” पिताजी जैसे बेटी की प्रसन्न होकर परीक्षा ले रहे थे।
मीना ने अपनी तार्किक क्षमता का परिचय देते हुए कहा “जी नहीं पिताजी! सबको नहीं, जो जा सकते हैं उतनों के ही जाने से काम चल जाएगा। जिन्हें बहुत आवश्यक है या जिनके कोई रिश्तेदार गांवों में नहीं हैं वे यहीं रहें न? पेट्रोल, डीजल, गैस बिल्कुल खत्म तो नहीं हुए हैं। उपयोग कम होगा तो लंबे समय इस बिन बुलाए संकट की घड़ी को पार कर जाएंगे हम। दूसरे आपने कहा पेड़ नहीं बचेंगे। बताइए पिताजी! बिजली तो हर व्यक्ति नहीं बना सकता पर पेड़ तो लगा सकता है न? ठीक है पेड़ दो-चार दिन में नहीं बढ़ते पर दो-चार पीढ़ियों तक चलते हैं, उनसे आवश्यकता भर ईंधन लेना हो तो पूरा काट देना मूर्खता है, जैसे सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को लालच में मार डालने वाले मूर्ख की कहानी है। या चमड़े के लिए भैंस मार देने का मुहावरा। हो सकता है गाँव पहुँचने वाले अतिथि न बनकर, अपने बन कर रहें तो उपयोग की गई लकड़ी से अधिक ही पेड़ गांवों को मिल जाएं।”
पिताजी संतुष्ट दिखे फिर भी एक प्रश्न और उछाल ही दिया “लकड़ी, कंडे प्रदूषण नहीं फैलाएंगे?”
“हाँ, कुछ प्रदूषण होगा पर शहरों के एसी और वाहनों से कम। फिर ये जो लड़ने वाले देश बारूदी धुंए का जहर हवा में घोल रहे हैं इसे अपने देश की सीमाओं तक ही तो रोके नहीं रहेंगे, यह तो लड़ने, न लड़ने वाले सब देशों के प्राणी मात्र के लिए अचूक खतरा है न पिताजी! चूल्हे का धूंए का प्रदूषण तो किसी सीमा तक तो प्राकृतिक एयर क्यूरीफायर यानि पेड़ सोंख लेंगे पर युद्ध की ये रासायनिक गैसें?”
“ठीक है बेटी! तुम्हारा प्रस्ताव उचित है। हम कल ही अपने गाँव चलेंगे। मैं आठ-दस दिन रहकर लौट आऊंगा। तुम पूरी छुट्टियां बिताकर आ सकते हो।”
“धन्यवाद पिताजी! मुझे अपना पुरस्कार मिल गया। बहुत-बहुत धन्यवाद।” मीना ने हर्ष व्यक्त किया।
“अच्छा आपके विचार से प्रभावित होकर एक आलेख लिखने का मन बना है अनुमति है मीना जी!” पिताजी थोड़ी नाटकीयता के साथ कहने लगे तो सबके मुखड़े खिल उठे।
उत्साहित मीना ने तपाक् से कहा “पहले हमें बताइए लेखक महोदय! आप विषय की अभिव्यक्ति कैसे करेंगे, तब अनुमति रहेगी।”
पिताजी ने हँसते हुए कहा “जो आपकी इच्छा।” फिर वे थोड़ी गंभीरतापूर्व क कहने लगे “देखो, विश्व समस्या में है, हमारा देश संभावित बड़े संकट की आहट अनुभव कर रहा है ऐसे में सरकार को कोसने या उसी के भरोसे बैठे रहने की अपेक्षा हमें अपने स्तर पर कुछ समाधान खोजना चाहिए यह हमारा नागरिक कर्तव्य है। हम प्रकृति की रक्षा और प्रदूषण कम करने के उपाय सोच रहे हैं यह पर्यावरण संरक्षण है। गाँव जाना, परिवार और रिश्तेदारों से मिलना उनके साथ रहना कुटुंब व्यवस्था सुदृढ़ करने का ही महत्वपूर्ण उपक्रम है। हम अपनी परंपराओं में आश्रय खोजें, अपनी धरती, संस्कृति और परंपराओं में रचें-बसें और अपने हर संभव त्याग से जिन्हें अधिक आवश्यकता है उनके लिए सुविधा कर सके यह हमारी संस्कृति है। हम शहरवासी अधिक सभ्य हैं और गांवों में रहने वाले गंवार यह भेद मिटाकर उनकी सरलता, निश्छलता और अपनत्व को अपनाना यह समरसता है। हाँ, यह अपनत्व अभी हम संकट में हैं इसलिए अनुभव करें यह स्वार्थ होगा पर संकट के कारण ही सही इस प्रकार उनका महत्व अनुभव हो, उनसे लगाव बढ़े यह बड़ी महत्वपूर्ण पहल होगी। इसलिए इन छुट्टियों में ऊर्जा संकट से निपटने के बहाने ही सही हमें अपनी ग्रामवासिनी भारत माता की सेवा करने, ममता पाने का अवसर मिल जाए और यह हमारे मन में सच्ची भक्ति और लगाव बन जाए तो भारत को वह अक्षय ऊर्जा प्राप्त रहेगी जो हर संकट पर भारी होगी।……क्या कहतीं हैं आप, ठीक है यह?”
“एक बात रेखांकित आप भूल रहे हैं लेखक महोदय! यह उपाय बच्चों ने सुझाया है यानि यह है नए भारत का शुभ संकल्प।”
सभी ने ताली बजाकर इस परिवार सभा का विसर्जन किया उन्हें गाँव जाने की तैयारी जो करनी थी।
(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)
और पढ़ें : देश के लिए जियें
Your email address will not be published. Required fields are marked *
Comment *
Name *
Email *
Website