छोटे का गांव

 – रवि कुमार

मरुभूमि में फलोदी के पास एक गांव में एक किसान रहता था। उसके दो पुत्र व एक पुत्री थी। किसान के पास कृषि योग्य भूमि भी अधिक थी। दोनों पुत्रों व पुत्री की प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय में हुई। आगे की शिक्षा के लिए छोटे पुत्र को बड़े नगर में भेज दिया और बड़ा पुत्र व पुत्री की आगे की शिक्षा फलोदी में हुई।

मरुभूमि में जल की उपलब्धता सीमित ही रहती है। सीमित जल में ही कृषि कार्य, पशुधन का पोषण व जीवनयापन यहां का वैशिष्ट्य है। इस वैशिष्टय के साथ यह किसान परिवार भी जीवन जीता रहा। छोटा पुत्र बड़े नगर से अपनी शिक्षा पूर्ण कर गांव में ही आ गया। दोनों पुत्रों की इच्छा थी कि अपना आगे का जीवन गांव में ही रहकर चलेगा, नगर की ओर प्रस्थान नहीं करेंगे। पुत्री भी बड़ी हो गई, उसका भी विवाह कुशलता से हो गया और वह अपने ससुराल में रहने लगी।

किसान की आयु अधिक होने लगी और आयु का प्रभाव शारीरिक क्षमताओं पर दिखने लगा। उसे लगा कि जीवित रहते दोनों भाइयों में सम्पत्ति का बंटवारा कर दूं ताकि बाद में कोई कठिनाई न हो। इस विषय की चर्चा घर में चलते ही दोनों पुत्र नहीं माने। परिवार व गांव का संस्कार जो उनमें था। पर पिताजी का आज्ञा कैसे टाल सकते थे। पिताजी ने बराबर बराबर संपत्ति का बंटवारा कर दिया।

पिताजी के देहांत के पश्चात दोनों पुत्रों का परिवार अपने अपने भाग में रहने लगा। छोटा पुत्र बड़े नगर में रहकर आया था। कभी कभी उसके मन में वहां की चकाचौंध स्मरण हो आती थी। इस मनोभाव का प्रभाव धीरे धीरे उसके व्यवहार व जीवन पर भी होने लगा था।

बहन जब घर पर आती तो उसे भी वह सब दिखने लगा था। उसका मन छोटे के यहां कम व बड़े के यहां अधिक लगता था। छोटे भाई की तुलना में बड़े भाई का व्यवहार, खान-पान, रहन-सहन, जीवन आदि पर ग्राम्य जीवन की छाप दिखाई देती थी। छोटा कभी कभी बड़े भाई को सुझाव भी दे देता था, “भैया, दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है। आप अभी भी पुराने युग में जी रहे हैं। आधुनिकता को अपनाओ।” बड़ा मुस्कराकर बात को टाल देता था। कोई उत्तर नहीं देता था।

एक दिन उस गांव में एक संत पधारे। बहुत लंबे समय बाद उस संत का उस गांव में आना हुआ। दोनों भाइयों के पिताजी इन संत के भक्त रहे थे। पिताजी जब जीवित थे तब ये संत उस गांव में पधारे थे और इसी परिवार में उनका आवास, सत्संग-प्रवचन कार्यक्रम हुआ था। इस बार भी यहीं रुके बड़े भाई के घर।

दिन में ग्रामवासियों के साथ भेंट का कार्यक्रम था। इस कार्यक्रम के दौरान छोटा भाई भी दर्शन व सान्निध्य हेतु आया था। संत ने पूछा, “गांव में कैसा है सब?” गांव के लोगों ने जैसा जैसा था, वैसा उल्लेख किया। संत ने छोटे भाई से पूछा कि “तुम्हारा कैसा चल रहा है जीवन।” छोटे ने उत्तर दिया, “बहुत अच्छा चल रहा है।” संत ने पुनः पूछा, “सब अच्छा चल रहा है या तुम्हें लगता है कि अच्छा चल रहा है?” छोटे ने कहा कि गुरुवर आपका आशय मैं समझा नहीं।

संत ने कहा, “मेरा आशय तुम्हारी जीवन शैली से है, खान-पान, रहन-सहन, व्यवहार आदि से। गांव में बड़ी चर्चा है कि तुम बड़े आधुनिक होते जा रहे हो और अन्यों को भी आधुनिक जीवन जीने के लिए प्रेरित करते रहते हो।”

“गुरुवर, आपने सही सुना है। मैं तो बड़े भैया को भी निवेदन करता रहता हूँ, पर वे मानते ही नहीं। हंसकर टाल देते है मेरी बात। आप ही समझाइए इन्हें।” छोटे ने कहा।

संत ने कहा, “आधुनिक होना गलत नहीं है। पर किस बात को आधुनिक कहा जाए, ये विचारणीय प्रश्न है।” सबने बड़ी जिज्ञासा भरी नजरों से संत की ओर देखा। संत ने आगे कहा, “घर के आंगन व आसपास पेड़-पौधे न होना आधुनिक है? प्रकृति के निकट न होकर प्रकृति से दूर होना आधुनिक है? घर का सौंदर्य अच्छा करने के लिए बड़े-पुराने फलदार व औषधीय पेड़ों को काटकर उस लकड़ी का प्रयोग करना आधुनिक है?”

उनमें से एक युवा ने प्रश्न किया, “क्या नगरीय जीवन शैली अपनाना गलत है?” संत ने उत्तर दिया, “आप ही सोचो कि ग्राम्य जीवन की परंपराओं को छोड़कर नगरीय जीवन की बातें जो पश्चिम से आई है, उन्हें अपनाना क्या आधुनिक माना जाएगा?”

संत की बातें सुनकर वहां शून्यता छा गई, समय जैसे रुक-सा गया हो। छोटे को भी समझ आ रहा था कि मैंने आधुनिकता के नाम पर क्या किया है और इसी आधुनिकता के लिए गांव में मैं जो प्रेरणा दे रहा था, वह कुछ और ही था। वहां उपस्थित कुछ युवा जो छोटे की बातों से अब तक सहमत होते थे, उनकी आंखें खुल रही थी।

(लेखक विद्या भारती जोधपुर प्रान्त के संगठन मंत्री है।)

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