भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 61 (विज्ञान का सांस्कृतिक स्वरूप)

 – वासुदेव प्रजापति

आज का युग विज्ञान का युग माना जाता है। कुछ लोग तो आज के युग का देवता विज्ञान को ही मानते हैं। और ऐसी हवा बना दी गई है कि विज्ञान पढ़ने वाले बुद्धिमान होते हैं। इस सन्दर्भ में सांस्कृतिक दृष्टि से कुछ बातों का विचार करना आवश्यक हो जाता है।

  1. आज जिसे हम विज्ञान कहते हैं, वह भौतिक विज्ञान है। भारतीय संकल्पना में केवल अन्नमय और प्राणमय जगत को ही विज्ञान नाम दिया गया है। यह एक अधूरी व अनुचित संकल्पना है। भारत में वास्तविक विज्ञान का दायरा भौतिक विज्ञान से लेकर आत्म विज्ञान तक का है, जिसमें मनोविज्ञान का भी समावेश हो जाता है।
  2. वैज्ञानिकता का सही अर्थ शास्त्रीयता है। यह बुद्धि का क्षेत्र है, तर्क का क्षेत्र है। भारतीय परम्परा से देखें तो न्याय का क्षेत्र है और तत्त्व ज्ञान का क्षेत्र है। जो बात तर्क से सिद्ध नहीं होती, वह वैज्ञानिक नहीं है। आज जो भौतिक विज्ञान की प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं होता, उसे मान्यता नहीं मिलती। इस मान्यता से मुक्त होकर विज्ञान का व्याप बढ़ाने की आवश्यकता है।
  3. आज का विज्ञान सभी बातों का मापदंड नहीं हो सकता। वास्तव में सामाजिकता ही वैज्ञानिकता का मापदंड होना चाहिए। ध्यानपूर्वक मनन करें तो विज्ञान स्वयं ज्ञान नहीं है, अपितु ज्ञान तक पहुँचने की प्रक्रिया है। प्रक्रिया कभी निर्णायक नहीं हो सकती, ज्ञान ही निर्णायक होता है। देखा जाए तो विज्ञान सभ्यता के विकास के लिए है, और सभ्यता का निकष संस्कृति है। इसलिए विज्ञान संस्कृति के लिए है, संस्कृति विज्ञान के लिए नहीं। आज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए यह एक मूलभूत परिवर्तन है।
  4. भावना, क्रिया और विचार की अपेक्षा बुद्धि की प्रतिष्ठा विशेष है। अतः अन्य सभी आयामों को बुद्धिनिष्ठ बनाना चाहिए, किन्तु बुद्धि को आत्मनिष्ठ बनाना अपेक्षित है। इसलिए विज्ञान को भी आत्मनिष्ठ बनाना चाहिए।

भारत की विज्ञान दृष्टि

भारत के परमाणु विज्ञानी महर्षि कणाद अपने वैशेषिक दर्शन में कहते हैं कि “दृष्टानां दृष्ट प्रयोजनानां दृष्टाभावे प्रयोगोभ्युदयाय” अर्थात् प्रत्यक्ष देखे हुए और अन्यों को दिखाने के उद्देश्य से अथवा स्वयं और गहराई से ज्ञान प्राप्त करने हेतु किए गए प्रयोगों से अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त होता है। महर्षि गौतम सामान्य कण से लेकर ब्रह्माण्ड तक का प्रयोजन जानने के लिए न्याय दर्शन में सोलह चरण की प्रक्रिया बतलाते हैं। प्रमेय अर्थात् जिसे जानना है, प्रमाण अर्थात् वे साधन जिनसे जानने का प्रयत्न करते हैं। संशय अर्थात् जिसके कारण जाँच-पड़ताल की जाती है। समाधान के सब अंगों को अलग-अलग जानना अवयव कहलाता है। उसके बाद प्रतिज्ञा (हायपोथिसिस) रखी जाती है। तत्पश्चात हेतु, उदाहरण आदि के माध्यम से सत्य तक पहुँचने का प्रयत्न होता है। कुल मिलाकर इस प्रकार की प्रक्रिया बताई गई है।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ब्रह्म के समग्र रूप को जानने के लिए ज्ञान-विज्ञान दोनों को जानना चाहिए। क्योंकि इन्हें जानने के बाद कुछ भी जानना शेष नहीं रह जाता। वे आगे कहते हैं कि पृथ्वी अर्थात् ठोस, जल अर्थात् द्रव, वायु अर्थात् गैस, अग्नि अर्थात् ऊर्जा के साथ आकाश, मन, बुद्धि व अहंकार तथा ये सब जिसमें हैं, वह परम चेतन तत्त्व इन सबके बारे में जानना चाहिए।

ज्ञान-विज्ञान का अंतिम उद्देश्य जगत के अंतिम कारण को खोजना है। इस दृष्टि से अनेक सन्दर्भों का वेदों, उपनिषदों एवं दर्शन ग्रंथों में पर्याप्त उल्लेख मिलता है। इनमें सृष्टि की उत्पत्ति, क्रम तथा लय प्रक्रिया, सृष्टि संचालन के नियमों का उल्लेख है। इसके साथ-साथ व्यावहारिक विज्ञान की दृष्टि से भौतिकी, रसायन, वनस्पति शास्त्र, कृषि, गणित, नक्षत्र विज्ञान, जीव शास्त्र, आयुर्वेद, धातु विज्ञान और विभिन्न कला-कौशल भी अध्ययन व प्रयोग का क्षेत्र था।

छांदोग्योपनिषद में नारदजी व सनतकुमारजी के संवाद से ज्ञात होता है कि एक बार नारद सनतकुमारजी के पास गए और उनसे प्रार्थना की भगवन! मुझे ज्ञान दीजिए। तब सनतकुमारजी ने पूछा, तुमने क्या पढ़ा है, कितना जानते हो? इसके उत्तर में नारद कहते हैं, भगवन्, मैंने चारों वेद, पुराण रूपी पाँचवाँ वेद, इतिहास, व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, ज्योतिष, विधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र,  देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, गारुड़ मंत्र, देवजन विद्या, नृत्य, संगीत, शिल्प ये सब पढ़ा है। आगे वे कहते हैं, मैं मंत्र वेत्ता हूँ, परन्तु आत्मवेत्ता नहीं हूँ। अतः वह ज्ञान मुझे दीजिए।

नारदजी व सनतकुमारजी के संवाद से स्पष्ट होता है कि आज विज्ञान में जितनी शाखाएँ हैं, उनसे भी अधिक विषयों का ज्ञान नारदजी को था। वे सबसे श्रेष्ठ ज्ञान आत्मज्ञान को जानना चाहते हैं। अर्थात् विज्ञान का भी अंतिम लक्ष्य आत्मज्ञान ही है। इसलिए आज के विज्ञान को भी आत्मनिष्ठ बनना होगा। यही भारतीय विज्ञान दृष्टि है।

आज विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की बात बोली जाती है। इस पर मनन करने की आवश्यकता लगती है। विज्ञान और अध्यात्म समान संकल्पनाएँ नहीं हैं। विज्ञान अध्यात्म का ही एक भाग है। विज्ञान के निकष अध्यात्म में मिलते हैं। यही भारतीय विज्ञान दृष्टि है। भारतीय दृष्टि से विज्ञान का विचार करने पर हमें आज के विज्ञान में बहुत कुछ जोड़ने की आवश्यकता प्रतीत होती है। वे जोड़ने वाले बिन्दु अधोलिखित हैं –

  1. भौतिक विज्ञान को पंचमहाभूतात्मक संकल्पना का आधार देना चाहिए। ऐसा करने से भौतिक विज्ञान के आकलन में बहुत बड़ा परिवर्तन आ सकता है। उदाहरणार्थ सृष्टि विज्ञान में अष्टधा प्रकृति की संकल्पना जुड़ते ही तीन गुण सत्व, रज व तम भी जुड़ जायेंगे। जिससे पदार्थ का स्वरूप ही बदल जाएगा।
  2. प्राणी विज्ञान के क्षेत्र में प्राण का विचार करना ही होगा। प्राण का विचार करते ही शरीर विज्ञान, वनस्पति विज्ञान और प्राणी विज्ञान का स्वरूप ही बदल जाएगा।
  3. मन और मानसिक क्रियाओं का भौतिक जगत पर क्या प्रभाव होता है? इसका विचार किए बिना भौतिक विज्ञान का वैज्ञानिक अध्ययन अधूरा ही माना जाएगा। जैसे – जितने भी रोग होते हैं उनका उद्गम मन में होता है और वे प्रकट शरीर में होते हैं। अतः उनका उपचार भी मन का विचार किए बिना नहीं हो सकता। यह कथन पूर्णतः वैज्ञानिक कथन ही है। यदि इस विचार को प्रतिष्ठित किया गया तो चिकित्सा शास्त्र का स्वरूप ही बदल जाएगा।
  4. मनुष्य शरीर की समस्त प्रक्रियाओं को चक्र प्रभावित करते हैं। चक्र प्राण का क्षेत्र है, शरीर का नहीं। इन पर मानसिक प्रक्रियाओं का प्रभाव होता है, इस बात पर अवश्य विचार करना चाहिए।
  5. प्राचीन भारत में विज्ञान के अध्ययन और अनुसंधान की पद्धतियाँ क्या-क्या रही होंगी? इसका अनुसंधान करना भी आवश्यक लगता है। उदाहरण के लिए आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का विकास भी नहीं हुआ था, तब भी भारत में शल्य चिकित्सा होती थीं। दूसरा उदाहरण हमारे ऋषि-मुनि यह कैसे जानते थे कि मनुष्य शरीर में बहत्तर हजार नाड़ियाँ होती हैं? यह भी आज खोज का विषय है।

अतः प्राचीन भारत की भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में क्या-क्या उपलब्धियाँ रही हैं, इसकी जानकारियाँ वर्तमान सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए इसे पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना आवश्यक है, क्योंकि आज भारत में ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में यह धारणा बनी हुई है कि विज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पाश्चात्य जगत का ही विषय रहा है। भारत तो ध्यान, भक्ति, भावना और कल्पना की दुनिया में ही विहार करता रहा है। भारत में अध्यात्म और कला की उपासना तो थीं, परन्तु विज्ञान निष्ठा का अभाव था। हमें इस भ्रान्ति को दूर करने हेतु पुरुषार्थ करना की आवश्यकता है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)

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