सा विद्या या विमुक्तये
– वासुदेव प्रजापति
विज्ञान की भांति तंत्र ज्ञान का भूत भी हमारे सिर पर चढ़कर बोल रहा है। यंत्रों के नये-नये आविष्कारों में हमें अपने पुरुषार्थ की महत्ता जान पड़ती है। किन्तु तंत्रज्ञान के सन्दर्भ में सांस्कृतिक दृष्टि से विचार करने की आवश्यकता प्रतीत होती है। इस दृष्टि से विचारणीय बिन्दु निम्नलिखित हैं –
जगन्नथपुरी मंदिर का वास्तुशिल्प
जगन्नाथपुरी का मन्दिर तकनीकी दृष्टि से अद्भुत है। यह मंदिर अनेक विशेषताओं को अपने में समेटे हुए है, जिसे देखकर सभी लोग दांतों तले अंगुली दबाने को विवश हो जाते हैं। ऐसी विशिष्ट तकनीक से निर्मित इस मंदिर के कुछ प्रमुख आश्चर्य ये हैं –
यंत्रों द्वारा मनुष्यों का स्थान ले लेने के कारण, मनुष्य बेकार हो रहा है। उसकी कार्यक्षमता तथा कार्यकुशलता दोनों में कमी हो रही है। उसका हुनर उसके हाथ से जा रहा है। और तो और उसकी काम करने की वृत्ति क्षीण होकर उसे आलसी व निकम्मा बना रही है। मनुष्य की यह स्थिति उसके स्वयं के लिए तथा समाज के लिए चिन्तनीय बन गई है। हमें इसका उपाय खोजना होगा।
भारत विकास परिषद का अहमदाबाद में एक वर्ग था। एक जैन मुनि उसमें आए थे। उन्होंने अपना एक अनुभव सुनाया। मैं एक महाविद्यालय के कार्यक्रम में गया। उसमें एक वक्ता ने कहा, विज्ञान के कारण आज से सौ साल तक जो समस्या उत्पन्न होने वाली है, उसका आज ही विचार करना है। जैसे- सौ साल में कोयला समाप्त हो जाएगा, तो ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत की खोज वह आज करता है। इस पर जैन मुनि ने कहा कि जैसे आज का वैज्ञानिक विकास नीति विहीन, मूल्य विहीन तथा जैव सृष्टि का शत्रु बन रहा है, जैसे रासायनिक व आणविक संहारक शस्त्रास्त्र बने हैं और मानव जैसा स्वार्थी व लोलुप बन रहा है, उससे आने वाले समय में विज्ञान का यह सामर्थ्य सारी दुनिया को ही कोयला बना देगा। अतः विकल्प कोयले का नहीं, उस कोयला बनी दुनिया के उस कोयले को जलाएगा कौन? यह विचार करने की आवश्यकता है।
आज के विज्ञान में प्रकृति के प्रति मातृत्व की भावना के स्थान पर भोग्या की मानसिकता के फलस्वरूप विज्ञान समूची जैव सृष्टि का दुश्मन बनता जा रहा है। विभिन्न उद्योगों से निकलने वाली किरणें एक ओर घातक रोगों का कारण बन रही हैं तो दूसरी ओर ओजोन परत जो सूर्य से आने वाली घातक पराबैंगनी किरणों से सृष्टि की रक्षा करती है, उसमें छेद हो रहा है, इस कारण सम्पूर्ण सृष्टि को खतरा है। जंगल कटने के कारण मौसम अनियमित हो रहा है। अनियंत्रित औद्योगीकरण से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। तामान के बढ़ने से ग्लैशियर पिघल जायेंगे, समुद्र तल के बढ़ने से कई नगर तथा द्वीप समुद्र के गर्भ में समा जायेंगे। ध्वनि प्रदूषण इतना बढ़ रहा है कि वह पागलपन के निकट ले जायेगा। उद्योगों का वेस्टेज, पानी को प्रदूषित कर रहा है। अर्थात् आज सारी वृक्ष, पशु, जैव सृष्टि खतरे में हैं। इसलिए यंत्ररूपी इस राक्षस द्वारा उत्पन्न संकटों का समाधान खोजना होगा।
मनुष्य की बुद्धि ठीक हो जाने से एक कल्याणकारी तकनीक का विकास होगा। उस तकनीक के लिए भारत को कुछ भी नया करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। क्योंकि इस दिशा में भारत का इतिहास समृद्ध है।
(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सचिव है।)
और पढ़ें : भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 61 (विज्ञान का सांस्कृतिक स्वरूप)
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