बालकों के लिए उपयोगी – आपके घर में ऐसा है क्या?

 – दिलीप वसंत बेतकेकर

आज के घर सामानों के ‘भंडारगृह’ हो गए हैं। जगह की कमी, फिर भी फर्श से छत तक विविध वस्तुओं का संग्रह देखने को मिलता है। कुछ घरों में सुंदर सजावट देखने को मिलती है तो कुछ घरों में विविध प्रकार का सामान बेतरतीब ठूंसा हुआ दिखता है। कपड़े इधर उधर लटकते दिखते हैं। हमारे एक मित्र इसे ‘‘ठूंसो-लटको संस्कृति’’ सम्बोधित करते हैं। अनेक बार तो अनावश्यक सामान भी जगह घेरे रहता है। ऐसा सामान न तो फेंका जाता है और न ही उपयोग में लाया जाता है। कुछ वस्तुओं की तो बिल्कुल भी उपयोगिता नहीं होती, फिर भी उसका मोह छूटता नहीं है। किन वस्तुओं को अग्रक्रम में रखें, ये न समझने के कारण अनेक झमेले झेलने पड़ते हैं।

जिनके घर बच्चे होते हैं ऐसे पालकों को दिखावे वाली वस्तुओं का संग्रह करने की अपेक्षा बच्चों की दृष्टि से कौन सी वस्तुएं महत्वपूर्ण तथा उपयोगी हैं, इसका विचार करके वस्तुएं क्रय करें। बच्चों के विकास के दृष्टिकोण से अधिक सहायक कौन सी वस्तुएं होंगी इसका विचार करना आवश्यक है। अन्यथा दलाई लामा के शब्दों के अनुसार, ‘‘दिखावा अधिक, भंडार खाली’’ की स्थिति उत्पन्न होगी।

घर में प्रथम आवश्यक वस्तु है ‘पूजा घर’! घर चाहे कितना भी छोटा हो, उसमें एक ‘पूजाघर’ होना आवश्यक है। दिनभर में से कुछ समय निकाल कर, अन्य प्रापंचिक बातों के विचारों से मुक्त रहकर, शांति से जहां बैठ सकें, वह है ‘‘पूजाघर’’ भले ही वहाँ कोई भी देव प्रतिमा हो या न भी हो! परिवार के सभी सदस्यों द्वारा दस-पंद्रह मिनट का समय निकालकर, पूजाघर में एकत्र आकर प्रार्थना करनी चाहिये।

पालकगण यदि स्वयं इस प्रकार का अभ्यास करें तो बच्चे भी वैसा ही अनुकरण करेंगे। प्रार्थना से क्या प्राप्त होता है, इस सम्बन्ध में विस्तार से बताने की अपेक्षा, Prayer does not change the things for you but you for the things कहना पर्याप्त है।

अनेक घर तो सिनेमाघर ही बनते जा रहे हैं। जिधर देखो उधर सिनेमा के कलाकारों के चित्र, देह प्रदर्शन करने वाले चित्र दीवारों पर लगे दिखाई देते हैं। बच्चों की पुस्तकों-कॉपियों पर भी भद्दे चित्र लगे दिखते हैं। इस कारण प्रवृत्ति भी उसी प्रकार की बनती जाती है। निरंतर ऐसे चित्र आँखों के समक्ष आने से मन में, सपनों तक में वही दिखते हैं। जैसे विचार मन में होते हैं उसी के अनुरूप बच्चे व्यवहार करते हैं। इसलिये अपने घर में किस प्रकार के चित्र, प्रतिमा लगाई जानी है इस सम्बन्ध में पालकगण सावधानी बरतें। देवी-देवता, महापुरुष, राष्ट्रपुरुष जैसे चित्र अथवा प्रतिमाएं उपयोग में लाएं तो बेहतर होगा।

घर में अलमारियाँ बहुतायत में होती हैं। वे केवल कपड़ों से भरी रहती हैं। कुछ लोगों के घर में तो विविध प्रकार के जूते-चप्पलों से भरी अलमारियां होंगी। कितने भी कपड़े हों फिर भी और अधिक खरीदने का मोह कम नहीं होता। जितने हैं, वह कम ही लगते हैं। पुस्तकों की अलमारियां नहीं दिखाई देतीं। “A room without books is a body without soul” कहते हैं।

इससे स्पष्ट है कि घर में पुस्तकों का होना कितना महत्वपूर्ण है। शरीर के लिये अन्न आवश्यक है यह सर्वविदित है किन्तु शारीरिक आवश्यकताओं की ओर हम अधिक ध्यान देते हैं किन्तु बुद्धि की महत्ता की ओर हम ध्यान नहीं देते। बौद्धिक क्षुधाशमन के लिये आवश्यक हैं पुस्तकें! प्रति माह एक पुस्तक पालकों द्वारा बच्चों के लिए खरीदी जाएं तो बच्चों में पढ़ने की आदत डाली जा सकती है।

समाचारपत्र दुनिया को देखने वाली आँखें और कान होते हैं। अपने आसपास क्या घटित हो रहा है? वर्तमान स्थिति कैसी है? हवाएं किस ओर चल रही हैं? आदि की जानकारी के लिए समाचारपत्र एक साधन है। प्रायः समाचारपत्रों में बच्चों के लिए भी एक स्थान आबंटित रहता है। शनिवार-रविवार के समाचार पत्रों में तो विशेष ही! हानिकारक और अनावश्यक वस्तुओं पर हम जितना खर्च करते हैं, उसके ऐवज में थोड़ा सा खर्च समाचारपत्र खरीदने पर किया जाए तो बच्चों में पढ़ने की आदत पैदा होगी, ज्ञानवृद्धि होगी, भाषा समृद्ध होगी, विचारशक्ति जागृत होगी। अतः कम से कम एक समाचारपत्र नियमित क्रय करें।

शिशु वाटिका से कॉलेज तक में पढ़ने वाले किसी भी आयु के बच्चों के लिए उपयुक्त एक वस्तु है ‘‘रोल अप बोर्ड’’! क्षमतानुसार उसे खरीदा जा सकता है। शिशुवाटिका के बच्चों को उस पर रेखाएं खींचना, चित्र बनाने में आनंद आएगा। घर पर बच्चे दीवारों पर रेखाएं खींचकर दीवार गंदी कर देते हैं। यदि रोलअप बोर्ड टांग दिये जाएं तो बच्चे उस पर चित्र आदि बनाएंगे और दीवारें गंदी नहीं होंगी!

प्राथमिक कक्षा के बच्चों को गणित के प्रश्न हल करने, शब्द, वाक्य लिखने आदि के लिये रोल अप बोर्ड उपयुक्त रहेगा। सूत्र, समीकरण, महत्वपूर्ण तिथियाँ, आकृति आदि यदि बच्चों ने फलक पर अंकित कर रखी हो और उसे आते-जाते देखें तो ये बातें सहजता से याद रखने में सुविधा होगी।

‘पृथ्वी का ग्लोब’ भी एक सरल, सहज, शैक्षणिक साधन है। ग्लोब बाजार में अनेक आकार और अनेक प्रकार के उपलब्ध हैं। इतिहास, भूगोल, राजनीतिशास्त्र आदि सभी विषयों के अध्ययन के लिये सहायक के रूप में ये उपयोगी हैं। बचपन से ही बालक इस ग्लोब का उपयोग करें तो अनेक बातें सुगम हो जाती हैं।

आजकल अनेक घरों में ऑडियो/वीडियो प्लेयर आदि उपलब्ध है। उसका उपयोग विशेषकर सिनेमा गीतों के लिए किया जाता है। बाजार में आजकल सभी विषयों की CD/DVD/ई-कंटेंट उपलब्ध हैं। बाल गीतों से लेकर अंग्रेजी संभाषण, वर्णमाला से लेकर विज्ञान और गणित के सूत्र तक, ख्यातिप्राप्त व्यक्तियों के व्याख्यान आदि सभी प्रकार की ‘सी.डी.’ उपलब्ध हैं। ये श्रवण शक्ति के विकास के लिये सहायक होती हैं। अध्ययन के लिये ये एक अच्छा माध्यम हैं। इस प्रकार के साधनों का प्रयोग हम करने लगे तो उसका प्रभावी उपयोग करने के लिये अनेक मार्ग प्रशस्त होंगे।

विद्यार्थियों का एक घनिष्ठ मित्र है ‘‘शब्दकोष’’! आजकल केवल अंग्रेजी भाषा का ही शब्दकोष नहीं, वरन् गणित, पदार्थ विज्ञान, रसायन शास्त्र, अर्थशास्त्र, कम्प्यूटर, चिकित्साशास्त्र आदि विभिन्न विषयों पर शब्दकोष उपलब्ध हैं। घर पर एक शब्दकोष उपलब्ध रहना आवश्यक है।

घर के लिये उपयुक्त वस्तुओं की सूची आवश्यकता और क्षमतानुसार घट-बढ़ सकती है। सभी वस्तुएं एक साथ खरीदी जाएं, ये आवश्यक नहीं। वर्तमान की भूल-भुलैया वाली दुनिया में हमें भ्रमित करने वाली अनेक बातें हैं। घर-घर जाकर बिक्री करने वाले अपनी कुशलता से हमारे लिये अनावश्यक वस्तुओं को हमें भ्रमितकर हमें थोपकर चले जाते हैं। थोड़ा सतर्क रहकर, विचार करके, बच्चों के विकास हेतु उपयुक्त अथवा घर के लिये आवश्यक वस्तुएं ही खरीदी जाएं तो लाभकारी होगा। बच्चों के लिये केवल वस्तु अथवा खिलौने क्रय करके समझदार पालक नहीं कहलाएंगे। बच्चों के लिये आप कितना समय देते हैं ये भी महत्वपूर्ण है।

(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)

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