महाऋषि वाल्मीकि का अवदान

-डॉ कुलदीप मेहंदीरत्ता

भाग्यशाली भारत भूमि पर समय समय पर महापुरुषों ने अवतार लिया है और अपनी वाणी व कलम से भारत का ही नहीं बल्कि समस्त मानव जाति और विश्व का मार्गदर्शन किया है। भारत को विश्वगुरु के रूप में ख्याति दिलाने वाले इन महापुरुषों ने अतुल उपदेश, काव्य-साहित्य की रचना की। भारतीय परिदृश्य में रामायण एक ऐसा महाग्रंथ है जिसने न केवल भारतीयों बल्कि विश्व के अन्य सामाजिक समुदायों को भी प्रेरित और स्पन्दित किया है। महाऋषि वाल्मीकि ने अपनी लेखन क्षमता से श्रीराम के चरित्र को सारे संसार के समक्ष ऐसा स्थापित किया कि राम अलौकिक होते हुए भी हमें अपने समाज का अंग लगते हैं। राम को आदर्शों का ज्योतिर्पुंज बनाकर विश्व के लिए प्रेरक बनाना और मानव में श्रीराम जी जैसा बनने की इच्छा जागृत करना महाऋषि वाल्मीकि जैसे दैवीय व्यक्तित्व के ही सामर्थ्य की बात थी।

महाऋषि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण भारतीय सभ्यता और संस्कृति के अस्त्र तथा अमर स्रोत के रूप में विश्व के समक्ष सुस्थापित तथा वंदनीय है। यह कहा जाता है कि एक दिन तमसा नदी के तट पर शिकारी के द्वारा क्रौंच पक्षी की हत्या पर उसकी पत्नी द्वारा जो मार्मिक विलाप किया गया, उस क्रंदन से द्रवित होकर महाऋषि वाल्मीकि के मुख से निकला –

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वंगमः शाश्वतीः समाः।

यत्क्रौंचमिथुनादेकं वधीः काममोहितम्॥

(अर्थ: हे दुष्ट, तुमने प्रेम मे मग्न क्रौंच पक्षी को मारा है। जा तुझे कभी भी प्रतिष्ठा की प्राप्ति नहीं हो पायेगी और तुझे भी वियोग झेलना पड़ेगा।)

यह कहा जाता है कि इसके बाद महाऋषि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की और इसी संस्कृत महाकाव्य रामायण के कारण ही महाऋषि वाल्मीकि को आदि महाकवि की विशिष्ट उपाधि प्राप्त हुई है। महाऋषि वाल्मीकि, श्रीराम के समकालीन थे। लंका-विजय कर अयोध्या आने के बाद जब श्रीराम ने सीता का त्याग कर दिया था, तब महाऋषि वाल्मीकि के आश्रम में ही सीता ने आश्रय लिया था। उनके आश्रम में ही विश्व के श्रेष्ठ योद्धाओं लव-कुश को माता सीता ने जन्म दिया। कालान्तर में जब श्रीराम ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया किया तो लव कुश ने महाऋषि वाल्मीकि के आश्रम में यज्ञ के घोड़े को बाँध लिया था। बाद में उन्होंने लक्ष्मण के नेतृत्व में लड़ने आई अयोध्या की सेना को पराजित किया। लव-कुश को रीति, नीति, संस्कार, युद्ध कला आदि का ज्ञान महाऋषि वाल्मीकि की छत्र-छाया में ही प्राप्त हुआ था।

महाऋषि वाल्मीकि ने रामायण में श्रीराम के चरित्र के माध्यम से सामाजिक और नैतिक मूल्यों की ऐसी प्रस्तावना की है, कि श्रीराम संसार में मानव जाति, मानव समुदाय के लिए आदर्श बन गये हैं। महाऋषि वाल्मीकि ने श्री राम के आदर्श चरित्र-चित्रण के माध्यम से तथा रामायण में वर्णित अन्य चरित्रों के माध्यम से सामाजिक और नैतिक मूल्यों की प्रस्तावना की है। श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रूप में प्रस्तुत कर महाऋषि वाल्मीकि ने भारत, भारतीयता और भारतीय संस्कारों को विश्वविख्यात कर दिया है। श्रीराम तथा अन्य चरित्रों के माध्यम से महाऋषि वाल्मीकि ने समाज के लिए आदर्श मूल्यों का एक रेखाचित्र खिंचा है जिनका अनुपालन कर कोई भी मनुष्य तथा समाज श्रेष्ठता के रंग भर सकता है।

गुरु का सम्मान तथा गुरु के प्रति समर्पण को प्राय: सभी मानव सभ्यताओं में स्थान दिया गया है। महाऋषि वाल्मीकि ने रामायण में कई प्रसंगों के माध्यम से गुरु के सम्मान और गुरु के प्रति समर्पण को उद्घाटित किया है। प्राचीन गुरुकुल पद्धति गुरु के आश्रम में जातिगत भेदभाव का अभाव, राजा और रंक का अंतर समाप्त, सामान्य कृषक और राजकुमारों से गुरुजनों का एक सा व्यवहार यह सब वास्तविक समाजवादी राज व्यवस्था के चिन्ह गुरु के शिक्षालय में सभी विद्यार्थियों को एक समान शिक्षा दी जाती थी।

प्रतिज्ञा पालन और बड़ों का सम्मान वर्तमान में इनका बहुत अभाव दिखाई देता है। महाऋषि वाल्मीकि ने राम के माध्यम से पिता के प्रति उनकी श्रद्धा, लक्ष्मण की राम के प्रति आज्ञाकारिता, राम की प्रतिज्ञा और उसके लिए प्रत्येक कष्ट उठाना, प्रतिज्ञा पालन संबंधी मूल्य आदि को उद्घाटित किया है, जो आज भी प्रासंगिक है।

उदारता एक ऐसा नैतिक मूल्य और गुण है जिसे श्रीराम के चरित्र के माध्यम से महाऋषि वाल्मीकि ने उद्घाटित किया है। राम की उदारता जगत विख्यात है। रावण की मृत्यु के समय जब विभीषण ने रावण के संस्कार के प्रति अनिच्छा प्रकट की तब श्रीराम ने कहा कि वह मृत्यु तक रहता है मृत्यु के बाद वह समाप्त हो जाता है। अतः रावण का संस्कार करना न्याय उचित है। शत्रु के प्रति ऐसी उदारता का परिचय देना एक नैतिक महा मूल्य है जिसे महाऋषि वाल्मीकि ने उद्घाटित किया है।

वाल्मीकि जी ने लिखा है कि मित्र दो प्रकार के होते हैं – एक मित्र के अर्थ साधन में तत्पर रहने वाले, दूसरे निरंतर धर्म सत्य का पालन करने वाले। महाऋषि वाल्मीकि ने दुर्जन मित्र को त्याग देने का उपदेश दिया है। वाल्मीकि जी ने धर्म को सबसे बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मूल्य मानते हुए धर्म को कर्तव्य की श्रेणी में रखा।

क्या आज का समाज महर्षि वाल्मीकि द्वारा रामायण के माध्यम से उद्घाटित जीवन व्यवहार व मूल्यों से प्रेरणा ले पाएगा।

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(लेखक चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी (हरियाणा) में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष है।)

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