श्रीराम – सुशासन के प्रतीक महापुरुष

– ललित गर्ग

भगवान श्रीराम की जन्म जयन्ती रामनवमी का त्यौहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को उत्सवपूर्ण ढंग से मनाया जाता है। हिन्दु धर्मशास्त्रों के अनुसार त्रेतायुग में रावण के अत्याचारों को समाप्त करने तथा धर्म की स्थापना के लिये भगवान विष्णु ने मृत्यु लोक में श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। श्रीराम का जन्म रानी कौशल्या की कोख से, राजा दशरथ के घर में हुआ था। रामनवमी हिन्दू धर्म एवं संस्कृति का एक ऐसा पर्व है, जिस पर चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को प्रतिवर्ष नये विक्रम संवत्सर का प्रारंभ होता है और उसके आठ दिन बाद ही चैत्र शुक्ल पक्ष की नवमी को श्रीराम जन्मोत्सव समस्त देश में मनाया जाता है। इस देश की श्रीराम और श्रीकृष्ण दो ऐसी महिमाशाली विभूतियाँ रही हैं, जिनका अमिट प्रभाव समूचे भारत के जनमानस पर सदियों से अनवरत चला आ रहा है।

रामनवमी, भगवान श्रीराम की स्मृति को समर्पित है। श्रीराम सदाचार, न्याय एवं सुशासन के प्रतीक हैं और इन्हें ‘मर्यादा पुरुषोतम’ कहा जाता है। राम राज्य श्रीराम का शासन शांति, सुशासन व समृद्धि का पर्यायवाची बन गया है। अयोध्या के राजकुमार होते हुए भी भगवान श्रीराम अपने पिता के वचनों को पूरा करने के लिए संपूर्ण वैभव को त्याग 14 वर्ष के लिए वन चले गए और आज की विडम्बना एवं विसंगति को देखें तो वैभव की लालसा में ही पुत्र अपने माता-पिता का काल बन रहा है।

भगवान श्रीराम अविनाशी परमात्मा है जो सबके सृजनहार व पालनहार हैं। दरअसल श्रीराम के लोकनायक चरित्र ने जाति, धर्म और संप्रदाय की संकीर्ण सीमाओं को लांघ कर जन-जन को अनुप्राणित किया। भारत में ही नहीं, दुनिया में श्रीराम अत्यंत पूजनीय हैं और आदर्श पुरुष हैं। थाईलैंड, इंडोनेशिया आदि कई देशों में भी श्रीराम आदर्श के रूप में पूजे जाते हैं। वे मानवीय आत्मा की विजय के प्रतीक महापुरुष हैं, जिन्होंने धर्म एवं सत्य की स्थापना करने के लिये अधर्म एवं अत्याचार को ललकारा। इस तरह वे अंधेरों में उजालों, असत्य पर सत्य, बुराई पर अच्छाई के प्रतीक बने।

रामनवमी का पर्व धर्म की स्थापना एवं बुराइयों से संघर्ष का प्रतीक पर्व है, आज भी अंधेरों से संघर्ष करने के लिये इस प्रेरक एवं प्रेरणादायी पर्व की संस्कृति को जीवंत बनाने की जरूरत है। प्रश्न है कौन इस संस्कृति को सुरक्षा दे? कौन आदर्शों के अभ्युदय की अगवानी करे? कौन जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठापना में अपना पहला नाम लिखवाये? बहुत कठिन है यह बुराइयों से संघर्ष करने का सफर। बहुत कठिन है तेजस्विता की यह साधना। आखिर कैसे संघर्ष करें घर में छिपी बुराइयों से, जब घर आंगण में रावण-ही-रावण पैदा हो रहे हो। हमें भगवान श्रीराम को अपना जीवन-आदर्श बनाना होगा, उनके संयम एवं मर्यादा के मूल्यों को जीवन शैली बनाना होगा श्रीराम ने मर्यादा के पालन के लिए राज्य, मित्र, माता-पिता, यहां तक कि पत्नी का भी साथ छोड़ा। इनका परिवार, आदर्श भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। श्रीराम रघुकुल में जन्मे थे, जिसकी परम्परा ‘प्रान जाहुं बरु बचनु न जाई’ की थी।

श्रीराम हमारी अनंत मर्यादाओं के प्रतीक पुरुष हैं इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से पुकारा जाता है। हमारी संस्कृति में ऐसा कोई दूसरा चरित्र नहीं है जो श्रीराम के समान मर्यादित, धीर-वीर, न्यायप्रिय और प्रशांत हो। इस एक विराट चरित्र को गढ़ने में भारत की सहस्रों प्रतिभाओं ने कई सहस्राब्दियों तक अपनी मेधा का योगदान दिया। आदि कवि वाल्मीकि से लेकर महाकवि भास, कालिदास, भवभूति और तुलसीदास तक न जाने कितनों ने अपनी-अपनी लेखनी और प्रतिभा से इस चरित्र को संवारा। वाल्मीकि के श्रीराम लौकिक जीवन की मर्यादाओं का निर्वाह करने वाले वीर पुरुष हैं। उन्होंने लंका के अत्याचारी राजा रावण का वध किया और लोक धर्म की पुनः स्थापना की। लेकिन वे नील गगन में दैदीप्यमान सूर्य के समान दाहक शक्ति से संपन्न, महासमुद्र की तरह गंभीर तथा पृथ्वी की तरह क्षमाशील भी हैं।

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महाकवि भास, कालिदास और भवभूति श्रीराम को कुल रक्षक, आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श पिता, धर्म-संस्थापक और आदर्श प्रजापालक राजा का चरित्र सामने रखते हैं। कालिदास ने रघुवंश में इक्ष्वाकु वंश का वर्णन किया तो भवभूति ने उत्तर रामचरितम् में अनेक मार्मिक प्रसंग जोड़े। लेकिन तुलसीदास ने श्रीराम के चरित्र का कोई प्रसंग नहीं छोड़ा है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि श्रीराम कथा को संपूर्णता वास्तव में तुलसीदास ने ही प्रदान की है। रामचरितमानस एक कालजयी रचना है जो भारतीय मनीषा के समस्त लौकिक, पारलौकिक, आध्यात्मिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को श्रीराम के चरित्र में इस तरह जड़ देती है, गुंफित करती है मानो किसी कुशल शिल्पी ने नगीने जड़े हों। लेकिन तुलसी के श्रीराम विष्णु के अवतार ही नहीं, जीवन-प्रेरणा हैं। वे दुराचारियों, यज्ञ विध्वंसक राक्षसों, अत्याचारियों का नाश कर लौकिक मर्यादाओं की स्थापना करके आदर्श समाज की संरचना के लिए ही जन्म लेते हैं। वे सांसारिक प्राणियों की तरह सुख-दुख का भोग जरूर करते हैं पर जीवन-मरण के चक्र से होकर गुजरते हैं और अंततः अपनी पारलौकिक छवि की छाप छोड़ जाते हैं।

दरअसल तुलसीदास ने श्रीराम के जीवन के कई प्रसंगों की व्याख्या करते हुए उनके ईश्वरत्व की ओर इशारा किया है। इसका अर्थ यह है कि तुलसी ने श्रीराम के चरित्र में दो परस्पर विरोधी और विपरीत धाराओं में समन्वय का प्रयास करके इसे और भव्यता प्रदान करने की कोशिश की है। श्रीराम सुख-दुख, पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, शुभ-अशुभ, कर्तव्य-अकर्तव्य, ज्ञान-विज्ञान, योग-भोग, स्थूल-सूक्ष्म, जड़-चेतन, माया-ब्रह्म, लौकिक-पारलौकिक आदि का सर्वत्र समन्वय करते हुए दिखाई देते हैं। इसलिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम तो हैं ही, लोकनायक एवं मानव चेतना के आदि पुरुष भी हैं। भारत के विभिन्न धार्मिक संप्रदायों और मत-मतांतरों के प्रवर्तक संतों ने श्रीराम की अलग-अलग कल्पना की है। इनमें हर एक के श्रीराम अलग-अलग हैं। तुलसी, रैदास, नाभादास, गुरुनानक, कबीर आदि के श्रीराम अलग हैं। किसी के लिए श्रीराम दशरथ पुत्र हैं तो किसी के लिए सबसे न्यारे एवं न्यायप्रिय शासक हैं। तुलसीदास ने यह भी कहा कि ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिहिं तैसी।’

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भारत की संस्कृति एवं संस्कारों में दो अक्षरों का एक राम-नाम गहरा पेठा एवं समाया हुआ है। सुबह बिस्तर से उठते ही राम। बाहर निकलते ही राम-राम, दिन भर राम नाम की अटूट श्रृंखला। फिर शाम को राम का नाम और जीवन की अंतिम यात्रा भी ‘राम नाम सत्य है’ के साथ। आखिर इसका रहस्य क्या है? घर में राम, मंदिर में राम, सुख में राम, दुख में राम। शायद यही देख कर अल्लामा इकबाल को लिखना पड़ा- ‘है राम के वजूद पर हिन्दोस्तां को नाज, अहले वतन समझते हैं, उनको इमामे हिंद।’ सचमुच श्रीराम भारत के जन-जन के लिये एक संबल है, एक समाधान है, एक आश्वासन है, निष्कंटक जीवन का, अंधेरों में उजालों का।

भारत की संस्कृति एवं परिवार परम्परा में हर माता-पिता श्रीराम जैसे पुत्र की कामना करते हैं। श्रीराम के पिता दशरथ ने उनकी सौतेली माता कैकेयी को उनकी किन्हीं दो इच्छाओं को पूरा करने का वचन-वर दिया था। कैकेयी ने दासी मन्थरा के बहकावे में आकर इन वरों के रूप में राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राजसिंहासन और श्रीराम के लिए चैदह वर्ष का वनवास मांगा। पिता के वचन की रक्षा के लिए श्रीराम ने खुशी से चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार किया। पत्नी सीता ने आदर्श पत्नी का उदाहरण देते हुए पति के साथ वन (वनवास) जाना उचित समझा। भाई लक्ष्मण ने भी श्रीराम के साथ चैदह वर्ष वन में बिताए।

Shriram

भरत ने न्याय के लिए माता का आदेश ठुकराया और बड़े भाई श्रीराम के पास वन जाकर उनकी चरणपादुका (खड़ाऊं) ले आए। फिर इसे ही राज गद्दी पर रख कर राजकाज किया। जब श्रीराम वनवासी थे तभी उनकी पत्नी सीता को रावण हरण कर ले गया। जंगल में श्रीराम को हनुमान जैसा मित्र और भक्त मिला जिसने श्रीराम के सारे कार्य पूरे कराये। श्रीराम ने हनुमान, सुग्रीव आदि वानर जाति के महापुरुषों की सहायता से सीता को ढूंढा। समुद्र में पुल बना कर लंका पहुंचे तथा रावण के साथ युद्ध किया। उसे मार कर सीताजी को वापस ले कर आये। श्रीराम के अयोध्या लौटने पर भरत ने राज्य उनको ही सौंप दिया। श्रीराम न्यायप्रिय थे। उन्होंने बहुत अच्छा शासन किया, इसलिए लोग आज भी अच्छे शासन को रामराज्य की उपमा देते हैं। इनके दो पुत्रों कुश व लव ने इनके राज्यों को संभाला। वैदिक धर्म के कई त्योहार, जैसे दशहरा, रामनवमी और दीपावली, श्रीराम की वन-कथा से जुड़े हुए हैं।

श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन विलक्षणताओं एवं विशेषताओं से ओतप्रोत है, प्रेरणादायी है। उनके मन में विमाता कैकयी और भाई भरत के लिए स्नेह बना रहता है। उनका हृदय करुणा से ओतप्रोत है। वे जब रावण का वध करते हैं तो पश्चाताप करते हैं। लौकिक जीवन की मर्यादा एवं राजधर्म के निर्वाह के लिए धोबी के ताने सुनकर सीता का परित्याग कर देते हैं। उन्हें अपने जीवन की खुशियों से बढ़कर लोक जीवन की चिंता है। राजा के इस आदर्श के कारण ही भारत में रामराज की आज तक कल्पना की जाती है। श्रीराम के बिना भारतीय समाज की कल्पना कैसे की जा सकती है?

(लेखक स्वतंत्र स्तंभकार, पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता है और विद्या भारती दिल्ली प्रान्त के संवाददाता है।)

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