तुलसीदास जी का शिक्षा दर्शन – 27 जुलाई जयंती विशेष


– प्रोफेसर बाबुराम

शिक्षा मानव जीवन के चरित्र निर्माण, रुचियों, प्रवृत्तियों, चेष्टाओं में बदलाव और बहुआयामी विकास के साथ सामाजिक समरसता उत्पन्न करती है। इसीलिए मानव मननशील और चिंतनशील होने के कारण मानव कहलाता है। ज्ञान के विकास के लिए मनुष्य को निरंतर प्रयत्नशील रहना चाहिए। आज जो वैज्ञानिक, तकनीकी, सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित विकास है, वह  ज्ञानार्जन और शोध के कारण ही है। दर्शन मानव का उच्चतम चिंतन है। प्राचीन काल से ही भारतीय जीवन प्रणाली दर्शन, समाज, साहित्य, संस्कृति और शिक्षा से प्रभावित रही है।

भारतीय शैक्षिक दर्शन अध्यात्म प्रधान है, उसमें भौतिकतावाद गौण है, इसीलिए भारतीय दर्शन का शिक्षा से अटूट संबंध है। भारत में दार्शनिकों और शिक्षा-शास्त्रियों की दीर्घकालीन परंपरा रही है इसी परंपरा में तुलसीदास जी का आविर्भाव हुआ। भारतीय ज्ञान परंपरा में उनका शिक्षा दर्शन सर्वोच्च आदर्श है और उसकी प्रासंगिकता भी सार्वभौम है। तुलसी का शिक्षा दर्शन, वेद और उपनिषद के पंचकोश पर आधारित है। जो अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, और आनंदमय कोष के माध्यम से शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा का विकास है।

तुलसीदास का शिक्षा दर्शन तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को परिलक्षित करता है और पूरे युगबोध को चित्रित करता है। भारतीय शिक्षा दर्शन शास्त्रियों में उल्लेखनीय तुलसीदास भारतीय समाज और संस्कृति के पक्षधर होने के साथ साथ लोकहितकारी भी हैं। उन्होंने राष्ट्र में व्याप्त बुराइयों और जाति-पाति के बंधन को मिटाकर एक आदर्श समाज की स्थापना की। मुगलों के भय और आतंक के कारण जन-जन में फैली निराशा का निराकरण उन्होंने रामचरितमानस और विनयपत्रिका के माध्यम से किया। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी जैसे उज्ज्वल चरित्र ने समन्वय स्थापित कर राष्ट्र को आलोकित किया।

मध्ययुगीन शिक्षा प्रणाली वैदिक शिक्षा पर आधारित रही है, जिसमें गुरुकुलों और आश्रमों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। तुलसीदास ने इसी शिक्षा दर्शन को विभिन्न पद्धतियों से विकसित कर गुरु-शिक्षा प्रणाली का आदर्श रूप स्थापित किया। तुलसीदास ने इन पंक्तियों ‘गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई’ के माध्यम से गुरुकुल अथवा गुरु के आश्रम की महत्ता को स्थापित किया है। समाज में शिक्षा-दीक्षा प्रदान करने वाले गुरु को तुलसीदास ने सर्वोच्च स्थान दिया है। तुलसी के शिक्षा दर्शन में गुरु-शिष्य का अटूट सम्बन्ध रहा है। बालक के विकास में माता-पिता का भी बहुत योगदान रहता है इसीलिए तुलसीदास ने विद्यार्थी के माता-पिता को भी आदर्श शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उपकरण माना है।

तुलसीदास के अनुसार श्रीराम जैसा आदर्श चरित्र गढ़ना ही शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है। तुलसीदास के श्रीराम हमारे समाज के लिए एक सम्पूर्ण और आदर्श व्यक्तित्व के प्रतीक हैं। श्रीराम केवल दशरथ के आदर्श पुत्र ही नहीं, बल्कि सीता के लिए आदर्श पति और अपने भाइयों के लिए आदर्श भाई और हनुमान के लिए आदर्श स्वामी भी हैं। अगर यह कहा जाये कि भारतीय समाज में निहित सकारात्मक मूल्यों यथा मर्यादा, त्याग, प्रेम, आदर्श, विनय, विवेक और संयम के पर्याय का नाम श्रीराम है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। ऐसे आदर्श चरित्र का अनुसरण कर सभी विद्यार्थियों में सद्गुण, सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना, आचरण की शुद्धता, सांस्कृतिक चेतना, संयमित जीवन, धर्म के अनुसार जीवन- व्यवहार, अनुशासन, नारी-सम्मान, अस्पृश्यता निवारण तथा सामाजिक समानता आदि गुणों का समावेश करना तुलसीदास के शिक्षा दर्शन के अभिन्न अंग हैं

भारतीय शिक्षा प्रणाली का केंद्र बिंदु विद्यार्थी है। तुलसीदास जी ने भी अपने शिक्षा दर्शन में विद्यार्थी को केंद्र बिंदु माना है। उपनिषदों में वर्णित पंचकोश की अवधारणा के अनुसार शिक्षा का परम उद्देश्य विद्यार्थी का चरित्र निर्माण करना और उसके जीवन के सामाजिक, बौद्धिक, मानसिक, भावात्मक और शारीरिक पक्षों का विकास करना है। जीवन का बहुमुखी विकास करने के लिए विद्यार्थी में कतिपय गुणों का होना आवश्यक है।

तुलसीदास ने समर्पण के गुण को ज्ञान प्राप्ति के लिए सर्वोपरि माना है। श्रीराम के मुखारविंद से ‘बंदउँ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नररूप हरि’ कहलवाकर तुलसीदास ने गुरु के महत्त्व को बताया है। तुलसीदास जी ने राम आदि चारों भाइयों में विद्यमान गुणों ‘विद्या बिनय निपुन गुन सीला’ के बारे में विचार प्रकट किये हैं। तुलसीदास के अनुसार विद्यार्थी के लिए विनयशीलता जैसे गुण को धारण करने की अत्यंत आवश्यकता है क्योंकि विनयशीलता से ही ज्ञानार्जन सम्भव है।

सत्संगति के महत्त्व से सारा संसार परिचित है। सत्संगति को आत्मा का भोजन भी कहा गया है। सत्संग से विद्यार्थी की आत्मा पुष्ट और पवित्र होती है जिससे विद्यार्थी में सदाचार, कर्त्तव्यपरायणता, शुभ विचार और सदभावना आदि गुणों का संचार होता है। तुलसीदास ने सत्संगति का महत्त्व स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘बिनु सतसंग बिबेक न होई’। विवेक के बिना विद्यार्थी के उत्तम आचरण की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। विद्यार्थी के लिए विवेक अपेक्षित गुण है इसलिए तुलसी ने शिक्षा दर्शन में विद्यार्थी के लिए विवेक को हितकारी माना है।

पंचकोश में वर्णित विज्ञानमय कोष की भांति तुलसीदास ने भी विद्यार्थी के बौद्धिक विकास को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। उन्होंने विद्यार्थी में नेतृत्व क्षमता, प्रयोगशीलता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास के लिए बौद्धिक विकास को आवश्यक माना है ताकि उसमें निर्णय लेने की क्षमता का विकास हो सके, उसका आत्म-विश्वास और मनोबल बढ़े और वह एक उत्तम जीवन व्यतीत कर सके। उन्होंने अपनी इन पंक्तियों में विद्यार्थी के बौद्धिक विकास को परिपुष्ट करते हुए लिखा है ‘जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार, संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार’

आध्यात्मिक ज्ञान विद्यार्थी के विकास की चरम परिणति है जिसे उपनिषदों के पंचकोश में आनंदमय कोष के नाम से जाना जाता है।  आध्यात्म में अपने अंतर में देखने का स्वभाव बनाना, स्व: में स्थित रहना और निस्वार्थ भाव से सेवा कार्य करना – ये विद्यार्थी के चरित्र के उत्तम लक्षण हैं। तुलसीदास ने अपने शिक्षा दर्शन में इन सभी मूल्यों को अपरिहार्य माना है।

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि तुलसीदास का शिक्षा दर्शन लोकहितकारी है। उन्होंने अपने शिक्षा दर्शन में भारतीय संस्कृति के सार्वभौमिक मूल्यों को समाहित किया है। श्रीराम के विद्यार्थी स्वरूप को आदर्श रूप में चित्रित करते हुए विद्यार्थी के सर्वांगीण विकास के लिए अपेक्षित गुणों को समाज तथा राष्ट्र के  समक्ष प्रस्तुत किया। इसी प्रकार तुलसीदास ने विद्यार्थी के बहुमुखी विकास में माता-पिता, शिक्षक तथा शेष समाज की भूमिका को भी प्रतिपादित किया है। वर्तमान परिस्थितियों में भी तुलसीदास का शिक्षा दर्शन राष्ट्रहित के लिए अनुकरणीय है।

(लेखक चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय भिवानी, हरियाणा में प्रोफेसर है और हिंदी विभाग के अध्यक्ष है।)

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