गीता में भाव-निष्पत्ति

 – डॉ. विन्ध्यवासिनी प्रसाद त्रिपाठी

गीता ग्रन्थ वाग्यज्ञ का प्रसाद है। भगवान कृष्ण इसके प्रस्तोता हैं, ये ही इस यज्ञ के ब्रह्मा हैं,म ये ही अध्वर्यु हैं, ये ही उद्गाता हैं। यही भगवान का चतुर्भुज रूप है। गीता में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों का प्रतिपादन है। ये भगवान के चार शस्त्र- शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं।

अर्जुन ने कृष्ण से कहा- वचनं करिष्ये तव।

भगवान का वचन वैसे ही है, जैसा कि भगवान स्वयं हैं अर्थात् सनातन, अद्वितीय, चैतन्यस्वरूप एवं ज्योतिर्मय। चैतन्य की अभिव्यक्ति आनन्द है। इस आनन्द का प्रथम विकार अभिमान है। अभिमान से रति की उत्पत्ति हुई। रति से भाव की उत्पत्ति होती है। भाव से रस बनते हैं। अनुराग भाव से श्रृंगार रस, तीक्ष्णता के भाव से रौद्ररस, उत्साह से वीररस, संकोच के भाव से बीभत्स रस का उदय होता है। ये चार मुख्य रस हैं। इन चारों से पुनः चार रस सृष्ट होते हैं। श्रृंगार रस से हास्य, रौद्र रस से करूण, वीररस से अद्भुत रस तथा बीभत्स से भयानक रस की निष्पत्ति होती है। बीभत्स एवं तीक्ष्णता के भाव के योग से शान्त रस की सृष्टि है। उत्साह एवं अनुराग के संयोग से वात्सल्य का प्रादुर्भाव है। इस प्रकार कुल दस रस की निष्पत्ति हुई। ये सभी रस भगवद्वाणी में उसी तरह लसित होते हैं, जैसे भूमि में षडरस।

नाना भावों में भगवान की सत्ता झलकती हैं। हमारा हृदय इस सत्ता से ओत-प्रोत है। आनन्द की मनोरम अनुभूति अथवा सुखों के मनोनुकूल अनुभव को रति कहते हैं। हर्ष आदि के द्वारा चित्त के विकास को हास कहते हैं। अभीष्ट वस्तु के नाश आदि से उत्पन्न मन की विफलता को शोक कहते हैं। अपने प्रतिकूल आचरण करने पर कठोरता के उदय का नाम क्रोध है। पुरूषार्थ के अनुकूल भाव का नाम उत्साह है। चित्र दृश्यादि के दर्शन से जनित मानसिक विकलता का नाम भय है। दुर्भाग्यवाही पदार्थों की निन्दा को जुगुप्सा कहते हैं। किसी वस्तु के दर्शन से चित्त का अतिशय आश्चर्य से पूरित होना विस्मय कहलाता है।

भय या रागादि उपाधियों से चेष्टा का अवरोध हो जाना स्तम्भ है। श्रम एवं राग आदि से युक्त अन्तःकरण के क्षोभ से शरीर से उत्पन्न जल को स्वेद कहते हैं। हर्षादि से शरीर का उच्छ्वसित होना और उसमें रोंगटे खड़े हो जाना रोमांच कहा गया है। हर्ष आदि तथा भय आदि के द्वारा वाणी का स्पष्ट उच्चारण न होना (गद्गद हो जाना ) स्वरभेद कहा गया है। विषाद आदि से शरीर की कान्ति का परिवर्तन वैवर्ण्य कहा गया है। दुःख अथवा आनन्द से उद्भूत नेत्रजल को अश्रु कहते हैं। उपवास आदि से इन्द्रियों की संज्ञाहीनता को प्रलय कहा जाता है। चित्त के क्षोभ से उत्पन्न कम्पन को वेपथु कहा गया है। अर्जुन को ये सब भाव हुए। वह कहता है-

सीदन्ति मम गात्राणि,मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते।।

गाण्डीवं स्त्रंसते हस्तात् त्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः।। गीता 1/29,30

सीदन्ति मम गात्राणि – मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं। यह स्तम्भ भाव है।

मुखं च परिशुष्यति – और मुख सूखा जा रहा है। यह स्वरभेद भाव है।

वेपथुः च शरीरे मे – मेरे शरीर में कम्पन है। यह वेपुथ चित्तक्षोभ जन्य भाव है।

रोमहर्षश्च जायते – तथा मुझे रोमांच हो रहा है। यह रोमांच भाव है।

गाण्डीवं स्त्रंसते हस्तात् – हाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है। यह प्रलय भाव है।

त्वक् चैव परिदह्यते – और मेरी त्वचा जल रही है। यह स्वेद भाव है।

न च शक्नोमि अवस्थातुम् – मैं खड़ा रहने में असमर्थ हूँ। यह भी स्तम्भ भाव है।

भ्रमति इव च मे मनः – मेरा मन चलायमान है।

यहाँ शोक भाव है। क्योंकि शोक में मन अशान्त रहता है। आँसू को छोड़कर अर्जुन में सभी सात्विक भाव आ गये थे। युद्ध के अवसर पर सात्विक (सत्व) का उदय एक असाधारण घटना है। उत्साह के स्थान पर शोक का भाव आना बतलाता है कि कुछ असाधारण होने जा रहा था। यह असाधारण घटना क्या होगी? कृष्ण का प्रवचन/गीता का प्रणयन।

वैराग्य आदि से उत्पन्न मानसिक खेद को निर्वेद कहा गया है। मानसिक पीड़ा आदि से जनित शैथिल्य को ग्लानि कहते हैं। अनिष्ट प्राप्ति की सम्भावना को शंका कहते हैं। दूसरे का उत्कर्ष सहन न करने को असूया कहते हैं। इसी को मत्सर भी कहा जाता है। मदिरा आदि के उपयोग से उत्पन्न मानसिक मोह को मद कहते हैं। अधिक कार्य करने से शरीर के भीतर उत्पन्न क्लान्ति या थकावट को श्रम कहते हैं। श्रृंगार आदि धारण करने में चित्त की उदासीनता का नाम आलस्य है। धैर्य से भ्रष्ट हो जाना दैन्य है। अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति न होने से जो बार-बार उसकी ओर ध्यान जाता है, उसे चिन्ता कहते हैं। किसी कार्य के लिए उपाय न सूझना मोह है। अनुभूत वस्तु का चित्त में प्रतिबिम्बित होना स्मृति कहलाता है। तत्व ज्ञान के द्वारा अर्थों के निश्चय को मति कहते हैं।

अनुराग आदि से होने वाला जो अकथनीय मानसिक संकोच है, उसका नाम व्रीडा है। इसे लज्जा भी कहते हैं। चित्त की अस्थिरता को चपलता तथा प्रसन्नता को हर्ष कहते हैं। प्रतिकार की आशा से उद्भूत अन्तःकरण की विफलता को आवेश कहा जाता है। कर्त्तव्य के विषय में कुछ प्रतिभान न होना जड़ता है। अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति से बढ़े हुए आनन्द या सन्तोष के अभ्युदय का नाम धृति है। दूसरों में निकृष्टता एवं अपने में उत्कृष्टता की भावना को गर्व कहा जाता है। इच्छित वस्तु के लाभ में दैव आदि से जनित विघ्न के कारण जो दुःख होता है,उसे विषाद कहते हैं। अभीष्ट पदार्थ की इच्छा से जो मन की चंचल स्थित होती है,उसका नाम उत्कण्ठा या उत्सुकता है। स्मरण शक्ति के अभाव का नाम अपस्मार है। बाधाओं के उपस्थित होने से चित्त का स्थिर न रह पाना त्रास है। चित्त के चमत्कृत होने के कारण द्विरूक्ति को वीत्सा कहते हैं। परिव्याप्ति या नैरन्तर्य प्रकट करने के लिए शब्द को दो बार कहना वीप्सा है। वि+आप्+सन्+टाप्, ईश्वम् = वीप्सा।

क्रोध के शमन न होने को अमर्ष कहते हैं। चेतना के उदय को प्रबोध या जागरण कहते हैं। चेष्टा और आकार से प्रकट होने वाले भावों का गोपन अवहित्थ कहलाता है। क्रोध से गुरूजनों पर कठोर वाग्दण्ड का प्रयोग उग्रता है। चित्त के ऊहापोह को वितर्क कहते हैं। मन एवं शरीर की प्रतिकूल परिस्थिति का नाम व्याधि है। काम आदि के कारण असम्बद्ध प्रलाप को उन्माद कहते हैं। तत्व ज्ञान होने पर चित्तगत वासना की शान्ति को शम कहते हैं।

ये सभी भाव समय-समय पर अर्जुन में आते रहे हैं। इन भावों से प्रवचन का विस्तार हुआ। भावों में रस की भावना (अभिव्यक्ति) होती है। भाव भगवान के आहार होते हैं। भावों से मन पर प्रहार किया जाता हैं।  भाव हृदय के उपहार हैं। भावों से संहार होता है। भावों में विहार होता है। भावों से भावों का परिहार होता है। भाव जगत् के प्रतिहार हैं। अबुध मन के भाव निहार हैं। भावों से भक्तों का उद्धार है। भाव बन्धन के तार हैं।

कृष्ण इस जगत् के नायक हैं। धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित एवं धीर प्रशान्त ये चार प्रकार के नायक माने गये हैं। धीरोदत्ताद्नियक अनुकूल, दक्षिण, शठ एवं धृष्ट के भेद से सोलह प्रकार के कहे गये हैं। सभी नायकों का समावेश कृष्ण में है। अतः कृष्णाय नमः।

कृष्णोद्भूत गीत कर्मशास्त्र है। भाव कर्म के प्रेरक हैं तथा क्रिया के कारक हैं। क्रिया का फल कर्म है। स्त्रैण और पौरूष दो प्रकार के कर्म हैं। कृष्ण इन दोनों प्रकार के कर्मों के अधिष्ठापक हैं। कृष्ण के वाक्कर्म का प्रमाण गीता ग्रन्थ है। दूसरों को अभीष्ट अर्थ का ज्ञान कराने के लिए उत्तम बुद्धि का आश्रय लेकर, वागारम्भ व्यापार होता है। सामान्य भाषण को आलाप, अधिक भाषण को प्रलाप, दुःखपूर्ण वचन को विलाप, बारम्बार कथन को अनुलाप, कथोपकथन को संलाप, निरर्थक भाषण को अपलाप, वार्ता के परिवहन को संदेश, विषय के प्रतिपादन को निर्देश, तत्वकथन को अतिदेश, निस्सार वस्तु के वर्णन को अपदेश, शिक्षापूर्ण वचन को उपदेश तथा व्याजोक्ति को व्यपदेश कहते हैं। ये 12 प्रकार के वचन द्वादशात्मा कृष्ण से हैं। गीता में अर्जुन को कृष्ण ने उपदेश दिया है। इसमें संदेश, निर्देश, अतिदेश तथा व्यपदेश का सौन्दर्य द्रष्टव्य है तथा आलाप, प्रलाय, विलाप ,अनुलाप, संलाप का संयोजन सुष्ठु है। इसमें यथा स्थान उपदेश एवं अपलाप की झलक मात्र मिलती है। अतएव यह पूर्ण वाक्शास्त्र है।

अर्जुन का किस कर्म से कल्याण होना है,उसे अब यह पूरी तरह ज्ञात हो गया है। जब पशु अपने हित-अहित को पहचानता है तो अर्जुन तो मनुष्य है। वह क्यों नहीं जानेगा।

निज हित अनहित पसु पहिचाना ।। – अयोध्याकाण्ड

राम ने पिता की आज्ञा को माना तथा वन गये। पिता गुरु होता है। गुरु का भलीभाँति आदर करने वाला सम्पूर्ण विभव को पाता है। राम गुरु वशिष्ठ को कितना सम्मान देते हैं, यह सर्वविदित है।

जे गुरु चरन रेनु सिर धरहीं। तें जनुसकल विभव बस करहीं ।। अयोध्याकाण्ड

अर्जुन को अपने गुरुकृष्ण का सम्मान करना है, उनके आदेश के अनुसार युद्ध करना है। कृष्ण तो जगत के पिता हैं। उनका आदेश सर्वोपरि है।

पितु आयसु सब धरम क टीका ।।  – अयोध्याकाण्ड

माता-पिता, गुरु एवं स्वामी का आदेश मानना, समस्त धर्मरूपी पृथ्वी को धारण करने में समर्थ शेष जी के समान है। गुरु का प्रसाद (अनुग्रह) सर्वत्र रक्षक होता है।

“मातु पिता गुरु स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू।।” गुरुकृष्ण की प्रसन्नता ही अर्जुन का रक्षाकवच है तथा गुरुकृष्ण की आज्ञा का पालन करना धर्म है। अब, इसके लिए अर्जुन तत्पर है।

(लेखक माधव ज्ञान केन्द्र इण्टरमीडिएट कालेज, खरकौनी, नैनी-प्रयागराज में प्रधानाचार्य है।)

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