भारतीय भाषाओं (कन्नड़, बंगला, ओड़िया और असमिया) का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान – 2

– डॉ. कुलदीप मेहंदीरत्ता

कन्नड़ भाषा का योगदान

स्वतंत्रता संग्राम में कुछेक अपवादों को छोड़कर समाज जागरण और राष्ट्रीय चेतना के स्वर प्राय: प्रत्येक भाषा, भाषा क्षेत्र और साहित्य में दिखाई पड़ते हैं। साम्राज्यवाद और सामाजिक विषमता ये दो ऐसी कुप्रवृतियां रही हैं जिनके विरुद्ध सारे भारत ने संघर्ष किया। कन्नड़ भाषा साहित्य में भी तत्कालीन परतन्त्रता, सामाजिक असमानता तथा कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष दिखाई पड़ता है। कन्नड़ कवियों ने देशी काव्यधारा अपनाते हुए बोलचाल की भाषा और स्थानीय लोकगीतों को आधार बनाकर साहित्य रचना की कन्नड़ में मास्ति वेंकटेश अयंगर (साहित्यिक नाम ‘श्रीनिवास’), डी वी गुण्डप्प, कुवेम्पु (के.वी. पुट्टप्पा), मंगेश्वर गोविन्द आदि ने राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्य रचा। इसी प्रकार भारत ने गौरवमयी अतीत को आधार बनाकर कन्नड़ में आलूर वेंकटराव, नरसिंह आचार्य पुरप्पा ने राष्ट्रीय चेतना यज्ञ में साहित्यिक आहूतियां डाली।

ब्रिटिश साम्राज्यवाद का विरोध तथा राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति के स्वरों को कन्नड़ भाषा में महत्त्वपूर्ण स्थान मिला।  भारत के इतिहास और संस्कृति को आधार बनाकर गरुण, वेंकट रामैया, कैलाशम,  मूर्तिराव, श्रीरंग आदि ने कन्नड़ नाटक रचे। इन नाटकों का प्रभाव कन्नड़ भाषी क्षेत्र की जनता पर पड़ा और उन्हें स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने की प्रेरणा मिली। मास्ति वेंकटेश अयंगार को आधुनिक कन्नड़ कहानी के पिता के रूप में स्थान दिया जाता है।

उपन्यास के क्षेत्र में १८८५ में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास ‘दुर्गेश नन्दिनी’ का बी. वेंकटाचार्य ने कन्नड़ भाषा में अनुवाद किया। तत्कालीन सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का प्रभाव सभी भारतीय भाषाओं में रचे जा रहे साहित्य पर दिखाई पड़ता है, गांधी जी के प्रभाव में अछूतोद्धार का विषय कन्नड़ उपन्यास में वैचारिक विन्यास का विषय बना। महात्मा गाँधी से प्रभावित होकर स्वतन्त्रता आन्दोलन के पथी बने शिवराम कारंथ का उपन्यास ‘चोमन दुदी’ तत्कालीन समस्याओं विशेषकर निर्धनता और सामाजिक विषमता पर एक मार्मिक प्रहार है।

बंगला भाषा का योगदान

बंगाल और बंगला भाषा की भारत में स्वतन्त्रता संग्राम में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बंगाल को यदि राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की ऊर्जा का उद्गम स्त्रोत कहा जाए तो गलत नहीं होगा। बंगाल और बंगला साहित्य से भारतीयों को मिली संघर्ष की उर्जा ने हमारे राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम को निरंतर गतिशील बनाए रखा। बंगाल की धरती राजा राममोहन राय, ईश्वर चंद विद्यासागर बंकिम चंद्र चटर्जी, केशव चंद सेन, स्वामी विवेकानंद, सुरेन्द्र नाथ बैनर्जी, प्रफुल्ल चंद राय, जगदीश चंद वसु, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अरविंद घोष जैसे महान व्यक्तित्वों की जन्म तथा कार्य स्थली रही है। सुभाष चंद बोस, चितरजन दास, सूर्य सेन, बारीन्द्र घोष जैसे क्रांतिकारी व्यक्तित्वों ने देश में संघर्ष को एक नई दिशा प्रदान की।

बंगला भाषा और साहित्य के योगदान को दर्शाने के लिए इतना ही पर्याप्त है कि हमारे भारत का राष्ट्रीय गान और राष्ट्रीय गीत, दोनों ही बंगला भाषी साहित्यकारों द्वारा रचे गए हैं। सम्पूर्ण देशवासियों में रक्त की गति तीव्र कर देने वाला जय घोष ‘वंदे मातरम्’ बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंद मठ’ से लिया गया है। बंगला साहित्य के एक अन्य प्रमुख हस्ताक्षर हेम चंद्र चट्टोपाध्याय की कविताओं ‘भारत विलाप’, ‘भारत शिक्षा’ और ‘भारत-संगीत’ ने बंगाली जनता में राष्ट्रीय चेतना के जागरण का आह्वान किया।  ईश्वर चंद्र गुप्त, माईकेल मधूसूदन दत्त, रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि कवियों ने राष्ट्रीय जागरण की कविताएँ लिखी। रविन्द्र नाथ टैगोर को ‘गीतांजलि’ के लिए नोबेल पुरस्कार भी मिला। इस पुरस्कार ने भारतीय काव्य प्रतिमा को विश्व में साहित्य पटल पर सदा के लिए अंकित कर दिया।

संस्कृत नाटकों का भावानुवाद तथा रूपांतरण कर बांगला में प्रदर्शन, बांगला नाटक साहित्य की प्रारम्भिक प्रवृतियां रही हैं। राजा पुरुरवा तथा उर्वशी का प्रेम और उनके विवाह की कथा विक्रमोर्वशीयम्, रत्नावली, अभिज्ञान शाकुंतलम आदि अनुदित नाटकों ने भारत के गौरवमयी अतीत से बंगाली जनता को परिचित करवाया। देश कोई भी हो, सांस्कृतिक गौरव की अनुभूति राष्ट्र के इतिहास के प्रति एकता का भाव जाग्रत करती है और वर्तमान में राष्ट्रीय एकता का कारक बनती है। इतिहास को आधार बनाकर बंगला भाषा में लिखे गए नाटकों – दुर्गादास, मेवाड़ पतन, चन्द्रगुप्त, सिंहलविजय तथा प्रतापसिंह आदि का प्रभाव देश की जनता, विशेषकर बंगाल की जनता पर पड़ा। राजपूत वीरों के मातृभूमि प्रेम और बलिदान की भावना ने न केवल बंगालियों को राजपूताने से भावात्मक तौर पर जोड़ा, बल्कि देश के लिए सर्वस्व न्योछावर कर देने की प्रेरणा भी दी। इसी प्रकार दीनबंधु मिश्र का विख्यात नाटक ‘नील दर्पण’ अंग्रेजो की शोषणकारी व्यवस्था के प्रति विद्रोह का स्वर है। यह नाटक देश प्रेम को आधार बनाकर अंग्रेजी साम्राज्यवाद के दमनकारी स्वरूप को चित्रित करता है।

सन् 1800 में कोलकत्ता में फोर्ट विलियम महाविद्यालय की स्थापना हुई। हालांकि इसका मूल उद्देश्य अंग्रेजों को भारतीय भाषाओं और संस्कृति से परिचित कराना था, लेकिन अंग्रेजों के न चाहते हुए भी भाषा और संस्कृति पर किया गया लेखन भारतीय समाज के लिए कुछ न कुछ हितकारी होना ही था। कलकत्ता में इस महाविद्यालय, इसके शिक्षकों और अन्य प्रबुद्ध जनों के कारण बंगला और हिंदी भाषा के गद्य का विकास हुआ और दोनों भाषाओं का मानवीकरण होना प्रारंभ हुआ।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा १८६५ में रचित बंगला उपन्यास ‘दुर्गेश नन्दिनी’ इतना लोकप्रिय हुआ कि कई भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया। बंकिम चंद्र का ‘आनंद मठ’ उपन्यास संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यह उपन्यास भी सारे भारत में लोकप्रिय हुआ। ‘आनंद मठ’ का गीत ‘वन्दे मातरम’ न केवल देश-विदेश में प्रसिद्ध हुआ, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और क्रांतिकारियों का ध्येय वाक्य बन गया। हजारों कीर्तित और अकीर्तित क्रांतिकारी ‘वन्दे मातरम’ गाते हुए स्वतंत्रता की बलिवेदी पर बलिदान हो गए। इसी प्रकार सामाजिक क्षेत्र में स्त्री-पुरुष समानता तथा सामाजिक समानता को लेकर शरत चंद्र चट्टोपाध्याय ने भावनात्मक उपन्यास लिखे।

ओड़िया भाषा का योगदान

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से देश में एक नव जागरण का युग प्रारंभ होता है। सामाजिक-धार्मिक उत्थान के लक्ष्य से उत्प्रेरित सामाजिक संगठनों और महानुभावों ने समाज को नई दृष्टि प्रदान करने का कार्य किया। ओड़िया समाज और साहित्य में भी राष्ट्रीय चेतना के स्वर को प्रमुखता मिली। यह जगत प्रचलित है कि व्यक्ति हो या राष्ट्र, वर्तमान अगर संघर्ष और दुविधा से भरा हो परन्तु लक्ष्य की स्पष्टता और प्राप्त करने की उत्कट आकांक्षा हो तो व्यक्ति और राष्ट्र स्वयंमेव अपने गौरवमयी अतीत से ऊर्जा प्राप्त करने का कार्य करते हैं।

फकीर मोहन सेनापति, मधुसूदन राव, चिंतामणि, नवलकिशोर तथा गंगाधर प्रभृति कवियों ने राष्ट्रवादी चेतना को ओड़िया में अभिव्यक्ति प्रदान की। सेनापति ने अपने नाम को सार्थक करते हुए ओड़िया में राष्ट्रवादी स्वर के रचाव का नेतृत्व किया। इसी प्रकार गंगाधर और चिंतामणि ने राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना को ओड़िया में नए आयाम दिए। भारत के स्वर्णिम अतीत की भावभूमि पर इन कवियों ने अपना साहित्य रचा। इसके अलावा ओड़िया के तत्कालीन कवियों गोपबंधु दास, नंद किशोर बल, लक्ष्मीकांत महापात्र, नीलकंठ दास आदि के रचित साहित्य पर गाँधीवाद का स्पष्ट प्रभाव दिखाई पड़ता है।

१९३१ में प्रकाशित ‘सबुज कविता’ में कालिंदी चरण पाणिग्रही तथा वैकुंठनाथ पटनायक ने दलितों और किसानों की समस्याओं और शोषण को अपनी कविता में स्थान दिया। ओड़िया में पहले उपन्यास के रूप में फकीर मोहन सेनापति द्वारा रचित ‘छ माण आठ गुंठ’ स्वीकारा जाता है। इस सामाजिक उपन्यास की रचना के बाद गाँधी जी के सामाजिक-राजनीतिक विचारों का प्रभाव प्रमुख ओड़िया उपन्यासों पर दिखाई पड़ता हैं। राष्ट्रीय आन्दोलन में जनता में बढ़ती राष्ट्रीय चेतना के साथ  ग्राम्य-जीवन, जमींदारों द्वारा किए गए शोषण, सामाजिक असमानता के स्वर तात्कालिक उडिया साहित्य की आधारभूमि बने। गोपीनाथ मोहन्ती ने ‘हरिजन’ की रचना की जिसकी तुलना प्रेमचंद की प्रेमाश्रम, रंगभूमि और कर्मभूमि जैसी रचनाओं से की जाती है।

असमिया भाषा का योगदान

स्वतंत्रता संग्राम चाहे किसी भी देश का रहा हो, सांस्कृतिक और साहित्यिक प्रेरणा के बिना स्वतन्त्रता के संघर्ष में सफलता प्राप्त नहीं होती। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में यह बात ‘नवजागरण’ की भूमिका से स्पष्ट होती है। हिंदी में यह भूमिका भारतेंदु हरिश्चंद्र तथा असमिया में लक्ष्मीकांत बेजबरुआ ने निभाई। असमिया भाषा के इस हरिश्चंद्र ने ‘जोनाकी’ ‘असम बंधु’, ‘असमतारा’ और ‘लोराबंधु’ जैसी पत्रिकाओं में विचारोतेजक लेखन के माध्यम से तत्कालीन समाज के नवजागरण के लिए प्रयास किया। सामाजिक कुरीतियों ने परिष्कार और समाज में परस्पर स्वीकृति और सौमनस्यता को केंद्र में रखकर इन पत्रिकाओं में सामाजिक सुधार का मार्ग प्रशस्त किया।

असमिया में कमकाकांत भटाचार्य के काव्य में राष्ट्रीय चेतना और प्राचीन संस्कृति से प्राप्त प्रेरणा का स्वर स्पष्ट परिलक्षित होता है। असमिया कवियों जैसे चंद्रकुमार अग्रवाल, अंबिका गिरिराय चौधरी तथा रघुनाथ चौधरी आदि ने इतिहास और प्राचीन संस्कृति को आधार बनाते हुए देश प्रेम की रचनाएँ लिखी। ‘ओ मोर आयोनर देश’ और ‘वीन आरू वरगि’ के रचियता बेजबरुआ द्वारा रचित इन राष्ट्रभक्ति की रचनाओं को असमिया में विशेष स्थान प्राप्त हैं। बेजबरुआ ने अपने मित्रों के साथ असमिया भाषा की उन्नति और परिष्कार के लिए ‘असमिया भाषा उन्नति साधनी सभा’ नामक संस्था का भी निर्माण किया। इसी प्रकार अंबिका गिरिराय चौधरी ने गीता और वैष्णव साहित्य के आध्यात्मिक प्रभाव लिए हुए असमिया में साहित्य का सृजन किया। हितेश्वर वरबरुआ की रचना ‘मुख्य गामारु’ राष्ट्रीयता के उद्दात स्वर को उद्भासित करती है। इसी प्रकार नीलमणि फुकन की अंतिम रचना ‘शतधारा’ में गांधीवादी विचार और संघर्ष का प्रभाव स्पष्ट देखने को मिलता है। दंडिनाथ कलिता द्वारा रचित ‘असम-संध्या’ में अंतिम अहोम राजा चन्द्रकांत सिंह की कथा को आधार बनाकर असम की परतंत्रता का मार्मिक वर्णन किया गया है।

उपन्यास सृजन के क्षेत्र में अल्बनुष किम्बल गुर्नी के १८७७ में रचित उपन्यास ‘कामिनीकान्त’ को बहुत से विद्वान असमिया के पहले उपन्यास के रूप में स्वीकारते हैं। धर्म परिवर्तन के सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों को यह उपन्यास समाज के समक्ष रखता है। रजनी बारदोलोई की रचना ‘ताम्रेश्वरी मंदिर’ समाज के पुनर्जागरण पर आधारित रचना है। गाँधी जी से प्रेरित देव तालुकदार ने ‘धुवालि कुवालि’, ‘आग्नेय गिरि’ और विद्रोह जैसे उपन्यासों से तत्कालीन समाज को उसके उत्तरदायित्व को याद दिलाने का प्रयास किया है।

कहानी लेखन की दृष्टि से आधुनिक युग में लक्ष्मीनारायण बेजबरुआ, नकुल भूइया, नगेन्द्र नारायण चौधरी, दण्डीनाथ  कलिता, लक्ष्मीकांत फुकन आदि का नाम उल्लेखनीय है। दीनानाथ शर्मा की कहानी ‘मृत्युहीन मृत्यु’ में देश की स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व बलिदान कर देने वाले भाई-बहन की कहानी है जो समाज को यह प्रेरणा देने में सक्षम है कि स्वतंत्रता प्राप्त करने की क्या कीमत देनी पड़ सकती है और प्रत्येक देशवासी को ऐसे ही सर्वस्व बलिदान के लिए तैयार रहना चाहिए। नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में शुभेन्द्र मोहन गोस्वामी के प्रयासों से गोहाटी में आर्य-नाट्य हाल’ की स्थापना हुई। आसाम में ‘केलकटा थियेटर’, ‘स्टार’, ‘मनमोहन’ आदि नाट्यशालाएं लोकप्रिय हुई। अंग्रेजी नाटकों के अनुवाद से लेकर असमिया में मौलिक रचना लेखन की अपनी एक विशिष्ट यात्रा है। शेक्सपियर के नाटकों का अनुवाद असमिया लेखन में अलग स्थान रहता हैं। पौराणिक आख्यानों को आधार बनाकर रमाकांत चौधरी ने ‘सीता हरण’,  देवशर्मा ने ‘हरिश्चन्द्र’, डी. एन बारदोलोई ने ‘वैदेही वनवास’, आदि की रचना की। ‘अभिमन्यु वध’, ‘शकुंतला’, ‘दक्ष यज्ञ’, ‘गुरु दक्षिणा’, ‘मेघनाथ वध’, ‘लव कुश’, ‘अग्नि परीक्षा’ आदि नाटकों का सृजन निश्चय ही पौराणिक संदर्भो के माध्यम से अपने अतीत और संस्कृति के गौरव को ध्यान में रख राष्ट्रीय और सामाजिक पुनर्जागरण की प्रस्तावना थी। इसी प्रकार ‘लचित बडफूकन’, ‘जयमती’, ‘गदाधर’, ‘विद्यापति’, ‘सतीर तेज’ आदि नाटकों में इतिहास और कल्पना का सामंजस्य प्रस्तुत कर समाज को जागृत करने का सार्थक प्रयास किया।

(लेखक चौधरी बंसीलाल विश्वविद्यालय, भिवानी (हरियाणा) में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष है।)

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