सा विद्या या विमुक्तये
✍ राजेन्द्र सिंह बघेल
पिछले दिनों दिल्ली में एक पुराने मित्र से भेंट हुई। औपचारिक शिष्टाचार वार्ता के क्रम में ध्यान आया कि इतने वर्षों के बाद मिले इस मित्र से पूर्व के विद्यार्थी जीवन के बारे में बातें की जाये।
एक रेस्तरां में हम दोनों ने जलपान किया और शुरू हो गई स्कूली दिनों की वे तमाम सारी बातें; वह मित्र आजकल रेलवे विभाग में बड़े अधिकारी हैं। बात-बात में हिन्दी पढ़ाने वाले गुरुजी की चर्चा चली। उनके पढ़ाने के तरीके और सिखाने की विधियों की बात करते-करते हम दोनों अपने अतीत में चले गए। किसी कविता के एक-एक पद का वह ऐसा सस्वर पाठ करते, कठिन शब्दों का सरल रीति से अर्थ बताते और उस कविता के भाव व संदेश से भी हमें भली-भांति परिचित कराते तो आनंद आ जाता। रेलवे में तकनीकी कामों में व्यस्त रहने के बाद भी हमारे मित्र को साहित्य में ऐसी रूचि जगी कि आज भी वह कविता पाठ करने अनेक कवि सम्मेलनों में जाया करते हैं। मित्र से विदा होने के बाद ध्यान आया कि रेलवे की इंजीन्यरिंग सेवा में व्यस्त रहने के बावजूद उन्हें साहित्य में रूचि कैसे जगी होगी? फिर वही हिन्दी पढ़ाने वाले गुरुजी की याद आई। उनका वह आनन्ददायक शिक्षण, भाव से भरी कविताओं में रचा-बसा रस, छन्द व अलंकार तथा कहानियों में वर्णित मानवता के संदेश से परिचय कराने की कला ही साहित्य में रूचि बढ़ाने का कारण बनी होगी। गुरुजी का भाषा शिक्षण का वह कौशल जो वो कक्षा में दर्शाते, कितनों के मन पर दूरगामी परिणाम डाल जाता था।
अच्छा! आप भी याद करिए उन शिक्षकों को जिन्होने अपने शिक्षण कौशल की कोई न कोई छाप अवश्य डाली होगी। हमारे जीवन में उनका प्रभाव आज भी तो होगा न? यह किसी के जीवन में गहरी जड़ें जमाता है और भविष्य में बहुत काम आता है। कुशलताएँ किसी भी क्षेत्र की हों – आइये! इनकी विस्तृत जानकारी हम सभी करने का प्रयत्न इस लेख के माध्यम से करें।
कुशलता कौशल शब्द से बना है दुनिया में हर प्राणी किसी न किसी क्षेत्र में यह गुण प्राप्त करता है। शिक्षण के क्षेत्र में इसका विकास हम कैसे करें यह जानना जरूरी है। इस दिशा में कुछ परिभाषाएँ इसे समझने में सहायक सिद्ध होंगी “शिक्षण कौशल शिक्षक से संबन्धित व्यवहारों का समूह है जो वह कक्षा में करता है, उसके द्वारा वह छात्र के अधिगम में सहायता करता है।” इस परिभाषा से स्वतः स्पष्ट है कि कक्षा में छात्रों को किसी भी विषय वस्तु को समझने व सीखने में शिक्षक के शैक्षणिक कौशल से बहुत बल मिलता है। एक कुशल शिक्षक विषयवस्तु को सीखने का ऐसा अवसर देता है कि प्रत्येक स्तर का विद्यार्थी पाठ के अंत में यह अनुभव करता है कि उसकी जानकारी में अभिवृद्धि हुई। शैक्षणिक कुशलता को परिभाषित करते हुए मेकिनटियर एंड व्हाइट यह वर्णन करते हैं “शैक्षणिक कुशलता कक्षा में विशिष्ट अंतः प्रक्रिया (Interaction) को उत्पन्न करती है जो शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक है और छात्रों को सीखने में सुगमता प्रदान करती है।” यूँ कहिए कि – Interaction between the teacher and the students should be cordial. डा. एस.पी. कुलश्रेष्ठ (1993) ने एक और परिभाषा शैक्षणिक कुशलता की इस प्रकार दी है “शिक्षण कौशल शिक्षक के हाथ में वह शस्त्र है जिसका प्रयोग करके वह अपने शिक्षण को सक्रिय तथा प्रभावी बनाता है; साथ ही कक्षा की अन्तःक्रिया (Interaction) में सुधार लाने का प्रयत्न करता है।” तीनों परिभाषाओ से जो बात उभरकर आई कि हमारे शिक्षण कौशल की विभिन्न प्रक्रियाओं से विद्यार्थी की ग्रहणशीलता (Receptivity) बढ़ी या नहीं। ग्रहणशीलता तभी बढ़ेगी जब विद्यार्थी की बुद्धिशीलता (Brainstorming) होगी।
21वीं सदी और विश्व में भारत की जिम्मेदारियों को समझने के अनेक अवसर हमने कक्षा में छात्रों को दिया है। हम यह कह सकते है कि आने वाली चुनौतियों का सामना भी वह सजगता के साथ करेगा। लेख के आरंभ में हिन्दी के एक कुशल शिक्षक व उनकी शिक्षण पद्धति का हमारे मित्र पर क्या प्रभाव पड़ा उनकी चर्चा की थी। हमारे शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की एक बड़ी ज़िम्मेदारी पहले से नियत है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी शिक्षकों के दायित्व तथा उनकी शैक्षणिक कुशलताओं के विकास पर पर्याप्त साहित्य का सृजन किया गया है – प्रस्तुत लेख भी इस दिशा में एक प्रयास है, यह लेख भी कोई परिणाम दे सका तो मुझे भी आनंद का अनुभव होगा।
(लेखक शिक्षाविद है और विद्या भारती के अखिल भारतीय प्रशिक्षण संयोजक रहे हैं।)
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