शिक्षार्थ संकल्प

शिक्षार्थ संकल्प

संकल्प जो शिक्षण को सरल, सुगम व सुबोध बना देते हैं।

राजेन्द्र सिंह बघेल

 

विद्यालय मात्र इंटों से बना भवन नहीं या विभिन्न उद्देश्य की पूर्ति हेतु भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों के एकत्रीकरण का केंद्र भी नहीं वरन शिक्षा के उद्देश्य की पूर्ति हेतु एवं आनन्द की अनुभूति कराने वाला एक मनमोहक वृन्दावन है। ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की संकल्पना यही साकार होती है। यही सन्देश ये पंक्तियाँ भी दे रही है। शिक्षा का अंग्रेजी शब्दानुवाद Education है यह E+Duco से मिलकर बना है। E अर्थात अन्तर्निहित शक्तियों को विकसित करना है।

बालक के सर्वांगीण विकास की संकल्पना के अनुरूप आचार्य उसे जानने, परखने एवं पहचानने का प्रयत्न करता है। कक्षा का वातावरण स्नेहिल बनाकर उसे आकर्षक एवं मनमोहक स्थल बना देता है। यह शिक्षण जैसे पवित्र कार्य के लिए कुछ संकल्प लेता है। सत्र प्रारम्भ हो चुका है। नये पुराने सभी आचार्यों के लिए नीचे वर्णित बिन्दु अत्यंत उपयोगी एवं उनके शिक्षण को परिणामकारी बना सकेंगे तो आइये विचार कर इन्हें अपनाया जाएँ।

बाल केन्द्रित शिक्षण

१. उस स्थान पर जा रहा हूँ जहाँ एक समूह में अनेक समूह बैठे हैं। एक में अनेक कक्षाएँ है। बौद्धिक, शारीरिक, सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से अनेक श्रेणियाँ है। यहाँ अनेकता में भी एकता है- अनेक रुचियों तथा अभिरुचियों के भैया-बहनों में आध्यात्मिक प्रकाश बिम्ब समान है।

२. मैं बच्चों को जानूंगा, पहचानूँगा तथा अपनाऊँगा। मैं उन्हें नाम से पुकारूंगा। मैं उनके परिवार की पृष्ठभूमि, वंशानुक्रम तथा वातावरण को पहचानूंगा। जो पंक्ति के अन्त में खड़ा है, उसको गोद लूँगा, उसे अपनाऊँगा। सम्पर्क तथा स्नेह से उसे आगे बढ़ाऊँगा, गतिरुद्ध बालक को गतिशील बनाने का प्रयास करूंगा।

३. पाठ्यक्रम पूर्ण करने का अर्थ पुस्तक में छपे निर्जीव अक्षर तथा वाक्यों को किसी ढंग से बच्चों के मस्तिष्क में ठूंसना नहीं, अपितु प्रत्येक विद्यार्थी का ध्यान रखकर इसे सभी की सहभागिता से बालक केन्द्रित विधि से पूर्ण करूँगा।

४. मैं विद्यार्थी तथा आचार्य सम्बन्ध के कथन में विश्वास करता हूँ। छात्र और आचार्य दोनों ही जीवन भर ज्ञान अर्जित करते हैं तथा कक्षा में दोनों ही सीखते हैं। “ॐ तेजस्विनावधीतम् अस्तु” अर्थात गुरू और शिष्य दोनों का ज्ञान तेजमय हो। यह मेरा आदर्श वाक्य आदर्श रहेगा।

५. मैं बच्चों की जिज्ञासाओं का समाधान करूँगा। बच्चों कैसे भी प्रश्न करें, मैं उन्हें सुनकर उत्तर दूंगा। उस दिन नहीं तो दूसरे दिन उत्तर अवश्य दूंगा।

६. मैं बिना विचलित हुए बच्चों के अच्छे कामों पर बधाई देने में चुस्त रहूँगा। मैं बच्चों को अपने हृदय का अंग मानूंगा, ढेर ढेर प्यार करूँगा।

७. मैं मास्टर नहीं, आचार्य हूँ। आचरण से बालकों को जीवन मूल्यों की शिक्षा दूंगा।

८. गृहकार्य ऐसा दूंगा, जो सबके लिए सुरुचिपूर्ण हो तथा बिना किसी दबाव के उसे प्रत्येक विद्यार्थी पूर्ण कर सकें।

९. शारीरिक रूप से अक्षम, पोलियोंग्रस्त, विकलांग, ऊँचा सुनने वाले तथा दृष्टि बाधित छात्रों को प्रथम पंक्ति में अपने निकट बैठाकर उन्हें स्नेहपूर्वक सिखाऊंगा।

१०. प्रश्न पूछते समय कठिन व स्तरीय प्रश्न तथा सरल प्रश्न छात्रों के अधिगम क्षमता का ध्यान रखकर पूछूंगा।

११. कमजोर छात्रों द्वारा प्राप्त अधूरे व अपूर्ण उत्तर पर भी उन्हें प्रोत्साहन देकर पूर्ण व स्पष्ट उत्तर देने के लिए प्रेरित करूँगा।

१२. बालक की जिस क्षेत्र में प्रखरता या रूप होगी उसे जानकर अभिभावक को भी उसके पाल्य के इस सद्गुण या रूचि की जानकारी देकर उसे प्रोत्साहन देने की बात करूँगा। कक्षा शिक्षण के समय उपरिवर्णित बातें जहाँ बालक को केन्द्रित कर उसके उपयुक्त विकास के लिए सहायक सिद्ध होंगी वहीं बालक की जागरूकता तत्परता एवं सृजनात्मकता बढ़ाने के लिए ये क्रियाधारित कार्यकलाप उपयोगी होंगे।

क्रिया आधारित शिक्षण

कहा गया है कि कान से सुनी बात से आँखो देखी बात अच्छी है और सर्वश्रेष्ठ तो यह है कि सुनकर देखकर तथा स्वयं करके सीखी हुई बात तो आजीवन याद रहती है। एतदर्थ अध्यापन के समय हम ये सब कुछ करेंगे।

१. हम अपने विषय के साथ ऐसी सामग्री जोड़ेंगे जो मस्तिष्क में उत्प्रेरणा लायेगी। ऐसा करने से विद्यार्थी की स्मरण शक्ति बढती है।

२. पुस्तकों के छपे अक्षर दृश्य-श्रव्य उपकरणों से सजीव हो उठते हैं। अध्यापन के समय सहायक सामग्री, टेप रिकॉर्डर तथा अन्यान्य सभी उपयोगी सामग्री का प्रयोग करूँगा।

३. पाठन क्रिया में मौखिक अभिव्यक्ति का मूल्यवान स्थान है। बालकों को बोलने का अभ्यास करना चाहिए। प्रश्नमंच, वाद-विवाद प्रतियोगिता, विषय पठन, अभिनय, ध्वनिवर्धक के सम्मुख प्रत्येक बालक का आकर बोलना आदि कार्यक्रमों से बालक की मौखिक अभिव्यक्ति की क्षमता बढ़ती है। इन युक्तियों का प्रयोग करूंगा।

४. विषयवस्तु में हृदय उड़ेले बिना उसमें प्राण नहीं डलते। अच्छा आचार्य वह है, जो बच्चों को रुला दे, हँसा दे तथा

भाव-विभोर कर दे। दुखांत चलचित्र देखने हम जाते हैं। पैसे देकर रोते हैं। बाहर आकर कहते हैं कि चलचित्र बहुत अच्छा लगा। कारण दृश्य के साथ एकाकार किया, मनोमिलन हुआ। यही स्थिति कक्षा में भी होनी चाहिए। पाठ की विषयवस्तु को इसी तरह प्रस्तुत करूँगा।

५. कविता पाठ करते समय जिस भाव या रस का साहित्य है वैसा ही भावमय, रसमय होकर सिखाऊंगा। सभी छात्र-छात्राएं आनन्द का अनुभव करेंगे।

६. कक्षा में भाषाओं की शब्द सामर्थ्य बढ़ाने के लिए Word building, वाक्य प्रयोग, विलोम तथा पर्यायवाची सिखाने के लिए समूह बनाकर क्रिया आधारित प्रयोग करूंगा। बार-बार उच्चारण करके (Drilling), दुहरवाना इस तथ्य का ध्यान रखूंगा, यह शुद्ध उच्चारण को पुष्ट करता है।

७. गणित के पाठ में संख्या, पहाड़ा, पैमाना एवं सूत्रों को क्रिया-विधि से कक्षा में सबको अवसर देकर, समूह बाँटकर सिखाऊँगा। गणित में क्षेत्रफल आयतन निकालने का अवसर दूंगा।

८. खेल एवं मनोविनोद Games & Fun का मन्तव्य सिखाकर खेल में दिये तथ्य (Theme) की जानकारी दूंगा यथा सहायता, शृंखला निर्माण एवं कबड्डी आदि। खो-खो, कबड्डी, बैडमिन्टन के पाल्हे बनवाकर उनकी अभिरुचि खेल में बढ़ाऊंगा।

९. ऐतिहासिक भौगोलिक स्थल का दर्शन सर्वेक्षण कराऊँगा। सरस्वती शैक्षिक यात्रा का आयोजन करूंगा।

१०. विभिन्न प्रकार के संकलन करना यथा साहित्यकारों का चित्र, ऐतिहासिक स्थल, पत्थर, जड़े, तने, पुष्प, पत्तियाँ बीज आदि का संकलन की वृत्ति का विकास करते है – यह बताकर सिखाऊंगा।

११. कक्षा में प्रखर छात्रों की सहायता देकर न्यून स्तर वाले छात्रों को सामान्य स्तर से औसत स्तर तक लाने में सहायता मिल सकती है। श्रुत लेख का मूल्यांकन, गणित का अभ्यास कार्य निरीक्षण कराने का कार्य प्रखर छात्रों की सहायता से कक्षा में ही कराऊँगा।

किसी आचार्य के लिए उपयुक्त वर्णित संकल्प लेकर कक्षा अध्यापन करना अत्यन्त प्रभावी एवं परिणामकारी तो होगा ही साथ ही ‘सा विद्या या विमुक्तये’ की संकल्पना को साकार भी करेगा। 

(लेखक शिक्षाविद है और विद्या भारती के अखिल भारतीय प्रशिक्षण संयोजक रहे हैं।)

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