शिशु शिक्षा – 3 (जीवन विकास की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया)


 – नम्रता दत्त

शिशु शिक्षा की इस श्रृंखला में हम मनोविज्ञान के आधार पर जीवन के विकास की यात्रा पर विचार एवं चिन्तन करेंगे। यह चिन्तन भारतीयता के आधार पर है। मनोविज्ञान के लिए आमतौर पर किसी देश विशेष की दृष्टि को सामान्यतः स्वीकृति नहीं दी जाती। ऐसा माना जाता है कि ‘मन’ तो प्रत्येक देश के मनुष्य का एक जैसा ही होता है। हां मन सम्भवतः एक जैसा हो सकता है परन्तु उस मानस पटल पर संस्कारों की छाप तो अपनी राष्ट्रीय संस्कृति के अनुरूप ही डालनी होगी। भारत की अपनी संस्कृति और सभ्यता है। इसका अपना जीवन दर्शन है। अतः हमारा मनोविज्ञान भी भारतीय जीवन दर्शन पर ही आधारित है।

शिक्षा जीवन विकास की प्रक्रिया है। अतः यह स्पष्ट है कि इसका सम्बन्ध सम्पूर्ण जीवन से है। यह जन्म से मृत्यु पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। तो इसका चिन्तन भी समग्रता के आधार पर करते हुए भारतीय मनोविज्ञान ने सम्पूर्ण मानव जीवन को तीन भागों में विभाजित किया है। शैक्षिक दृष्टि से इन भागों की उपयोगिता को हम निम्नानुसार समझ सकते हैं –

  • 10 (गर्भाधान से पूर्व) से 05 वर्ष तक शिशुवाटिका अर्थात् खेल खेल में शिक्षा (संस्कार प्रक्रिया)
  • 06 वर्ष से 15 वर्ष तक प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा अर्थात् विद्यालयीन शिक्षा, (शिक्षण प्रक्रिया)
  • 16 वर्ष से जीवन पर्यन्त महाविद्यालयीन शिक्षा (स्वाध्याय एवं जीवन व्यवहार की प्रक्रिया)

यह विभाजन भारतीय मनोविज्ञान के आधार पर किया गया है, इसकी पुष्टि चाणक्य नीति का यह श्लोक करता है –

लालयेत् पंचवर्षाणि, दश वर्षाणि ताडयेत् ।

प्राप्ते षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवद् आचरेत् ।।

उपरोक्त से यह स्पष्ट है कि आयु अनुसार शिक्षा का प्रत्येक चरण कितना महत्वपूर्ण है। यदि एक भी चरण के प्रति हम अज्ञानतावश चूक कर गए तो शेष चरण की यात्रा कितनी फलदायक होगी इसका हम अनुमान लगा सकते हैं। आइए संक्षेप में इन तीनों भागों पर विचार करें।

शून्य (गर्भावस्था से पूर्व) से पांच वर्ष तक (लालयेत् पंचवर्षाणि) – यह अवस्था शैशवास्था कहलाती है। इस अवस्था में माता पिता की भावनाएं, विचार एवं व्यवहार संस्कार प्रक्रिया का एक आधार है। दूसरा आधार है वातावरण। वातावरण में व्याप्त बालक की ज्ञानेन्द्रियों के विषय (रंग, रूप, ध्वनि, गंध और स्पर्श) संस्कार ग्रहण का माध्यम बनते हैं। बालक की विकास प्रक्रिया में गीत, खेल, कहानी, बड़ों का सानिध्य, संस्कारक्षम वातावरण ये सब साधन प्रेरणा के माध्यम बनते हैं। लालन पालन, प्रेम, सुरक्षा, बालक का सम्मान यह सब संस्कार प्रक्रिया को पुष्ट करते हैं। इसलिए हमारे शास्त्रों ने कहा है –‘लालयेत् पंचवर्षाणि’।

इस आयु में शिशु की अभिवृद्धि (Growth) और विकास (Development) दोनों ही होते हैं। शारीरिक विकास के साथ साथ भाषा विकास, संज्ञानात्मक विकास और सामाजिक विकास भी होता है। ऐसी स्थिति में किसी भी प्रकार का भय उसके विकास में बाधक बन जाता है। क्योंकि इस अवस्था में शिशु की जिज्ञासा तीव्र होती है, उसका मन चंचल और सूक्ष्म बुद्धि (अच्छे-बुरे का अन्तर नहीं समझने वाली) निष्क्रिय होती है। अतः जैसा भी वह आसपास के वातावरण से अपनी ज्ञानेन्द्रियों से अनुभव करता है वही संस्कार उसके चित्त पर सीधा चित्रित हो जाता है। इसलिए यदि इस अवस्था में हम उसे किसी प्रकार का भय अथवा क्रोध दिखायेंगे तो ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से उसके चित्त पर यही संस्कार बनेंगे। इसलिए लालन पालन से ही संस्कार देने हैं।

छह से पन्द्रह वर्ष तक (दश वर्षाणि ताडयेत्) – यह बाल्यावस्था है। इसे बुद्धि विकास की अवस्था भी कहा जाता है। पांच वर्ष की आयु के पश्चात् आने वाले दस वर्ष अर्थात् 06 से 15 वर्ष तक बालक को ताड़ना में रखना चाहिए। ताड़ना का अर्थ मार पिटाई से नहीं अपितु ‘देखना’ से है। ‘देखना’ अर्थात पैनी दृष्टि अथवा कड़ा अनुशासन रखना। क्योंकि इस अवस्था में अन्तःकरण मन और चित्त के साथ बुद्धि की सक्रियता भी बढ़ जाती है और इस बुद्धि के विकास के साथ राग द्वेष, पक्षपात, स्वार्थ, अपना-पराया जैसे बहुत से भाव बालक के मन में जन्म लेने लगते हैं जो उसकी सामाजिकता में बाधक बन सकते है। संग का रंग प्रत्येक अवस्था में मनुष्य को प्रभावित करता है। इसी कारण से इस अवस्था में बालक की ताड़ना करनी चाहिए। संगदोष से बचाने के लिए कड़ा अनुशासन लागू करना पड़े तो करना चाहिए। तभी बुद्धि विकास की यह अवस्था ज्ञान अर्जन में सहायक सिद्ध होगी।

यदि शैशवास्था में परिवार ने शिशु को संस्कारित किया है तो इन दस वर्षों मे अधिक ताड़ना की आवश्यकता नहीं पड़ती।

सोलह वर्ष से जीवन पर्यन्त (प्राप्ते षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवद् आचरेत्) – यह अवस्था किशोर/तरूणावस्था कहलाती है। सोलह वर्ष की आयु में सन्तान को मित्र समझना चाहिए। इस अवस्था में संस्कार है, बुद्धि और ज्ञान भी है और वह अब पूर्णतः स्वावलम्बी भी है। इस सभी आधार पर वह स्वाध्याय कर अपने संस्कारों एवं ज्ञान के आधार पर स्वाध्याय द्वारा अपने जीवन व्यवहार के अनुभव प्राप्त करने में सक्षम है। इस समय में उसे एक अच्छे और सच्चे मित्र की आवश्यकता होती है जो माता पिता से अच्छा और कोई नहीं हो सकता क्योंकि आज तक उसे उन्हीं का सानिध्य प्राप्त हुआ है।

शिक्षा मात्र पुस्तकीय ज्ञान नहीं, अपितु जीवन जीने की कला है। यह जीवन पर्यन्त चलती है। अतः इस संसार रूपी पाठशाला में जो अपने संस्कार व ज्ञान के आधार पर प्राप्त अनुभवों से उस रचयिता और रचना का नाम सार्थक करता है वास्तव में वही शिक्षित है।

इस श्रृंखला के अगल सोपान में हम शिशु शिक्षा से सम्बन्धित कालखण्ड (शून्य से पांच वर्ष) लालायेत् पंचवर्षाणि का क्रमशः अध्ययन एवं चिन्तन करेंगे।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)

और पढ़ें : शिशु शिक्षा – 1 (राष्ट्र, शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति)

शिशु शिक्षा – 2 (वर्तमान अवधारणा एवं भारतीय अवधारणा)

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