भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-31 (विज्ञानमय कोश का विकास)


 – वासुदेव प्रजापति

विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्

अपने पिता की आज्ञा पाकर भृगु ने तप किया, और तप करके जाना कि विज्ञान स्वरूप चेतन जीवात्मा ही ब्रह्म है। उन्होंने सोचा कि पिताजी ने जो ब्रह्म के लक्षण बताए थे, वे सब के सब पूर्णतया इसमें पाये जाते हैं। ये समस्त प्राणी जीवात्मा से ही उत्पन्न होते हैं और सजीव चेतन प्राणियों से ही उनके जैसे अन्य प्राणियों की उत्पत्ति प्रत्यक्ष देखी जाती है। उत्पन्न होकर वे इस विज्ञान स्वरूप जीवात्मा से ही जीते हैं। यदि जीवात्मा न रहे तो ये मन, इन्द्रियां, प्राण आदि कोई भी नहीं रह सकते और कोई भी अपना काम नहीं कर सकते।  मरने के बाद ये मन आदि सब जीवात्मा में ही प्रविष्ट हो जाते हैं। जीव के निकल जाने पर मृत शरीर में ये सब देखने में नहीं आते।

अतः विज्ञान स्वरूप जीवात्मा ही ब्रह्म है। यह निश्चय करके वे पूर्व की भांति अपने पिता वरुण के पास आए और आकर उन्होंने अपने निश्चित अनुभव की बात पिताजी को सुनाई। इस बार भी पिताजी ने कोई उत्तर नहीं दिया। पिता ने सोचा, इस बार भृगु बहुत कुछ ब्रह्म के निकट पहुँच गया है, इसका विचार स्थूल और सूक्ष्म दोनों प्रकार के जडतत्त्वों से ऊपर उठकर चेतन जीवात्मा तक तो पहुँच गया है। परन्तु ब्रह्म का स्वरूप तो इससे भी विलक्षण है। वे तो नित्य आनन्दस्वरूप एक अद्वितीय परमात्मा हैं। इसे अभी और तपस्या करने की आवश्यकता है, अतः उत्तर न देना ही ठीक है। इस प्रकार बार-बार पिताजी से कोई उत्तर न मिलने पर भी भृगु हतोत्साह या निराश नहीं हुए। उन्होंने पूर्व की भांति पुनः पिताजी से वही प्रार्थना की – भगवन्! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो आप मुझे ब्रह्म का रहस्य बतलाइए।

तब वरुण ने पुनः वही उत्तर दिया, तू तप के द्वारा ही ब्रह्म के तत्त्व को जानने की इच्छा कर। अर्थात् तपस्या पूर्वक उसका पूर्व कथनानुसार विचार कर। तप ही ब्रह्म है। इस प्रकार पिताजी की आज्ञा पाकर भृगु ने पुनः पूर्व की भांति संयम पूर्वक रहते हुए पिताजी के उपदेश पर विचार किया और पुनः तप में लीन हो गया।

विज्ञान मय कोश का अर्थ

विज्ञान मय कोश अर्थात् बुद्धि। विज्ञान मय कोश मनोमय कोश से अधिक सूक्ष्म और अधिक परिष्कृत है। बुद्धि भी मन के समान बिना आलम्बन के रहती है। बुद्धि का काम है जानना। यह ज्ञान शब्द बुद्धि के साथ ही जुड़ा हुआ है। किसी भी बात को जानने के लिए बुद्धि के पास स्वयं की शक्तियां हैं। निरीक्षण व परीक्षण करना, संश्लेषण व विश्लेषण करना, तर्क व अनुमान लगाना तथा विवेक व निर्णय करना, ये सभी शक्तियां बुद्धि की हैं।

बुद्धि निर्णय करती है

बुद्धि ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से किसी भी वस्तु का अवलोकन करती है और उसे परखती है। विश्लेषण से तात्पर्य है किसी पदार्थ या घटना के सभी आयामों को अलग-अलग करके जानना। संश्लेषण का अर्थ है किसी पदार्थ या घटना के अलग-अलग आयामों को एकत्र करके समग्र को जानना। तर्क का अर्थ है किसी भी घटना के क्या-क्या कारण हो सकते हैं, इसका विचार करना। अनुमान का अर्थ है कार्य को देखकर कारण को जानना और कारण को देखकर कार्य को जानना। जब बुद्धि इन सभी शक्तियों की सहायता से किसी घटना या पदार्थ के सम्बन्ध में सही और गलत को अलग कर जान लेती है, उसे बुद्धि का विवेक कहते हैं। बुद्धि अपने विवेक के आधार पर यह निर्णय करती है कि अमुक काम करना चाहिए या नहीं करना चाहिए।

बुद्धि के लिए मन का ठीक होना आवश्यक है

बुद्धि विवेक पूर्वक सही निर्णय कर सके, इसके लिए मन का ठीक होना आवश्यक है। क्योंकि किसी भी घटना या पदार्थ को मन अपना रंग चढ़ा कर ही बुद्धि के समक्ष प्रस्तुत करता है, तब बुद्धि उसे शुद्ध रूप में नहीं जान पाती। इसके विपरीत जब मन शिक्षित होता है, तब वह पदार्थ या घटना को बिना रंग चढ़ाए, वह जैसा है वैसा ही बुद्धि के सामने रखता है। इस स्थिति में बुद्धि उस पदार्थ को सही-सही जान पाती है। बुद्धि सही जान पाए इसलिए मन का बुद्धि के अनुकूल बनाना आवश्यक है। अर्थात् बुद्धि को तेजस्वी, तीक्ष्ण, विशाल और ग्रहण शील बनाने के लिए मन की एकाग्रता, मन की शान्ति व मन की अनासक्ति आवश्यक है।

विज्ञानमय कोश के विकास का अर्थ

विज्ञानमय कोश के विकास से तात्पर्य यह है कि बुद्धि की ग्रहण शक्ति, धारणा शक्ति, स्मरण शक्ति, कल्पना शक्ति, निरीक्षण-परिक्षण शक्ति, तर्क व अनुमान शक्ति तथा संश्लेषण-विश्लेषण शक्ति का विकास करना ही विज्ञान मय कोश का विकास होना माना जाता है।

बुद्धि के द्वारा ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता बढ़नी चाहिए। बुद्धि ने जो ज्ञान ग्रहण किया है, वह टिका रहना चाहिए। बुद्धि की स्मृति बढ़नी चाहिए, ऐसा नहीं कि अभी तो याद है, किन्तु एक दिन बाद ही भूल गए। कल्पना शक्ति के विकास से बुद्धि निर्माण करती है, तर्क से भी परे जाकर कुछ समस्याओं का हल करती है। हम आँखों से देखते अवश्य हैं परन्तु निरीक्षण नहीं करते। स्थूल से बढ़ते-बढ़ते सूक्ष्म और समग्र निरीक्षण करना, निरीक्षण शक्ति का विकास है। इसी तरह परखना भी है, परखना पांचों इन्द्रियों का विषय है। रूप- रंग, स्वाद, गन्ध, स्पर्श तथा ध्वनि से परखकर जानना, यह परीक्षण शक्ति का विकास है। इस शक्ति का भी स्थूल से सूक्ष्म तक विकास होता है। किसी कार्य के अनेक कारण हो सकते हैं, जो कम कारण ही सोच सकता है उसकी तर्क शक्ति कम विकसित है और जो अधिक कारण सोच सकता है उसकी तर्क शक्ति अधिक विकसित हुई है, ऐसा माना जा सकता है। कार्य को देखकर कारण का अनुमान लगा पाना, जैस मुख पर मुखपट्टी (मास्क) लगा देखकर कोरोना का अनुमान लगाना, अनुमान शक्ति का विकास है। इसी प्रकार स्थूल से सूक्ष्म विश्लेषण कर पाना तथा एक साथ व्यापकता, समग्रता एवं सूक्ष्मता में जानना संश्लेषण-विश्लेषण शक्ति का विकास माना जाता है।

बुद्धि की इन शक्तियों का विकास होने से बुद्धि के लिए कोई भी विषय कठिन नहीं होता, कोई भी विषय अगम्य नहीं रहता। बुद्धि वास्तव में ज्ञान शक्ति है।

विज्ञान मय कोश के विकास के तत्त्व

बुद्धि की शक्तियों का विकास होना ही बौद्धिक विकास माना जाता है। किन्तु क्या करने से इन शक्तियों का विकास होता है, यह जानना अभी शेष है। अतः यहाँ हम विकास के तत्त्वों को जानेंगे।

अभ्यास

बुद्धि की विभिन्न शक्तियों को अभ्यास करने का पर्याप्त अवसर मिलने से उनका विकास होता है। विद्यालय में भाषा, गणित, विज्ञान, तथा तर्कशास्त्र आदि विषय बुद्धि विकास के लिए अत्यधिक उपयोगी हैं। इन विषयों का अध्ययन करने से बुद्धि का विकास होता है और विकसित बुद्धि की सहायता से ये विषय भली-भांति समझ में आते हैं। अतः प्राथमिक कक्षाओं में ये विषय ज्ञान प्राप्ति के लिए न पढ़ाकर बुद्धि विकास के लिए पढ़ाने चाहिए।

अध्ययन पद्धति

आज की अध्ययन पद्धति में केवल पढ़ना-लिखना और रटना होता है। केवल पढ़ने-लिखने और रटने से बुद्धि विकास नहीं होता। इस पद्धति में बुद्धि की अधिकांश शक्तियों को अवसर ही नहीं मिलता। इसके स्थान पर क्रिया आधारित व अनुभव आधारित अध्ययन पद्धति होने से ज्ञानार्जन के करणों का विकास होता है। बालक स्वयं करके सीखता है, परिणाम स्वरूप उसे रटना नहीं पड़ता।

जिज्ञासा

जिज्ञासा अर्थात् जानने की इच्छा, ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा। जिस बालक में ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा नहीं है, वह ज्ञान प्राप्त ही नहीं करेगा। ज्ञान प्राप्त न करने से बुद्धि की शक्तियां काम में ही नहीं आयेगी, उनका विकास तो आकाश कुसुम हो जायेगा। यह जिज्ञासा अनेक बार विकारों के आवरण में दबी रहती है, उस दबी हुई जिज्ञासा को अनावृत करने से बुद्धि स्वत: ज्ञान प्राप्ति में लग जाती है।

मन को साधना

बुद्धि एक है किन्तु उसके लिए दो शब्दों का प्रयोग होता है, सद्बुद्धि और दुर्बुद्धि। वास्तव में बुद्धि स्वयं तो ज्ञान की शक्ति है, वह दुर्बुद्धि या दुष्टबुद्धि तब होती है जब वह मन के अधीन होती है और मन को अपने वश में नहीं कर पाती। यदि मन को साधा नहीं गया है तो मन जो विचार बुद्धि के समक्ष प्रस्तुत करता है, उस पर मन का पसन्द – ना पसन्द, राग-द्वेष या अच्छा-बुरा का रंग चढ़ा होता है। तब बुद्धि के द्वारा किए गए निर्णय गलत हो जाते हैं, और बुद्धि दुश्चक्र में फंस जाती है। बुद्धि दुश्चक्र में न फंसे, वह दुर्बुद्धि न कहलाए इसके लिए मन को साधना आवश्यक हो जाता है।

श्रद्धा और सेवा

बुद्धि विकास में श्रद्धा और सेवा का विशेष महत्व है। ज्ञान के प्रति श्रद्धा, गुरु के प्रति श्रद्धा होने से तथा गुरु की सेवा करने से बुद्धि विकसित होती है।

श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है- श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:। अर्थात् श्रद्धा, तत्परता और इन्द्रिय संयम होने से ही ज्ञान प्राप्त होता है।

सेवा के सम्बन्ध में गीता कहती है – तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। अर्थात् विनयशीलता, जिज्ञासा और सेवा करने से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

इसका अर्थ यह है कि मनोमय कोश के सम्यक विकास पर विज्ञान मय कोश का विकास निर्भर है।

अन्न मय कोश में सभी जड पदार्थ रहते हैं। प्राणमय कोश में सभी प्राणी रहते हैं। मनो मय कोश में सभी प्राकृत मानव रहते हैं। मनो मय कोश का विकास करके विज्ञान मय कोश की ओर बढ़ना ही सही अर्थ में मनुष्य बनना है। यह अन्न के आनन्द से, इन्द्रिय सुख के आनन्द से, मानसिक आनन्द से ऊपर उठकर ज्ञान के आनन्द की ओर विकसित होने की दिशा है।

मैं बुद्धि नहीं हूँ

जब हम बुद्धि के साथ तादात्म्य कर लेते हैं, तब हम विज्ञान मय कोश में जी रहे होते हैं। बुद्धि के विकास को ही जीवन का विकास मानकर चलते हैं। बुद्धि जीवी बनना ही जीवन का लक्ष्य बना लेते हैं। अपनी बौद्धिक संपदा को बढ़ाने में ही जीवन खपा देते हैं। और यह समझने लगते हैं कि मैं बुद्धि हूँ। किन्तु मैं तो बुद्धि नहीं हूँ , फिर आप ही बताइए कि मैं कौन हैं? मैं कौन हूँ? यह जानने के लिए आप भी भृगु के समान तप करिए।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

और पढ़ें : भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-30 (मनोमय कोश का विकास)

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