शिशु शिक्षा – 2 (वर्तमान अवधारणा एवं भारतीय अवधारणा)


– नम्रता दत्त

जगद्गुरु शंकराचार्य जी ने शिक्षा के संदर्भ में कहा – ‘सा विद्या या विमुक्तये’।

‘शिक्ष’ धातु से उत्पन्न शिक्षा का अर्थ है सीखना। अतः वास्तव में शिक्षा जन्म से मृत्यु तक चलने वाली सतत् प्रक्रिया है। सीखने का अर्थ कोई पठन लेखन से नहीं है। सीखना तो जीवन व्यवहार के लिए है। अनपढ़ व्यक्ति विश्व विख्यात नहीं होता या वह भूखों मरता है, ऐसा भी नहीं है। अनपढ़ कबीर दास जी के दोहों पर आज शिक्षित जन पी.एच.डी. करते हैं। परन्तु वर्तमान समय में यह सब निरर्थक लगता है क्योंकि वर्तमान समय में शिक्षा का सम्बन्ध जीवन मूल्यों से नहीं रहा। जीवन मूल्य बताने का सही समय शैशवास्था (0 से 5 वर्ष) ही है। यही शिशु शिक्षा की भी अवस्था मानी गई है। इसका केन्द्र भी ‘घर’ माना गया है क्योंकि इस समय शिशु को विकास के लिए प्रेम, सौहार्द, संस्कारक्षम और आनन्दमयी वातावरण की आवश्यकता होती है। शिशु का विकास स्वतंत्र एवं अनौपचारिक वातावरण में ही सम्भव है।

वर्तमान समय में शिशु शिक्षा का केन्द्र सामान्यतः ‘पूर्व प्राथमिक विद्यालय’ को ही माना जाता है और विद्यालय में प्रवेश की आयु की तो बात ही मत पूछिए क्योंकि माता पिता जल्दी से जल्दी बच्चे के पालन पोषण की जिम्मेवारी से मुक्त होना चाहते हैं। इसका कारण है – औद्योगिकरण, भोग विलासिता का जीवन, आर्थिक नियोजन माता का नौकरी करना, एकल परिवार, माता-पिता में मातृत्व-पितृत्व एवं धैर्यता की कमी आदि…।

इन सब परिस्थितियों का लाभ लेने के लिए आज गली मौहल्लों से लेकर वर्ल्ड स्कूल तक नजर आएंगे अर्थात् परिस्थितियों ने शिक्षा को व्यवसाय बना दिया है। बहुत से माता-पिता दोनों को केवल इसलिए कमाने निकलना पड़ता है कि अब बच्चों की पढाई बहुत महंगी हो गई है।

यहां तक भी सब ठीक है परन्तु प्रश्न यह उठता है कि क्या हम वास्तव में अपने बच्चों को सार्थक शिक्षा दे रहे हैं? उनका चरित्र निर्माण हो रहा है? क्या शैक्षिक संस्थान मानव निर्माण/व्यक्तित्व निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध हैं? क्या वे अपना पेट भर रहे हैं और आने वाली पीढ़ी को भी मात्र पेट भरने की राह पर ले जा रहे हैं? क्या शिक्षा ‘सा विद्या या विमुक्तये’ को सार्थक कर रही है?

शिशु शिक्षा को ही नींव की शिक्षा कहा जाता है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने तो इसे सीखने की नींव कहा है। शिक्षा सतत् चलने वाली प्रक्रिया है। यह खण्ड खण्ड में नहीं हो सकती। जो बीज धरती में बोया जाएगा भविष्य में वह वैसा ही फल देगा।

वर्तमान में ‘पूर्व प्राथमिक शिक्षा’ के नाम पर जो शैक्षिक पद्धतियां चल रही हैं वे अधिकांशतः विदेशी हैं – नर्सरी – (इंग्लैंड), मांटेसरी – (इटली), किण्डर गार्टन – (जर्मन), बालवाङी एवं आंगनवाङी आदि। सबका अर्थ लगभग शिशुओं के बागीचे से है जहां शिशु हंसता, गाता, खेलता अपना विकास करता है।

उपरोक्त सभी पद्धतियां अनौपचारिक रूप से खेल खेल में शिशु का संज्ञानात्मक, भावनात्मक, सृजनात्मक एवं मौखिक भाषा का विकास करती है। इन पद्धतियों में कहीं भी गणित अथवा भाषा के पढ़ने और लिखने की बात नहीं हो रही है। परन्तु भारत ने इन पद्धतियों को केवल नाम से तो अपनाया लेकिन उसके अन्तर्निहित शिशु मनोविज्ञान को नहीं समझा।

शिशु मनोविज्ञान के अनुसार यह अवस्था शिशु की ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों मे समन्वय की अवस्था है। यह चरित्र निर्माण की अवस्था है। शिशु अपने भावी जीवन में कैसा मनुष्य बनेगा, उसके 89 प्रतिशत संस्कार शिशु इसी अवस्था में ग्रहण कर लेता है। ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श के माध्यम से ग्रहण की हुई अनुभूतियों से उसके चित्त पर जो छाप पड़ती है वह उसका जीवन पर्यन्त का संस्कार बना देती है।

वर्तमान समय में अज्ञानतावश हम इस स्वर्णिम काल को औपचारिक शिक्षा (पढ़ना और लिखना) देने में व्यर्थ गंवा रहे हैं। शिशु शिक्षा का आधार शिशु मनोविज्ञान होना चाहिए। संक्षेप में हम इसे निम्न प्रकार से समझ सकते है –

शिशु शिक्षा की वर्तमान अवधारणा

  1. शिशु शिक्षा का अभिप्राय औपचारिक शिक्षा अर्थात् पठन लेखन से है जो कि तीन वर्ष से प्रारम्भ होता है।
  2. अभिभावक एवं शिक्षक शिशु मनोविज्ञान के प्रति उदासीन हैं। जिसके कारण शिशु का विकास क्या, क्यों और कैसे होना है यह जानते और समझते ही नहीं हैं।
  3. शिक्षा का केन्द्र विद्यालय और गुरू विद्यालय का आचार्य होता है। विकास का माध्यम औपचारिक शिक्षा है।
  4. शिशु के विकास की चिन्ता कम की जाती है। उसकी क्षमताओं के विपरीत पठन एवं लेखन के माध्यम से सीखाने का प्रयास किया जाता है।
  5. शिशु भविष्य में कैसा इंसान बनेगा, यह विचार न करके वह क्या डॉक्टर, वकील, इंजीनियर बनेगा, इसकी चिन्ता अधिक करते हैं परिणाम स्वरुप उसकी क्षमताओं के विपरीत केवल कोरा शाब्दिक ज्ञान ठूंसने का प्रयास है।
  6. अंग्रेजी भाषा का बोल बाला है।
  7. शिशु को भाषा सीखाने के सोपान एकदम विपरीत हैं। भाषा को लेखन से सीखाना प्रारम्भ किया जाता है ।
  8. शिशु के विकास के क्रम को जाने और समझे बगैर उस पर औपचारिक शिक्षा का बोझ लाद देते हैं। जबकि शरीर के अंगों पर नियंत्रण के अभाव में लेखन कराना उसकी क्षमताओं के विपरीत है।
  9. बुद्धि विकसित होने से पूर्व ही बौद्धिक कार्य कराने से शिशु को शिक्षा के प्रति अरूचि होने लगती है।
  10. शिशु को विद्यालय में प्रवेश ही इस सबके आधार पर मिलता है तो इसके बाद तो… भय की यह तलवार उसके विकास में बाधक बनती है।
  11. शिक्षा का उद्देशय – मात्र जीविकोपार्जन।

शिशु शिक्षा की भारतीय अवधारणा

  1. शिशु शिक्षा अर्थात् सीखना, शून्य से प्रारम्भ होता हैं। जब दम्पति माता पिता बनने का विचार करते हैं।
  2. शिशु मनोविज्ञान के अनुसार – लालयेत् पंचवर्षाणि। पांच वर्ष की आयु तक शिशु को प्रेम और स्नेह से लालन पालन करना चाहिए।
  3. शिक्षा का केन्द्र, घर और गुरू माता होती है। विकास का माध्यम अनौपचारिक शिक्षा है।
  4. शिशु को शिक्षा की नही विकास की आवश्यकता होती है और यह समग्र विकास स्वतंत्र वातावरण में विभिन्न क्रियाकलापों/गतिविधियों के माध्यम से ही सम्भव है।
  5. मनोवैज्ञानिकों के अनुसार 0 से 05 वर्ष की आयु संस्कारों के निर्माण के लिए उपयोगी है। इसी आयु में चरित्र निर्माण होता है। 89 प्रतिशत संस्कार शिशु इसी अवस्था में ग्रहण करता है।
  6. सीखाने का माध्यम – मातृभाषा।
  7. शिशु के भाषा सीखने के सोपान हैं – 1.सुनना, 2.बोलना 3. पढ़ना 4. लिखना।
  8. यह कालखण्ड शिशु की अभिवृद्धि (शरीर के अंगो का बढ़ना) और विकास (शरीर के अंगों पर नियंत्रण, भाषा, सामाजिकता एवं संज्ञानात्मक) का कालखण्ड है।
  9. शिशु मनोविज्ञान के अनुसार बुद्धि 6 वर्ष में विकसित होती है। अतः सीखाने का कार्य खेल खेल में ही कराना चाहिए।
  10. अभिवृद्धि और विकास की अवस्था होने के कारण इस अवस्था में किसी प्रकार की परीक्षा, प्रतियोगिता अथवा मूल्यांकन नहीं होता।
  11. शिक्षा का उद्देशय – सा विद्या या विमुक्तये।

जैसी शिक्षा, वैसे नागरिक, वैसा देश। तो विचार करें – हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी। आओ विचारें बैठकर ये समस्याएं सभी।

इस श्रृंखला के अगले सोपान में हम जीवन विकास की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया पर विचार एवं चिन्तन करेंगे ।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)

यह भी पढ़ें : शिशु शिक्षा – 1 (राष्ट्र, शिक्षा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति)

Facebook Comments