संकीर्तन संजीवनी से समाज को चेतन करने वाले : श्री चैतन्य महाप्रभु

 – गोपाल महेश्वरी

“चैतन्य देव का ज्ञान सौर-ज्ञान था, ज्ञानसूर्य का प्रकाश था और उनके भीतर भक्तिचन्द्र की शीतल किरणें भी थी। ब्रह्मज्ञान और भक्ति प्रेम दोनों ही थे।” महान संत श्री रामकृष्ण देव जी के ये विचार चैतन्य महाप्रभु के विरत व्यक्तित्व का परिचय कराने में समर्थ हैं। जब श्री चैतन्य महाप्रभु का भरतभूमि पर अवतरण हुआ तो इतिहास की दृष्टि से यह काल सामाजिक-राजनीतिक अस्तव्यस्ता से  व्याप्त था। बारहवीं शताब्दी के आसपास के कालखंड में भारत की पावन देवभूमि को विधर्मियों ने पदाक्रांत कर रखा था। भारतीय इन अत्याचारों से इतने त्रस्त हो चुके थे कि पराभूत मानसिकता उनका स्वभाव बनने लगी थी। कुछ न कर पाने का भाव, उन्हें दैन्य व पलायन के गर्त में धकेलता जा रहा था। यह दैन्य भाव उन भारतीयों को सहज ही प्रभुभक्ति की ओर खींच चला। भक्तिमार्ग पर उनको मार्गदर्शन व प्रेरणा देने इसी समय (बाहरवीं सदी) में आए श्री रामानुजाचार्य, अनन्तर श्री वल्लभाचार्य, श्री रामानंद जैसे भक्तिपंथ के प्रकाण्ड आचार्य। बंगभूमि भी जयदेव के गीत गोविन्दम्, विद्यापति की मैथिली में रचित ‘पदावली’ और चंडीदास के कृष्ण कीर्तन’ की भाव-औषधि से अपने छिन्न-भिन्न मानस को स्वस्थ बनाने में निमग्न हुई। सामान्य हिन्दू जन राजनीतिक और सामरिक स्तर पर सोया हुआ था और अपनी मुक्ति की आशा छोड़ रहा था, पर श्री कृष्ण की भक्ति का रस उसे परतन्त्रता के भीषण दाह से बचाने में सफल हो रहा था। भौतिक रूप से पराधीन होने पर भी भारतीय समाज भावरूप से श्री कृष्ण शरणागति में एक प्रकार की  मुक्तता अनुभव करने लगा।

सामाजिक समरसता और सामाजिक जागरण के पुरोधा श्री चैतन्य महाप्रभु का जन्म बंगाल के नवद्वीप नामक स्थान पर सन् 1486 के फरवरी मास में हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा के दिन हुआ था। माँ शची देवी सद्धर्मपरायण गृहणी थी। उल्लेख है कि चैतन्य का जन्म समय चन्द्रग्रहण का समय था। माता-पिता दोनों के पूर्वज असम प्रांत के सिलहट के मूल-निवासी थे,  नवद्वीप की विद्या-वैभव विभूषित पावनता उन्हें सिलहट से नवद्वीप खींच लायी थी। नवजात चैतन्य का जन्म ‘विश्वम्भर’ रखा गया। वे परिवार में सबसे छोटे थे। बड़े भाई विश्वरूप ने अद्वैत-संन्यास पथ को अंगीकृत किया था, शेष सभी सहोदर अकाल ही काल कवलित हो गए थे। अत: परिवार के लाड-प्यार का एकमेव केंद्र विश्वम्भर ही थे। घर में स्नेह का नाम पड़ा ‘निमाई’। अंत्यंत गौरा रंग, सुदर्शन देह देखकर लोग सहज ही इन्हें गौर या गौरांग कह कर पुकारते थे। ये ही गौरांग आगे चल कर संन्यासी होने पर ‘श्रीकृष्ण चैतन्य’ कहलाए पर शीघ्र ही जन सामान्य में ‘चैतन्य महाप्रभु’ नाम से विख्यात हो गए।

यह जानना आश्चर्यकारी हो सकता कि वे बाल्यवस्था से ही संन्यासियों जैसे वीतरागी न थे, अपितु शैशव और बाल्यावस्था के अनन्तर जब वे विद्यार्थी होने की वय को प्राप्त हुए तब उनके माता-पिता ने सोचा कि कहीं विद्या पाकर यह पुत्र भी बड़े भाई की तरह  विरागी न हो जाए, इसीलिए  उन्हें घर पर ही पढ़ाने का प्रबंध किया। इस काल में इस अत्यंत सुंदर, चपल बालक की बाल-लीलाएं, पास-पडौसियों को भी बहुत लुभाती थी लेकिन यह क्रम सदैव नहीं चल सकता था। प्रारम्भिक शिक्षा दो पंडितों से पाकर व्याकरण आदि पढ़ने के लिए उन्हें गंगादास की प्रवर संस्कृति पाठशाला का विद्यार्थी होना ही पड़ा। वे अपने परिवार की परम्परानुकूल आवश्यक शिक्षा ग्रहण कर ही रहे थे कि पिता के परलोक गमन से गृहस्थी का भार निमाई के कंधों पर आ गया। नगर की ही बल्लभ आचार्य की सुशीला पुत्री लक्ष्मी से पाणिग्रहण कर वे अपनी संस्कृत पाठशाला चलाने लगे। यद्यपि वे किसी को हानि नहीं करते पर विद्या का दर्प उनके स्वभाव से झलकता था तथापि उनकी पाठशाला ने खूब प्रतिष्ठा प्राप्त की। पाठशाला और गृहस्थी संचालन हेतु एक बार जब वे दक्षिणा एवं दान संग्रहण हेतु पूर्वी बंगाल की यात्रा पर थे तभी उनकी पत्नी का देहावसान हो गया। युवा मन अंतर तक आहत हुआ। शोक ने सारा उत्साह लील लिया। माँ ने गुपचुप उनके दूसरे विवाह की योजना की, जिसका पता उन्हें विवाह वाले दिन ही चला। मन न होने पर भी मातृआज्ञा से विवश निमाई ने पं० सनातन मिश्र की तनुजा ‘विष्णुप्रिया’ से विवाह किया परन्तु दोनों लम्बे समय तक साथ नहीं रह सके।

निमाई जब अपने पिता का श्राद्ध करने गए तब वहां उनकी भेंट संन्यासी ईश्वर पुरी से हुई। यही भेंट उनके जीवन की पथपरिवर्तिनी सिद्ध हुई। यह परिवर्तन अत्यंत रहस्यपूर्ण है जिसका उल्लेख आते ही श्री चैतन्य भावमूर्च्छा में चले जाते थे। गुरु से ‘दशाक्षर कृष्णमंत्र’ मिला। अब न उनमें विद्या का गर्व रहा न स्वभाव में यौवनोचित चंचलता। खान-पान, राग-रंग में उनकी आसक्ति पूरी तरह से नष्ट हो गई। किसी कोठरी में घन्टों एकांत में कृष्णनामोच्चारण करना, रोना, पुकारना, मूर्छित हो जाना,  साधारण जन तो समझने लगे कि ये पागल हो गए हैं। पाठशाला में पाठ पढ़ाते तो व्याकरण या अलंकार शास्त्र के स्थान पर स्वत: ही कृष्णचरित उच्चरित होने लगता। साधारण विद्यार्थी इसे क्या समझते? फलन: एक दिन पाठशाला बंद हो गयी।

यहीं से उस भक्ति पन्थ का आरम्भ हुआ जिसे हम नववैष्णव पंथ कहते हैं। कर्मकांडों एवं विद्वत सभाओं के तर्क-जंजालों से मुक्त, जाति बंधनों से रहित, केवल भगवान उच्चारण, अनन्य प्रेममय भक्ति, कोई आशा नहीं, अपेक्षा नहीं, याचना नहीं, स्वार्थ नहीं, अनुष्ठान नहीं, खण्डन-मण्डन नहीं केवल प्रभु से प्रेम, अहेतु प्रेम और उसके इसी प्रेम में देहाभास तक खो जाने तक भाव-विह्लता, यही उनका परमात्मा की प्राप्ति का भक्तिमार्ग था। उनका यह प्रयोग केवल भक्तिभावना तक सीमित और व्यक्तिगत मुक्ति का प्रयोग न रहा, बल्कि अपने समय का सशक्त सामाजिक भक्ति-आंदोलन बना। इसका अनुमान इसी बात से किया जा सकता है कि उनकी संकीर्तन यात्राओं में लाखों की संख्या समाज के  शिक्षित और विद्वान ही नहीं बल्कि कृषक, श्रमिक, व्यापारी आदि प्रत्येक वर्ग के लोग श्रद्धा, विनम्रता और सहजता से स्वत: ही इससे जुड़ते चले गए। सारा विश्रृंखलित समाज एकत्र होने लगा। भक्ति में कोई भेदभाव नहीं का मंत्र निराश हो चुके समाज में नव चेतना का मंत्र फूंकने लगा।

नवद्वीप के काजी ने सडकों पर कीर्तन-गायन को प्रतिबंधित कर दिया। परतन्त्रता के दु:खाभ्यासी हो चले समाज में इस सामाजिक परिवर्तन को रेखांकित करना आवश्यक है कि श्री चैतन्य के संकेत पर संध्या होते ही सैंकड़ों मशालें लिए महासंकीर्तन यात्रा आरम्भ हो गई। यात्रा जिस भी मार्ग से गुजरती, निर्भीक हो चुके नगरवासियों के जत्थे के जत्थे उसमें जुड़ते चले जाते। अपार जनसमूह के सामने काजी डर गया और क़ानूनी कार्यवाही करने की बजाये स्वयं स्वागत अनुरोध लेकर प्रस्तुत हुआ। यह अहिंसक क्रांति ऐसी परिणामकारी हुई कि नवद्वीप में गोहत्या का निषेध स्वयं अब चैतन्य के भक्त हो चुके काजी ने किया।   श्री रामस्वरूप शर्मा ने लिखा, “महाप्रभु की भक्ति का भारत के पूर्वी भाग के क्षेत्रों में इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि हिन्दू और मुस्लमान सभी वर्गों के लोग उनके अनुयायी बनने लगे। तत्कालीन शासक हुसैन शाह के दो अधीनस्थ प्रमुख अधिकारियों सकर मलिक और दबीर खास तो ऐसे शरणागत हुए कि महाप्रभु से दीक्षित संन्यासी होकर सनातन गोस्वामी और रूप गोस्वामी नाम से विख्यात संत बन पाए”।

गया से लौटकर कुछ ही समय बाद उन्होंने संन्यास लेकर ‘श्री कृष्ण चैतन्य’ नाम धारण किया । नवयुवा (22 वर्षीय) पुत्र के संन्यासी होने की घटना से माँ शची देवी व पत्नी विष्णुप्रिया की दशा बहुत ह्रदय-विदारक हो चली थी। श्री चैतन्य संन्यासी होकर वृन्दावन जाना चाहते थे पर माँ के आग्रह पर जगन्नाथ धाम (पुरी उड़ीसा) चले गए। यहाँ उन्होंने लगभग बारह वर्ष का समय बिताया जो कि उनकी भक्ति का चरमोत्कर्ष काल सिद्ध हुआ। इसी समय समाज में वह परिवर्तन आया कि भगवान मठों, मन्दिरों, विद्वानों, पण्डों एवं पुजारियों के घेरे को तोड़कर सर्वसामान्य समाज में सर्वसामान्य पथों पर अवतरित हुए। जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव में समस्त जाति- पाति के भेद भूलकर हजारों भक्त ‘हरिबोल’ का उच्चारण करके सम्मिलित होने लगे।

सन 1515 से 1533 तक 18 वर्ष तक वे पुरी में ही रहे। उनका जीवन चरित्र भारतीय समाज में भक्ति-संजीवनी से नई ऊर्जा फूंक गया। 48 वर्ष की आयु में वे 1533 में परमस्वरूप में चिरलीन हुए। श्री चैतन्य महाप्रभु निराशा के अन्धकार में आत्मग्लानि भोग रहे समाज में संकीर्तन की साधन रहित, सहज, सरल, सुलभ संजीवनी से जो नव-चैतन्य फूंक गए वह सदियों बाद भी समाज में जाग्रत है। सामाजिक समरसता के महान आचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु को शत-शत नमन।

(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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