भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-30 (मनोमय कोश का विकास)

 – वासुदेव प्रजापति

मनो ब्रह्मेति व्यजानात्

आपके ध्यान में आया होगा कि एक ही कथा निरन्तर चल रही है। पुत्र भृगु अपने पिता वरुण के पास जाकर ब्रह्म ज्ञान का उपदेश करने का निवेदन करता है। पिता वरुण जो उसके गुरु भी हैं, वे पुत्र एवं शिष्य भृगु को सीधा ब्रह्मज्ञान न बतलाकर उसे ब्रह्म को जानने का मार्ग बतलाते हैं। वे कहते हैं कि ब्रह्म को जानना है तो तप करो।

भृगु पिता के बताए मार्ग पर चलते हैं, अर्थात् तप करते हैं। तप करके जानते हैं कि अन्न ही ब्रह्म है और जाकर अपना निश्चय पिता को बतलाते हैं। पिता उसे पुनः तप करने का कहते हैं। भृगु पुनः तप करके जानते हैं कि प्राण ही ब्रह्म है, और जाकर पिता को अपना निश्चय सुनाते हैं। पिता पुत्र का निश्चय सुनकर सोचता है कि मेरा पुत्र स्थूल से सूक्ष्म की ओर तो बढ़ा है, किन्तु अभी उसे और तप करने की आवश्यकता है। इसलिए वरुण उसे ब्रह्म का उपदेश न देकर पुनः तप करने का कहते हैं।

भृगु पिता की आज्ञा मानकर तप करने में लग जाते हैं। पहले से अधिक तप करके जानते हैं कि मनो ब्रह्मेति व्यजानात् अर्थात् मन ही ब्रह्म है। उन्होंने सोचा, पिताजी के बताए हुए ब्रह्म के सारे लक्षण मन में पाये जाते हैं। मन से सब प्राणी उत्पन्न होते हैं। स्त्री और पुरुष के मानसिक प्रेमपूर्ण सम्बन्ध से ही प्राणी बीज रूप से माता के गर्भ में आकर उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर मन से ही इन्द्रियों द्वारा समस्त जीवनोपयोगी वस्तुओं का उपभोग करके जीवित रहते हैं और मरने के बाद मन में ही प्रविष्ट हो जाते हैं। मरने के बाद इस शरीर में प्राण और इन्द्रियां नहीं रहती, इसलिए मन ही ब्रह्म है।

इस प्रकार निश्चय करके भृगु पुनः पहले की भांति अपने पिता वरुण के पास गए और उन्होंने अपने अनुभव की बात पिताजी को सुनाई कि मन ही ब्रह्म है। इस बार भी पिता से कोई उत्तर नहीं मिला। पिता से अपनी बात का उत्तर न पाकर भृगु ने पुनः प्रार्थना की – भगवन! यदि मैंने ठीक न समझा हो तो कृपया आप ही मुझे ब्रह्म का तत्त्व समझाइये। तब वरुण ने पुनः वही उत्तर दिया – तू तप के द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा कर। ब्रह्म को जानने का इससे बढ़कर दूसरा कोई उपाय नहीं है। इस प्रकार पिता की आज्ञा पाकर भृगु पुनः संयम पूर्वक तप में लीन हो गया।

मनोमय कोश का अर्थ

मनोमय कोश अर्थात् हमारा मन। मन कौन है? मन पांच कर्मेंद्रियों और पांच ज्ञानेन्द्रियों को वश में रखने वाला और उन्हें काम में प्रवृत्त करने वाला है। मन कर्मेंद्रिय भी है और ज्ञानेन्द्रिय भी है। कर्मेंद्रिय के रूप में मन का सम्बन्ध प्राण व शरीर के साथ है और ज्ञानेन्द्रिय के रूप में मन का सम्बन्ध बुद्धि के साथ है। कठोपनिषद में शरीर की उपमा रथ से दी गई है और मन को घोड़ों की लगाम बताया गया है –

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च।।

अर्थात् यह शरीर एक रथ है। उस रथ में रथ का स्वामी(जीवात्मा)बैठा हुआ है। इस रथ का सारथी बुद्धि है और मन लगाम है।

इसमें मन की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। वह इन्द्रिय रूपी घोड़ों के लगाम लगाकर उस लगाम को सारथी रूपी बुद्धि के हाथों में सौंप देता है। इस प्रकार मन इन्द्रियों का स्वामी है।

मन प्राणों से सूक्ष्म है

इन्द्रियाँ स्थूल हैं, उनका एक निश्चित आकार है। प्राण इन्द्रियों से सूक्ष्म हैं, किन्तु प्राणों को आने-जाने के लिए वायु का आलम्बन चाहिए। जबकि मन प्राण से भी सूक्ष्म है, उसे आने-जाने के लिए किसी आलम्बन की आवश्यकता नहीं होती। मनोविज्ञानी यह मानते हैं कि मन एक सैकण्ड में तीन सौ स्थानों पर, विपरीत दिशाओं में आ-जा सकता है। मन की गति इतनी सूक्ष्म है।

मन चंचल है

मन स्वभाव से चंचल है, अनेकाग्र है और गतिमान है। वह कभी एक स्थान पर टिककर नहीं रहता। एक छोटे बालक की तरह कभी इधर तो कभी उधर भागता ही रहता है। ऐसे मन को एकाग्र करने से अकल्पनीय शक्ति सम्पादित होती है। जब मन एकाग्र होता है तभी बुद्धि किसी विषय का सम्यक ज्ञान प्राप्त कर सकती है। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है कि यदि मुझे पुनर्जन्म मिला तो मैं सब काम छोड़कर केवल मन को एकाग्र करने का अभ्यास ही करूंगा। मन एकाग्र हो जाने पर अध्ययन करना अति सुगम हो जायेगा। एकाग्रता से तात्पर्य है मन का किसी एक विषय पर लगे रहना। मन की यह एकाग्रता अभ्यास से आती है।

मनोमय कोश का विकास

मन शान्त होता है: सामान्यतया मन अशान्त रहता है, उत्तेजना ग्रस्त रहता है। भय से आशंकित हो तनाव ग्रस्त रहता है। भय, शोक, चिन्ता आदि मन के ही विकार हैं। मन की उत्तेजना से बुद्धि की धारणा शक्ति कमजोर हो जाती है। इस बात को समझने के लिए यह उदाहरण उपयुक्त है। किसी पात्र में हम पानी लें, उसे कुछ समय तक पड़ा रहने दें। जब पानी स्थिर हो जाय तब उसमें अपना प्रतिबिंब देखें, हमें अपना प्रतिबिंब ठीक वैसा ही दिखाई देगा जैसे हम हैं। अब उस पानी को हिला दें और उसमें अपना प्रतिबिंब देखें। हमारा प्रतिबिंब भी हिलता-डुलता दिखाई देगा। अब पानी से भरे उस पात्र को गैस पर चढ़ा दें, थोड़ी ही देर में पानी उबलने लगेगा। उस उबलते पानी में हम अपना प्रतिबिंब देखेंगे तो हमें अपना प्रतिबिंब दिखाई नहीं देगा। क्यों? क्योंकि पानी उबल रहा है। ठीक यही स्थिति मन की है, जब मन क्रोधाग्नि में उबलने लगता है तो ज्ञानार्जन नहीं हो पाता। इसलिए मन का शान्त रहना आवश्यक है। मन की शांति से प्रसन्नता, धैर्य, सुख और ज्ञान मिलता है।

मन अनासक्त भी होता है

मन का एक स्वभाव है,आसक्त होना। आसक्त होने का अभिप्राय है मन को कोई वस्तु भा जाना। मन को जब कोई वस्तु अच्छी लगती है तो वह उससे चिपक जाता है। उसे किसी भी परिस्थिति में छोड़ने को तैयार नहीं होता। बलात छुड़ाया जाता है तो मन दुखी हो जाता है। यही मन का आसक्त होना है। यह आसक्त मन अनासक्त भी होता है। मन की इस आसक्ति को धीरे-धीरे कम करते जाना ही मन का विकास है।

मन में द्वन्द्व चलता है

मन का स्थाई भाव द्विधात्मक है, अर्थात् मन में द्वन्द्वात्मकता है। कैसा द्विधा भाव? संकल्प-विकल्प का, राग-द्वेष का, हर्ष-शोक का, सुख-दुख का, रुचि-अरुचि का द्विधा भाव है। मन में इन दोनों युग्मों के मध्य सदैव द्वन्द्व चलता रहता है। इसलिए कहा जाता है कि मन द्वन्द्वात्मक है। मन को कभी यह चाहिए तो कभी वह चाहिए। मन कभी एक निश्चय पर नहीं पहुँच पाता। मन की द्वन्द्वात्मकता को मिटाकर उसे निश्चयात्मक बनाना ही मन का विकास है।

मन में विकार भी हैं

मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर जैसे विकार भी हैं। इन विकारों के कारण वह अनाचार करने के लिए प्रेरित होता है। इन विकारों को विद्वान हमारे रिपु मानते हैं। इसलिए इन रिपुओं से हमें सदैव मुक्त रहना चाहिए। अर्थात् मन को विकारों से मुक्त करना, मन का विकास कहलाता है।

मन को सद्गुणी वह सदाचारी बनाना

मन में जैसे विकार हैं वैसे ही सद्गुण व सदाचार भी हैं। मन में दया, करुणा, स्नेह, मैत्री, कृतज्ञता, अनुकंपा, विनयशीलता, श्रमनिष्ठा आदि हैं। मन को इन गुणों से युक्त करना और उसे सेवा, त्याग, दान, परोपकार जैसे सदाचारों में प्रवृत्त करना ही मन का विकास है।

मन को बुद्धि के वश में करना

मन जैसे इन्द्रियों को चलाता है, वैसे ही वह बुद्धि को भी प्रभावित करता है। श्रीमद्भगवद्गीता में मन की अवस्था व कार्यपद्धति के बारे में बहुत सटीक वर्णन मिलता है –

ध्यायतो विषयान्पुंस: संगस्तेषुपजायते। संगात्संजायते काम: कामात्क्रोधोभिजायते।।

क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम:। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धि नाशो बुद्धि नाशात्प्रणश्यति।।

अर्थात् मन जब विषयों में लगा रहता है, तब आसक्ति निर्माण होती है। आसक्ति से काम जाग्रत होता है। कामना पूर्ति न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध से सम्मोह होता है। सम्मोह से स्मृति का भ्रंश होता है और स्मृति भ्रंश से बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि का नाश होने से हमारा नाश हो जाता है। यदि मन विषयों में न लगा रहे तो ऐसा कुछ भी नहीं होगा। अर्थात् मन ही सभी समस्याओं की जड़ है। जब हम मन को संयमित कर उसे बुद्धि के वश में कर लेते हैं तो मन स्वैच्छाचारी नहीं होता, जैसा बुद्धि उसे करने के लिए कहती है, वैसा ही करता है। तब मन की मर्जी से होने वाली समस्याएँ नहीं होती। अतः मन का विकास अत्यावश्यक है।

मनोमय कोश के विकास के तत्त्व

अभी हमने जाना कि मन को शांत करना, एकाग्र करना, अनासक्त करना, द्वन्द्वों को समाप्त करना, विकारों से मुक्त करना तथा मन को बुद्धि के वश में करना ही मन का विकास करना है। मन के विकास का तात्पर्य तो समझ में आ गया, किन्तु विकास क्या करने से होता है? यह अभी भी स्पष्ट नहीं है। आओ! इसे भी जानें। मन का विकास इन तत्त्वों से होता है। ये तत्त्व हैं – योगाभ्यास, संगीत, आहार, सत्संग और स्वध्याय तथा सेवाकार्य।

योगाभ्यास

मन का निग्रह करते हुए उसका विकास करने में महर्षि पतंजलि का अष्टांग योग सर्वथा समर्थ उपाय है। केवल भारत में ही नहीं संपूर्ण विश्व में मनोमय कोश का विकास करने के लिए योगाभ्यास अनिवार्य तत्त्व है। योगविद्या भारत की अमूल्य संपदा है, जिसे विश्व के अनेक राष्ट्र अपनाने लगे हैं। व्यक्ति के प्रत्येक आचार-विचार के साथ, व्यवस्था और वातावरण के साथ, शिक्षा और शिक्षा पद्धति के साथ योगदृष्टि जोड़ने से मन का विकास होता है।

संगीत

योग के समान ही संगीत भी मन के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। व्यक्ति के चेतातंत्र पर, वृत्तियों पर, भावों पर संगीत का गहरा प्रभाव पड़ता है। भारत में भारतीय संगीत का विकास केवल मनोरंजन के लिए नहीं अपितु मन का विकास करने के हेतु से किया गया है।आज के पाश्चात्य संगीत से जहाँ उत्तेजना और कामुकता बढ़ती है, वहीं भारतीय संगीत से मन शांत होता है। अतः घर में और विद्यालय में संगीतमय वातावरण की निर्मिति करने से मन विकसित होता है।

आहार

आहार जहाँ शरीर व प्राण को पुष्ट करता है, वहीं मन को भी सुसंस्कृत बनाता है। हमारी कहावत भी यही आशय प्रकट करती है। जैसा खाए अन्न वैसा बने मन। भोजन बनाने वाले के विचारों व भावनाओं का प्रभाव भोजन करने वाले के मन पर होता है। प्रेमपूर्ण हाथों से बना हुआ सात्त्विक भोजन, खाने वाले के मन को संस्कारित करता है। शुद्ध एवं सात्त्विक आहार से सत्त्व बढ़ता है, सत्त्व बढ़ने से स्मृति अटल रहती है और ऐसी अटल स्मृति प्राप्त होने से मन की सारी गांठे खुल जाती हैं।

आहार शुद्धो सत्त्व: शुद्धि, सत्त्व:शुद्धि ध्रुवास्मृति:। स्मृति लब्ध्वा सर्व ग्रंथिनाम् विप्रमोक्ष:।।

अतः मन का विकास करना है तो आहार को शुद्ध व सात्त्विक बनाओ।

सत्संग और स्वाध्याय

सज्जनों का संग करने से मन शुद्ध व शांत होता है। इसी प्रकार सद्ग्रन्थों को पढ़ना स्वाध्याय कहलाता है। नियमित स्वाध्याय से अनिद्रा का नाश होता है। मन का विकास करने में इनका योगदान भी महत्वपूर्ण है।

सेवा कार्य

नियमित और निरपेक्ष भाव से सेवा करने और आनन्द से सेवा करने से मन शुद्ध होता है। गुरु सेवा, माता-पिता की सेवा, वृद्ध सेवा, रुग्ण सेवा, दरिद्र सेवा, अतिथि सेवा, वृक्ष सेवा, प्राणी सेवा आदि विविध प्रकार के सेवा कार्य करके हम अपने मन को निर्मल बना सकते हैं। मनोमय कोश के विकास से एक ओर अन्नमय कोश के विकास में सहायता मिलती है, वहीं विज्ञानमय कोश तथा आनन्दमय कोश के विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। अतः प्राथमिक शिक्षा में मनोमय विकास ही साध्य होना चाहिए।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

और पढ़ें : भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-29 (प्राणमय कोश का विकास)

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