बच्चों के लिए शाला का चयन

 – दिलीप वसंत बेतकेकर

“प्रवेश प्रारम्भ! सीमित स्थान! प्रथम आने वाले को प्रथम प्रवेश! आज ही अपना नाम पंजीकृत कराएं!” किसी व्यवसाय या कम्पनी से सम्बन्धित विज्ञापन होगा ऐसा लगा न आपको?

तो आपका अनुमान गलत है। अब इस प्रकार के विज्ञापन फलक बड़े पैमाने पर केवल शहरों में ही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिखाई देते हैं। समाचार पत्रों द्वारा विज्ञापन, प्रचार सामग्री का वितरण, सड़क किनारों पर गली के कोने पर बैनर्स दिखने लगे हैं। बच्चे कॉलेज के बाहर उच्च शिक्षा के लिये आने लगे हैं। हजारों बच्चे नये स्कूल-कॉलेजों में प्रवेश लेने के उत्सुक हैं। पालकगण अपनी ‘कल्पनाओं की अच्छी शाला’ की खोज में निकले हुए हैं। पालकों को आकर्षित करने वाले, रंग-बिरंगे, आश्वस्त करने वाले, विज्ञापन शान से झलक रहे हैं। इसीलिये शाला का चयन करने के लिये शांतिपूर्ण विचारपूर्वक आने वाले विज्ञापनों के झांसे में न आते हुए, उचित निर्णय लें।

शाला का चयन करते समय किन बातों का विचार करना चाहिये? कौन सी जुगाड़ करनी है? इसका विचार करना आवश्यक है। मुख्यतः पूर्व प्राथमिक, उच्चतर माध्यमिक और महाविद्यालयों के चयन में यह उपयुक्त होंगे।

घर से शाला की दूरी – यथासंभव शाला घर से अधिक दूरी पर न हो। स्पर्धा, इज्जत, प्रतिष्ठा हेतु अनेक पालकगण बच्चों को घर से बहुत दूर स्थित तथाकथित प्रतिष्ठित शाला में भेजना पसन्द करते हैं। दूरी के कारण घर से जल्दी बाहर निकलना पड़ता है। नींद ठीक से नहीं हो पाती। नित्यकर्म, नाश्ता आदि जल्दबाजी में करना पड़ता है। इन सब बातों का परिणाम दिनचर्या पर होता है। साइकिल, बाइक, रिक्शा, बस आदि वाहनों से शाला जाते हुए बच्चे सो जाते हैं। ‘अच्छी’ (?) शाला में तो पहुंचे। अब आगे क्या? वहां कक्षा में बैठे-बैठे नींद की झपकी लेते हैं। थकान के कारण उत्साह कम हो जाता है। ताज़गी समाप्त हो जाती है। अध्ययन तो ऐसे में क्या और कैसा होगा?

कक्षा में बच्चों की संख्या – जिस शाला में हम बच्चों को भेजने वाले हैं वहां की कक्षाओं में बालकों की संख्या कितनी है, यह पहले जान लेना उचित होगा। आजकल अच्छी आय के उद्देश्य से अनेक लोग, गली-गली में, घर पर भी, के.जी., नर्सरी, प्ले स्कूल आदि आकर्षक अंग्रेज़ी नामकरण वाले स्कूल चला रहे हैं।

कुछ बड़ी शालाएं भी ‘बालवाड़ी’ अर्थात् अच्छी आय का साधन और आगे की कक्षाओं में मिलने वाली अच्छी शिशु संख्या, इस उद्देश्य से इस ओर अग्रसर हो रही है। कक्षा में बच्चों की संख्या अधिक रहने से शिक्षक ठीक से ध्यान नहीं दे पाते। विशेषकर बालवाड़ी में तो संख्या मर्यादित होना आवश्यक है। एक छोटे से कमरे में चालीस तक बच्चे बैठे मिलते हैं। बेचारी शिक्षिका इतने सारे बच्चों के “सर्वांगीण विकास” की ओर कैसे ध्यान दे पायेगी?

माध्यम – पालकों की एक बैठक में एक महिला अपनी आप बीती और व्यथा बता रही थीं। उनकी स्वयं की शिक्षा कॉन्व्हेंट में हुई थी। अपने बड़े बेटे को भी उन्होंने अंग्रेज़ी माध्यम की शाला में प्रवेश दिलाया। अब धीरे-धीरे उन्हें अनेक बातें ध्यान में आने लगीं। गलत निर्णय का अनुभव हुआ। अब पुत्र के बारे में ऐसा निर्णय दोहराना उचित नहीं समझा। छोटी बेटी को मातृभाषा माध्यम की शिशु वाटिका में प्रवेश दिलाया। उस बच्ची का व्यवहार, बोलना आदि अंग्रेज़ी शाला में अध्ययन करने वाले बालक से भिन्न होने का ‘ध्यान’ आया।

दुनिया के सभी शिक्षाविदों के अनुसार बच्चों की मातृभाषा सर्वप्रथम पक्की होना आवश्यक है, किन्तु आजकल पालकों को यह बात जंचती नहीं। हालांकि अभी भी कुछ पालक ऐसे हैं जो समझाने से, विचार करने पर, उचित निर्णय लेते हैं। संख्या में ऐसे पालक कम ही होंगे। मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा होने पर उनकी नींव मजबूत होती है और उस मजबूत नींव के ऊपर कितना भी बड़ा भवन निर्मित किया जा सकता है।

केवल लिखना-पढ़ना पर्याप्त नहीं – प्रायः देखने में आता है कि शिक्षा का अर्थ केवल लिखना, पढ़ना, गृहकार्य और परीक्षा उत्तीर्ण करना है, ऐसी बहुसंख्यक पालकों की धारणा है! इसी कारण मासूम बालकों पर पढ़ाई के नाम पर शारीरिक और मानसिक अत्याचार हो रहे हैं – ‘नर्सरी’ नहीं, वह ‘कर्सरी’ बन रही है। पालकों के दबाव के कारण बेचारी शिक्षिकाओं को भी लिखाने-पढ़ाने पर ही अधिक जोर देना पड़ता है। लिखना-पढ़ना तो शिक्षा का एक छोटा सा अंश है। शिक्षा तो अत्यंत व्यापक है, केवल लिखना-पढ़ना आने मात्र से शिक्षा नहीं हो जाती! इस पर किसका ध्यान है? शिक्षा को किनारे रखकर होती है केवल रटाई। अपने बालक को हम जिस शाला में भेज रहे हैं उसमें इनमें से क्या कर रहे हैं यह जानने का प्रयास हमें करना चाहिए।

समर्पित और प्रशिक्षित शिक्षक – शिक्षा के विविध घटकों में सबसे महत्वपूर्ण है ‘शिक्षक’! यह घटक अत्यंत प्रभावी होता है। हम बच्चे को जिस शाला में भेज रहे हैं वहां के शिक्षकों की प्रवृत्ति किस प्रकार की है? पूर्व प्रारम्भिक और प्राथमिक स्तर पर शिक्षकों की मनोवृत्ति का ही दीर्घकालीन प्रभाव बच्चों की शिक्षा पर पड़ने वाला है। आचार्य विनोबा भावे कहते थे – “अध्यापन करना मातृधर्म पालन करने वालों का ही व्यवसाय है”। अनेक बालवाड़ियों में प्रशिक्षित शिक्षिकाओं का अभाव दिखता है। प्राथमिक स्तर पर शिक्षकगण प्रशिक्षित होते हैं परन्तु उतना पर्याप्त नहीं! शिक्षक-शिक्षिकाओं के निरंतर प्रशिक्षण की व्यवस्था शाला द्वारा की जा रही है अथवा नहीं, इसकी जानकारी पालक अवश्य रखें।

व्यवस्थापन/प्रबंधन समिति – प्रबंधन समिति की वैचारिकता एवं दृष्टि के आधार पर अनेक निर्णय लिये जाते हैं। प्रबंधन समिति कैसी है? सदस्यगण शैक्षणिक दृष्टि रखने वाले, चिंतन करने वाले हैं अथवा केवल लब्ध प्रतिष्ठित और धनाढ्य, इस पर अनेक बातें निर्भर करती हैं। एक संस्था द्वारा अपना स्वर्ण जयंती महोत्सव मनाया गया। वर्ष भर अनेक कार्यक्रमों का आयोजन होता रहा। इनमें शैक्षणिक स्वरूप के कार्यक्रम कितने थे? लाखों रुपये खर्च हुए। परन्तु किस कारण? किसके लिये? किस प्रकार? संगीत के कार्यक्रम पर ही एक लाख खर्च हुए ऐसी जानकारी प्राप्त हुई। एक ओर तो शाला में अनेक आवश्यक वस्तुओं का अभाव और दूसरी ओर अनावश्यक कार्यक्रमों पर लाखों रुपयों का खर्च!

प्रबंधन समिति के सदस्यों की गुणवत्ता, शैक्षणिक दृष्टिकोण आदि बातों का अपने पाल्य पर जाने-अनजाने, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ने वाला है। वह अच्छा प्रभाव होना आवश्यक है।

दान-राशि – आवश्यकतानुसार पालकों द्वारा भी हर संभव सभी प्रकार की सहायता शाला के लिये करनी चाहिये। कभी आर्थिक सहायता भी आवश्यक हो जाती है। परन्तु वह स्वेच्छा से और रचनात्मक कार्यों के लिए देनी चाहिये। सम्पूर्ण व्यवहार पारदर्शी रहे! पालकों द्वारा दी गई राशि का किस प्रकार उपयोग हुआ यह ज्ञात होना चाहिये। इसका अर्थ यह नहीं कि हम शाला के लिये कभी भी सहायता नहीं करेंगे। हमारे बच्चों के लिये शाला द्वारा बहुत कुछ करना चाहिये ऐसी अपेक्षा करना भी उचित नहीं।

पालकों का सहभाग – कुछ शालाएं पालकों को विद्यालय परिसर में प्रवेश की अनुमति नहीं देती। परिसर से बाहर, फाटक के पास ही उन्हें रुकना पड़ता है, सुरक्षा की दृष्टि से! भीड़, हंगामा आदि टालने हेतु कुछ नियम आवश्यक हैं, व्यवस्थाएं आवश्यक हैं। परन्तु पालकों के साथ असभ्य व्यवहार, उन्हें तुच्छ मानना, पालकों के साथ शत्रु सैन्य जैसा व्यवहार, उन्हें विश्वास में न लेना, सहभागी न होने देना, ऐसे व्यवहार भिन्न-भिन्न शालाओं में देखने को मिलते हैं।

पालक बहुत बड़ी शक्ति है। यदि शाला चाहे तो इस शक्ति का शाला विकास के लिये अच्छा उपयोग किया जा सकता है। पालकों के पास भी अनेक गुण, कल्पना, योजनाएं होती हैं। कुछ पालकों को शाला की सहायता करना अच्छा लगता है। सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि बच्चों की शिक्षा केवल शाला और शिक्षकों के द्वारा ही नहीं होती, अपितु घर ही है प्रथम शाला! माता-पिता बच्चे के गुरु होते हैं। अपने विचारों को, सुझावों को, अभिमत को शाला कोई महत्व देती है क्या? इस बात का विचार भी पालकों को करना चाहिये।

शिक्षा अथवा सुखासीनता – एक चित्रा देखा था- बालवाड़ी में जाता बालक! सुंदर जूते, आकर्षक गणवेश, पीछे माँ चलती हुई, अपनी पीठ पर बच्चे का बड़ा सा शाला बैग टांगे हुए, बाएं हाथ में टिफिन, पानी की बोतल, दाहिने हाथ में छाता और छाता बच्चे के सिर से ऊपर उठाए हुए और ये बालक महाराज-‘छत्रपति’- शाला की ओर चल रहे हैं! बड़ा जीवन्त चित्र था! अपने बचपन में अनेक वस्तुएं प्राप्त नहीं हुई इसलिये अब बच्चे को उन वस्तुओं का अभाव न रहे, इस धारणा से उसे प्रत्येक वस्तु उपलब्ध कराना चाहिये ऐसी आपराधिक मानसिकता! साथ ही अपने बच्चे को धन सम्पन्न, साधन सम्पन्न, चमक-दमक युक्त शाला में भेजने की दयनीय छटपटाहट! शाला में सभी प्रकार की सुविधाएँ, व्यवस्थाएं हों ऐसी अपेक्षाएं, इसमें दो मत होने का कारण ही नहीं! सादगी अर्थात् दरिद्रता, ऐसा समझने का भी कारण नहीं! परन्तु केवल भव्य-दिव्य इमारत और चमचमाता शाला परिसर होगा तभी शिक्षा अच्छी मिलेगी, ऐसी कल्पना करना गलत नहीं क्या?

हमने अपने बालक के लिये जिस शाला का चयन किया है वह अच्छी शिक्षा प्रदान करने वाली है अथवा केवल ‘भौतिक सुख’ युक्त है, ये देखना आवश्यक होगा।

शाला का लक्ष्य, दर्शन और विचारदृष्टि – जिस शाला में अपने बालक को भेजने का चयन किया है उसका लक्ष्य, दर्शन और वैचारिक दृष्टिकोण कैसे हैं, ये देखना पालक का कर्तव्य है। किसी शाला की मेहनत ‘परीक्षार्थी’ तैयार करने के लिये ही हो, तो उत्तम परीक्षार्थी अर्थात् उत्तम अंक प्राप्त करने वाले अवश्य मिलेंगे परन्तु वह वास्तव में उत्तम ‘विद्यार्थी’ होगा ही, ऐसा विश्वास नहीं कर सकते। तज्ञ, अनुभवी, यशस्वी लोग यही कहते हैं कि केवल परीक्षा के अंकों पर ही जीवन में सुयश प्राप्ति निर्भर नहीं करती। वह अच्छा ‘विद्यार्थी’ होगा तभी जीवन में सफलता प्राप्त करेगा। ऐसे ‘विद्यार्थी’ तैयार करने हेतु शाला में योजनाएं, प्रयास चल रहे हैं क्या, ये मुख्य प्रश्न है।

यह सब जानकर प्रश्न उठता है कि क्या ऐसी शालाएं कहीं अस्तित्व में हैं? दूरबीन से ही ऐसी शाला खोजनी पड़ेगी। इनमें से संपूर्ण नहीं फिरर भी अधिक से अधिक बातों की पूर्णता करने का प्रयास करने वाली शाला तो होगी ही अथवा भविष्य में इस बारे में विचार करने वाली शाला होगी। पालकों को इस सम्बन्ध में विचार करना उचित होगा!

(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)

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