शीतल पेय से दूर रहो, स्वस्थ रहो

 – दिलीप वसंत बेतकेकर

सर्दी का मौसम समाप्त होकर जब गर्मी का मौसम शुरू हो रहा होता है, शीतल पेय दिखते ही मन ललचाता है और साथ ही विज्ञापन की भरमार! इसी कारण शीतल पेयों की बिक्री में बाढ़ सी आती है।

ये शीतल पेय स्वास्थ्य के लिये कितने लाभदायी अथवा हानिकारक हैं, इसका विचार करने के लिये किसी को कहां फुरसत है? दिखी ठंडी बोतल और लगाई मुंह से! इस लेख में इन शीतल पेयों के बारे में कुछ जानें।

1772 ई॰ में जोसेपफ प्रिस्टेल ने कार्बन डाईऑक्साइड को पानी में मिलाकर बुलबुलेयुक्त पानी की निर्मिति की। ऊर्जा और मिठास लाने हेतु मीठे फलों के रस में यह पानी मिलाने लगे। बोतल में भरा ऐसा पेय शुद्ध और साफ पद्धति से न भरा होने से जल्दी ही खराब हो जाता था। सन् 1889 में हल निकाला गया। आज इसी का संशोधित रूप एरिएटेड वॉटर के रूप में प्रचलित हुआ। एरिएटेड वॉटर इंडस्ट्रीज आज तीव्र गति से विकसित हो रही है।

अमेरिका में पानी की अपेक्षा शीतल पेयों का उपयोग अधिक करते हैं। अपने देश में भी अब इसका प्रचलन बढ़ रहा है। भारत की जनसंख्या वृद्धि के कारण दुनिया के विविध उत्पादन कर्ताओं की व्यापारिक दृष्टि से नज़र भारत पर अधिक है। पैसा प्राप्त करने हेतु किसी भी उत्पाद का आकर्षक विज्ञापन बनाकर तथा अभिनेताओं द्वारा प्रदर्शित होने के कारण अपने देश के लोगों के गले आसानी से उतर जाती है।

शीतल पेयों के उत्पादन खर्च और बिक्री कीमत में बहुत अधिक अंतर है। परन्तु ये रंगीन मीठा जल लोग अत्यंत गर्व से अत्यधिक पैसे खर्च कर गले में उतार देते हैं। “बच्चों को एक कप दूध पिलाओ” कहने पर “दूध के लिए इतना पैसा नहीं है” कहने वाले लोग भी शीतल पेय सहजता से खरीद लेते हैं। यात्रा के दौरान साथ में पानी ले जाना भी आजकल लोगों को रास नहीं आता। इसकी अपेक्षा वे अपने साथ पेप्सी, कोका कोला, स्पाइस आदि शीतल पेयों की बोतलें अथवा कैन्स रखना पसंद करते हैं। प्रतिष्ठा, स्टेटस की झूठी कल्पनाओं के कारण ही वे ये सब करते हैं। इस हेतु कितना पैसा नष्ट होता है अथवा उससे भी मूल्यवान स्वास्थ्य नष्ट होता है, यह सोचने के लिये उनके पास समय ही कहाँ है?

शीतल पेयों में 120 से 180 किलो कैलोरीज़ शुगर (शर्करा) के कारण होती है। पोषक द्रव्यों का अभाव रहता है। इसलिये उन्हें रिक्त कैलोरीज़ कहते हैं। शीतपेयों को अधिक ग्रहण करने से शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है। शकर की कैलोरीज़ रक्त प्रवाह में जाकर शकर के परिमाण में वृद्धि हो जाती है।

तज्ञ लोगों के मतानुसार स्वास्थ्य के लिए हानिकारक घटकों में शीतपेयों का स्थान विशेष ही है। शीतपेयों का प्रचलन अधिक होने के कारण लोगों में मधुमेह, मोटापा आदि में वृद्धि देखने में आ रही है। इसके लिये शीतल पेयों का उपयोग एक महत्वपूर्ण कारण है, ऐसा “अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रिव्हेंटिव्ह मेडीसिन” ने लिखा है।

कॉफी की अपेक्षा शीतल पेयों का अधिक उपयोग करने की आदत के कारण महिलाओं में उच्च रक्तचाप बढ़ सकता है, ऐसा बोस्टन के कुछ शोधकर्ताओं द्वारा कहा गया है। शीत पेय और रक्तचाप वृद्धि का सम्बन्ध आज तक कभी समक्ष नहीं आया था इसलिए ऐसे निष्कर्ष पर आश्चर्य हुआ।

शोधकर्ताओं द्वारा नर्सिंग पाठ्यक्रम में अध्ययनरत 1,55,494 महिलाओं के स्वास्थ्य की जांच की गई। 1990 से 12 वर्ष तक चले इस शोधकार्य की अवधि में 33077 महिलाएं उच्च रक्तदाब पीड़ित पाई गईं। इन महिलाओं में कॉफी पीने की आदत नहीं थी। इसलिये उनके आहार विषयक आदतों का विश्लेषण किया गया। इस परीक्षण में पाया गया कि उनमें कोला वर्ग के पेय अधिक परिमाण में पीये जाते थे।

इस शोध से कॉफी प्रेमी वर्ग को राहत मिली, किन्तु शीतल पेय और उच्च रक्तदाब के सम्बन्ध में अधिक स्पष्टता लाने हेतु अधिक शोध करना आवश्यक माना गया।

हृदय विकार का खतरा बढ़ाने वाली आधुनिक जीवन शैली के कारण निर्मित होने वाले विविध लक्षणों के समुच्चय को ‘मेटॉबोलिक सिंड्रोम’ कहते हैं। शीतल पेय और मेटॉबोलिक सिंड्रोम में आपसी सम्बन्ध शीतपेयों में शर्करा के अतिरिक्त परिमाण के कारण होता है, ऐसा निष्कर्ष शोध में सहभाग करने वाले पचास वर्ष आयु के स्त्री-पुरुषों के स्वास्थ्य के परीक्षण द्वारा किया। इस शोधकार्य द्वारा ऐसा विदित हुआ कि प्रतिदिन एक अथवा अधिक शीतपेयों का सेवन करने वालों में मेटॉबोलिक सिंड्रोम परिमाण अन्य की अपेक्षा 44 से 48 प्रतिशत अधिक था। इसी प्रकार मेटॉबोलिक सिंड्रोम के अंतर्गत आने वाले प्रत्येक स्वतंत्र लक्षण के परिमाण भी शीतपेयों के कारण वृद्धिगत होते दिखाई दिये अर्थात् इसका कारण शीतपेयों के सेवन तथा आहार विषयक आदतों से सम्बद्ध होगा, ऐसा वैज्ञानिकों का मत था। किन्तु इससे पूर्व के परीक्षणों का पुनः परीक्षण करने के उपरान्त इस विषय को अंततः पूर्णत्व दिया गया।

शर्करायुक्त शीतपेयों के कारण शरीर का पोषण बाधित होता है। इसके विपरीत शरीर के मोटापे में वृद्धि होती है और साथ ही मधुमेह के खतरे में भी, ऐसा अमेरिका के ‘येल विद्यापीठ’ के वैज्ञानिकों द्वारा प्रतिपादित किया गया। बच्चों में बढ़ते हुए मधुमेह की समस्या को दृष्टिगत रखते हुए यह निष्कर्ष अधिक महत्वपूर्ण माने गये हैं। सोडा युक्त अर्थात् कार्बोनेटेड शीतपेयों को शर्करा पर्यायी अन्नपदार्थों के कारण शरीर में चरबी युक्त भोजन की मांग बढ़ती है। शीतपेयों के बढ़ते सेवन, दूध, फल, तंतुयुक्त (फाइबर) सब्जियां, कैलशियम और अन्य पोषक द्रव्यों के सेवन से विपरीत अनुपात में होते हैं। इस कारण शाला-कॉलेज में भी शीतपेयों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की आवश्यकता है, इस प्रकार का प्रतिपादन इन वैज्ञानिकों द्वारा ‘अमेरिकन जर्नल ऑफ पब्लिक हेल्थ’ की शोध पत्रिका में किया गया है।

स्वास्थ्य के लिये हानिकारक शीतपेयों का उपयोग अत्यंत तीव्र गति से बढ़ रहा है। परिमाण इतना बढ़ गया है कि मोटापा और मधुमेह के लिये ये एक महत्वपूर्ण कारण बन गया है। ऐसा विचार ‘अमेरिकन जर्नल ऑफ प्रिव्हेंटिव्ह मेडीसिन’ द्वारा व्यक्त किया गया है।

अमेरिका के येल विद्यापीठ के वैज्ञानिकों ने शीतल पेयों द्वारा स्वास्थ्य पर होने वाले परिणाम के संदर्भ में कुल 88 परीक्षणों में 91000 महिलाओं के स्वास्थ्य के संदर्भ में आठ वर्ष में एकत्र की गई जानकारी के विश्लेषण किये। निष्कर्ष के अनुसार प्रतिदिन एक अथवा अधिक शीतलपेय के बोतल सेवन करने वाली महिलाओं में मधुमेह का खतरा अधिक रहता है। ‘कैलोरी फ्री’ जैसा विज्ञापन किये जाने वाले कार्बोनेटेड शीतपेयों से भी मध्यवयीन नागरिकों में मेटॉबोलिक सिंड्रोम निर्मित होने सम्बन्धी मत बोस्टन विद्यापीठ द्वारा व्यक्त किया गया है।

कोला जैसे शीतपेयों के कारण हड्डियाँ कमजोर हो जाती हैं ये बात ध्यान में आयी है। शोधकर्ताओं द्वारा सिद्ध किया गया है कि जो बच्चे मीठा शीतपेय पीते हैं उनके दाँतों में रिक्तता (कैविटी) होने की संभावना शीतपेय न पीने वाले बच्चों की अपेक्षा अधिक होती है। इस संदर्भ में सौ॰ सीमा, जो विद्या भारती की एक प्रयोगशील शिक्षिका हैं, के प्रयोग और अनुभव मार्गदर्शक हैं। सीमा जी फोंडा तालुका के उंडीर गांव में शिक्षिका का कार्य करती थी। एक दिन शाला में एक बालक ‘मेरा दांत गिर गया है’ ये कहने शिक्षिका के पास आया। सीमा दीदी ने इस घटना का सहारा लेकर बच्चों को एक सीख देने का विचार किया। उन्होंने उस दांत को बाहर फेंका नहीं। बाजार से एक ‘पेप्सी’ की बोतल मंगवाई और एक ग्लास में ‘पेप्सी’ को उंडेलकर उस दांत को उस ग्लास में डाला। अब उस दांत का निरीक्षण करने के लिए बच्चों को कहा। दूसरे दिन बच्चों ने उस ग्लास में देखा तो वह दांत थोड़ा छोटा हुआ दिखाई दिया। तीसरे दिन और अधिक छोटा हुआ। इस प्रयोग से सिद्ध हुआ की शीतपेय दांतों के लिए अत्यंत घातक होते हैं। बच्चों को भी ये बात अच्छी तरह से समझ में आ गई!

जिन महिलाओं को अपनी हड्डियां मजबूत रखनी हों, वे कोला पेयों से दूर ही रहें, ऐसा मत अमेरिकी के विद्यापीठ के वैज्ञानिकों द्वारा 2500 प्रौढ़ों के स्वास्थ्य परीक्षण करने पर व्यक्त किया गया। जो महिलाएं प्रतिदिन कोला पेय पीती हैं उनके हड्डियों की क्षार घनता बोन मिनरल डेन्सिटी – ‘बी॰एम॰डी॰’ अर्थात् हड्डियों के क्षार का प्रमाण (कैलशियम आदि) महीने में एक आध बार ही पीने वाली महिलाओं की अपेक्षा कम होती है। अर्थात् उनकी हड्डियां जरा सी चोट से भुरभुरी बन जाने वाली होती हैं। इसका सम्बन्ध सीधा अस्थिभंग होने के खतरे से है। कोला पेय लोकप्रिय होने से ये जानकारी जन स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रौढ़ावस्था प्रारंभ होने वाली महिलाओं में अस्थिभंग और बी॰एम॰डी॰ की कमी इस आयुवर्ग की महिलाओं में कोला की लोकप्रियता के कारण बताई जाती है। किन्तु यह परिणाम आहार में दूध के घटता परिमाण के कारण है अथवा पेय के हानिकारक प्रभाव के कारण, इसका उत्तर उन वैज्ञानिकों के पास नहीं था। इसलिये उन प्रौढ़ों में ऐसे परिणाम दृष्टिगोचर होते हैं अथवा नहीं, इसके लिए गहन परीक्षण किये। इस हेतु उन्होंने 1413 महिलाओं और 1125 पुरुषों को प्रयोगार्थ चयन किया। उनके बी॰एम॰डी॰ का मापन किया। उनमें जिन महिलाओं का कोला का सेवन अधिक था, उनका बी॰एम॰डी॰ मापन किया। परीक्षण में पाया गया कि अधिक कोला पेय सेवन करने वाली महिलाओं का बी॰एम॰डी॰ विशेष रूप से कम था।

(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)

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