राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रतिबिम्बित स्कूल शिक्षा के मानक

 – डॉ. रवीन्द्र नाथ तिवारी

भारतीय समाज में आदर्श विद्यालय और शिक्षण संस्थान की अवधारणा हमेशा से ही विद्यमान रही है। प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति में, गुरुकुल शिक्षा एवं शोध के प्रमुख केन्द्र थे जो शास्त्र एवं शस्त्र दोनों की शिक्षा प्रदान करते थे। कालान्तर में शिक्षा राज्याश्रित होने के कारण अपने मूल उद्देश्य से भटक गई। वर्तमान में प्रचलित आधुनिक शिक्षा व्यवस्था (कान्वेंट शिक्षा पद्धति) को मैकाले द्वारा लागू करते समय यह कहा गया था कि “अंग्रेजी शिक्षा पद्धति द्वारा भारतीय केवल भारतीय नाम का रहेगा, शरीर से ही भारवासी होगा, किन्तु मन, विचार, वचन एवं आचरण से वह पूरा अंग्रेज होगा अर्थात् इन कान्वेन्ट विद्यालयों से ऐसे विद्यार्थी निकलेंगे जो देखने में तो भारतीय होंगे लेकिन दिमाग से अंग्रेज होंगे। इन्हें अपने देश, संस्कृति एवं परम्पराओं के बारे में कुछ ज्ञात नहीं होगा”। वास्तव में मैकाले की शिक्षा पद्धति ने भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक व्यवस्था के तानेबाने को काफी हद तक प्रभावित किया है। यह सत्य है कि वर्तमान में प्रचलित शिक्षा व्यवस्था से मूल्यपरक एवं संस्कारयुक्त शिक्षा में कमी आई है।

भारत में आजादी के पश्चात् उच्च शिक्षा संस्थानों में समय-समय पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हेतु मानक निर्धारित करने के प्रयास किये गये जो वर्तमान व्यवस्था में भी नैक (राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद्) के रूप में विद्यमान है। निश्चित रूप से इससे उच्च शिक्षा में गुणात्मक सुधार हुआ है तथा संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा नैक ग्रेडिंग के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। स्कूल शिक्षा में इस प्रकार के प्रयास कम ही दिखायी पड़ते हैं। विद्यालयों में निरीक्षण एवं पर्यवेक्षण को ही मूल्यांकन मान लिया जाता रहा है तथा इस हेतु कोई निश्चित मापदण्ड निर्धारित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में कुछ राज्यों द्वारा प्रचलित मूल्यांकन प्रक्रिया के स्थान पर विद्यालय मूल्यांकन कार्यक्रम का प्रारूप विकसित कर लागू करने का प्रयास किया गया है। गुजरात, कर्नाटक, उड़ीसा, मध्य प्रदेश इत्यादि राज्यों ने विद्यालय आकलन तथा प्रत्यायन के माध्यम से प्रारम्भिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए सकारात्मक प्रयास किए हैं जिसके लिए आकलन तथा मानिटरिंग उपकरण का विकास किया गया है। इन राज्यों ने विद्यालय गुणवत्ता के अपने सूचक एवं प्रक्रियायें विकसित की हैं। प्रकृति में भिन्नता होते हुए भी ये प्रयास सूचक हैं तथा विशेष रूप से प्राथमिक स्तर के विद्यालयों की गुणवत्ता एवं विद्यार्थियों के स्तर में सुधार के लिए विद्यालय के आकलन की स्वीकारोक्ति बढ़ी है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली में समस्त शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक शिक्षा के प्रावधान की निगरानी के लिए सिर्फ शिक्षा विभाग है। इस केंद्रीकृत व्यवस्था से शिक्षा के प्रावधानों का अकुशल प्रबंधन एवं अन्य योजनाओं का इच्छित दिशा से भटकाव की समस्या सामने आयी हैं। यह व्यवस्था शिक्षा के व्यवसायीकरण तथा निजी स्कूल द्वारा अभिभावकों पर पड़ रहे अनुचित आर्थिक दबाव को रोक पाने में भी असफल रही है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में स्कूल के मानक निर्धारण और विनियमन के लिए कई सिफारिशें की गई हैं। स्कूल शिक्षा विभाग को केवल सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा देने तक सीमित किया गया है। यह प्रावधानों और विनियमन संबंधी कार्यों को नहीं करेगा तथा सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली के निरंतर सुधार के लिए समग्र निगरानी अैर नीति निर्धारण का कार्य करेगा। संपूर्ण राज्य के सार्वजनिक विद्यालयी प्रणाली के सेवा प्रावधान और शैक्षिक संचालन की जिम्मेदारी स्कूल शिक्षा निदेशालय की होगी जो शैक्षिक संचालन और प्रावधान से संबंधित नीतियों को लागू करने का काम स्वतंत्र रूप से करेगा। निजी, सार्वजनिक और परोपकारी-सहित आवश्यक गुणवत्ता मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए शिक्षा के सभी चरणों के लिए एक प्रभावी गुणवत्ता विनियमन अथवा मान्यता प्रणाली स्थापित की जाएगी। यह सुनिश्चित करने के लिए कि सभी स्कूल कुछ न्यूनतम व्यावसायिक और गुणवत्तापूर्ण मानकों का पालन करते हैं, राज्य/केंद्र शासित प्रदेश, राज्य विद्यालय मानक प्राधिकरण (एसएसएसए) की स्थापना करेंगे। राज्य विद्यालय मानक प्राधिकरण (एसएसएसए) कुछ बुनियादी मानकों (जैसे बचाव, सुरक्षा, आधारभूत ढांचा, कक्षाओं और विषयों के आधार पर शिक्षकों की संख्या, वित्तीय इमानदारी, और शासन की उपयुक्त प्रक्रिया) पर न्यूनतम मानकों की स्थापना करेगा, जिसका पालन सभी स्कूलों द्वारा करना होगा। राज्य शैक्षिक अनुसंधान परिषद् (एससीईआरटी) शिक्षकों और स्कूलों से परामर्श कर राज्यों के मापदण्ड तैयार करेगा।

सार्वजनिक निगरानी और जवाबदेही के लिए राज्य विद्यालय मानक प्राधिकरण (एसएसएसए) द्वारा निर्धारित सभी बुनियादी विनियामक सूचनाओं का पारदर्शी सार्वजनिक स्व-प्रकटीकरण का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाएगा। प्रकटीकरण का प्रारूप एसएसएसए द्वारा स्कूलों के लिए मानक-तय करने की दुनिया भर में किये जा रहे बेहतरीन प्रयासों के अनुसार तय किया जाएगा। यह जानकारी सभी स्कूलों द्वारा अपडेट की जाएगी और उनकी वेवसाइट पर उपलब्ध रहेगी। सार्वजनिक डोमेन में उठायी गयी अथवा फिर सार्वजनिक जीवन से जुड़े हितधारकों या अन्य लोगों की किसी भी शिकायत को एसएसएसए द्वारा हल करने की कोशिश की जायेगी। एक नियमित अंतराल पर, कुछ चयनित छात्रों से ऑनलाइन फीडबैक मंगाए जाएंगे जिससे एसएसएसए के सभी कार्यों में दक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयुक्त रूप से प्रयास किया जा सके।

राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एससीईआरटी) राज्य में अकादमिक मानकों और पाठ्यक्रम सहित शैक्षणिक मामले हेतु एक स्कूल क्वालिटी असेसमेंट एंड एक्रिडिटेशन फ्रेमवर्क (एसक्यूएएएफ) तैयार करेगा। क्लस्टर संसाधन केन्द्र (सीआरसी,), ब्लाक संसाधन केन्द्र (बीआरसी) और जिला शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) जैसे संस्थानों को पुनर्जीवित करने के लिए एससीईआरटी एक परिवर्तन प्रबंधन प्रक्रिया के तहत कार्य करेगा, जो कि 3 वर्षों के अन्दर निश्चित रूप से इनकी क्षमताओं और कार्य-संस्कृति को बदल कर इन्हें उत्कृष्ट संस्थान के रूप में स्थापित करेगा। सार्वजनिक और निजी स्कूल का मूल्यांकन और प्रमाणन समान मापदंड, बेंचमार्कों और प्रक्रियाओं के आधार पर किया जाएगा। निजी स्कूलों को प्रोत्साहित कर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए निजी परोपकारी प्रयासों को प्रोत्साहित किया जाएगा जिससे शिक्षा सभी को मुहैया हो सके तथा माता-पिता और समुदायों को ट्यूशन फीस में मनमानी वृद्धि से सुरक्षित करने के प्रयास भी किये जायेंगे। स्कूल की वेबसाइट और एसएसएसए वेबसाइट पर – सार्वजनिक और निजी दोनों स्कूलों की सूचनाओं को सार्वजनिक किया जाएगा-जिसमें कक्षाओं, छात्रों/छात्राओं और शिक्षकों की संख्या की जानकारी, पढ़ाए जाने वाले विषय, शुल्क, और नेशनल एचीवमेन्ट सर्वे (एनएएस) और स्टेट एचीवमेन्ट सर्वे (एसएएस) जैसे मानकीकृत मूल्यांकन के आधार पर विद्यार्थियों के समग्र परिणाम शामिल किये जाएँगे। सीबीएसई केंद्र सरकार द्वारा नियंत्रित/प्रबंधित/सहायता प्राप्त स्कूलों के लिए, मानव संसाधन विकास मंत्रालय के परामर्श से एक फ्रेमवर्क तैयार करेगा।

स्कूल विनियमन, प्रमाणन और प्रशासन के लिए तय मानक/विनियामक ढाँचे और सुगम प्रणाली की समीक्षा की जाएगी ताकि पिछले दशक में प्राप्त की गई सीख और अनुभवों के आधार पर सुधार किया जा सके। इस समीक्षा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी छात्र, विशेष रूप से सुविधाओं से वंचित तबकों के छात्रों को उच्चतर-गुणवत्ता और समतापूर्ण स्कूली शिक्षा आरंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (3 वर्ष की आयु) से लेकर उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (अर्थात, ग्रेड 12 तक) निःशुल्क और अनिवार्य हो। इसके साथ ही स्कूल की भौतिक आवश्यकता जैसे कमरों के आकार और खेल के मैदानों पर भी जोर दिया जाएगा। शैक्षिक परिणाम और सभी वित्तीय, शैक्षणिक और परिचालन मामलों के पारदर्शी प्रकटीकरण को उचित महत्व दिया जाएगा और स्कूलों के मूल्यांकन में उपयुक्त रूप से शामिल किया जाएगा। इससे सभी बच्चों के लिए निःशुल्क, न्यायसंगत और गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा सुनिश्चित करने के सतत विकास लक्ष्य 4 (एसडीजी) को प्राप्त करने की दिशा में भारत की प्रगति में और सुधार होगा।

सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य उच्चतम गुणवत्ता वाली शिक्षा प्रदान करना होगा ताकि यह अपने बच्चों को शिक्षित करने के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों से माता-पिता के लिए सबसे आकर्षक विकल्प बन जाए तथा छात्र के अभिभावक स्वेच्छा से इस ओर आकर्षित हो सकें। राष्ट्रीय मूल्यांकन के  समग्र विकास के लिए परख (प्रदर्शन, आंकलन समीक्षा और ज्ञान का विश्लेषण) की स्थापना की जायेगी। परख द्वारा समय-समय पर समग्र प्रणाली की आवधिक जांच-पड़ताल के लिए, छात्रों के सीखने के स्तरों का एक नमूना-आधारित नेशनल अचीवमेंट सर्वे (एनएएस), एनसीईआरटी के सहयोग के साथ किया जाएगा तथा मूल्यांकन में सरकारी स्कूलों के साथ-साथ निजी स्कूलों के छात्रों को भी शामिल किया जाएगा। राज्यों को अपने स्वयं के जनगणना-आधारित राज्य मूल्यांकन सर्वेक्षण, स्टेट एचीवमेन्ट सर्वे (एसएएस) का संचालन करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाएगा, जिसके परिणामों का उपयोग केवल विकास के उद्देश्यों के लिए किया जाएगा। स्कूलों में नामांकित बच्चों और किशोरों के सुरक्षा और अधिकारों पर ध्यान देने हेतु ऐसे तंत्रों को विकसित करने के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता दी जायेगी जो सभी छात्रों के लिए प्रभावी सामयिक और सर्वविदित हों।

स्कूल शिक्षा के केन्द्र बिन्दु में शिक्षक ही हैं। अतः स्कूलों के मानदण्ड तय करने के साथ-साथ शिक्षकों के मानक तय होना आवश्यक है। इस सम्बन्ध में लेख है कि शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानकों (एनपीएसटी) का एक सामान्य मार्गदर्शक सेट 2022 तक विकसित किया जायेगा। शिक्षक की भूमिका और इस रैंक के लिए आवश्यक दक्षताओं की अध्येताओं को भी शामिल किया जायेगा। इसमें प्रत्येक रैंक में किये गये प्रदर्शन के मूल्यांकन के लिए मानक भी शामिल होंगे जो कि समय-समय पर किये जायेंगे। निर्धारित मानकों  के आधार पर शिक्षकों का करियर मैंनेजमेंट होगा जिसमें कार्यकाल, व्यावसायिक विकसित के लिए प्रयास, वेतन वृद्धि, पदोन्नति और अन्य पहचान शामिल होंगे। कार्यकाल अवधि अथवा वरिष्ठता के बजाय सिर्फ निर्धारित मानकों के आधार पर पदोन्नति और वेतनमान में वृद्धि  होगी। 2030 में राष्ट्रीय स्तर पर व्यावसायिक मानकों की समीक्षा और  संशोधन किया जायेगा और इसके पश्चात प्रत्येक 10 वर्षों में व्यवस्था की गुणवत्ता का अनुमानित विश्लेषण किया जायेगा।

वास्तव में निश्चित मापदण्डों के अन्तर्गत मूल्यांकन से शिक्षण की गुणवत्ता तथा विद्यार्थियों के समग्र विषय से शिक्षा में गुणात्मक सुधार देखने को मिलता है। वर्तमान में सीबीएसई तथा राज्य बोर्ड द्वारा संचालित सरकारी एवं निजी स्कूलों के पाठ्यक्रम और शिक्षा के मानक में एकरूपता नहीं है। प्राइवेट स्कूलों में शिक्षकों को मिल रही वेतन एवं अन्य सुविधाएं सरकारी स्कूलों के बराबर नहीं है। शिक्षा मानव जीवन का आधार है तथा समाज का बौद्धिक और आध्यात्मिक उत्कर्ष शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में वर्णित प्राथमिक शिक्षा (शिक्षा की फाउण्डेशन) को मजबूत किये बिना राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्ष्य को प्राप्त करना आसान नहीं है। स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों द्वारा काफी प्रयास किये जा रहे हैं। केन्द्र एवं राज्य सरकारों को प्राथमिक शिक्षा को गुणवत्तायुक्त बनाने हेतु-परख, एनसीईआरटी, एसएसएसए, एससीईआरटी जैसी संस्थाओं के मजबूत तंत्र को विकसित करने हेतु प्राथमिकता के आधार पर ईमानदारी से प्रयास करने होंगे।

भारत में शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती जैसे गैर सरकारी संगठन का योगदान अतुलनीय है। वर्तमान में पूरे देश में इस संस्था के द्वारा लगभग 13 हजार विद्यालय संचालित हैं जिसमें 1.5 लाख आचार्य सीमित संसाधनों में समर्पण भाव से लगभग 35 लाख विद्यार्थियों को  संस्कारयुक्त तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। विद्या भारती के अन्तर्गत शिशु वाटिकाएं, शिशु मंदिर, विद्या मंदिर, सरस्वती विद्यालय, उच्चतर शिक्षा संस्थान, शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र और शोध संस्थान संचालित हैं। आज विद्या भारती, भारत में सबसे बड़ा गैर सरकारी शिक्षा संगठन बन चुका है। इसके साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य करने वाले भारतीय शिक्षण मण्डल की भूमिका भी इस हेतु अति महत्वपूर्ण है। यह संगठन गुरुकुल शिक्षा को युगानुकूल रूप में स्थापित कर शिक्षा जगत की सम्पूर्ण समस्याओं और चुनौतियों को हल करने के लिए संकल्पित है। आदर्श गुरुकुल तथा समाज पोषित भारत केन्द्रित शिक्षा व्यवस्था से ही राष्ट्र का पुनरुत्थान संभव है। वास्तव में शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण तथा भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत बनाने हेतु समाज के सभी वर्गों की अहम भूमिका तभी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रतिबिम्बित भारत को विश्वगुरु बनाने की संकल्पना फलीभूति हो पायेगी।

(लेखक शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.) में भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष है।)

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