अध्ययन और आनंद

 – दिलीप वसंत बेतकेकर

‘अध्ययन और आनंद एक साथ’!

‘अध्ययन और आनंद’ इन दोनों की आपस में क्या मित्रता हो सकती है? क्या कोई अध्ययन आनंदपूर्वक कर सकता है? क्या अध्ययन से आनंद की प्राप्ति हो सकती है?

ये सारे प्रश्न मन प्रगट हुए ना? अवश्य ही। ऐसे प्रश्न, शंकाएं मन में आती रहेंगी। अध्ययन करना चाहिए यह सही है। अध्ययन के अलावा कोई और विकल्प नहीं यह परम सत्य है। परन्तु यह मजबूरी है, वास्तविक आनंद नहीं। अध्ययन नहीं करने से ना केवल परीक्षा में बल्कि जीवन भर पीछे रह जाएंगे। नौकरी नहीं मिलेगी। और ऐसा ना हो इसीलिए अध्ययन करना है। अतः जबरन खींचतान से अध्ययन को सहयोगी बनाना बेकार है। और ऐसे विचार मन में आना स्वाभाविक है। तब क्या किया जाए?

अध्ययन को हम दो प्रकार के नजरिए से देख सकते हैं-

  1. आलस, चिड़ाचिड़ाहट, झंझट, अनावश्यक।
  2. आनंद, अवसर, खुशी, आवश्यक।

अब आप बताएं किस रूप में स्वीकार करें, रोते हुए अथवा गाते हुए? अर्थात अध्ययन कैसे करें- चिड़ाचिड़ाहट से या खुशी से, आनंद से? हंसते-खेलते?

अध्ययन से आनंद प्राप्ति और आनंद से अच्छा अध्ययन प्राप्त होता है। अर्थात जब हम आनंद, प्रसन्नता से अध्ययन करते हैं तो वह अधिक प्रभावी रहता है। अधिक समय तक हम अध्ययनरत रह सकते हैं। अतः अध्ययन और आनंद ये परस्पर पूरक हैं, परस्परालंबी हैं। अर्थात अध्ययन से अधिक आनंद प्राप्ति, और आनंद से अधिक ज्ञान की प्राप्ति- अध्ययन प्राप्त, ऐसा एक सुंदर चक्र है। The reward of good work is more work ऐसी मान्यता है। अभ्यास को एक कार्य की दृष्टि से देखें तो आनंद दूर होता है। और आनंद ना होने से अभ्यास रूठ जाता है।

मर्शियर के अनुसार- what we learn through pleasure, we never forget, थामस एडिसन के अनुसार- I never did a day’s work in my life time, it was all fun.  एडिसन ने कभी भी कोई कार्य माथे पर शिकन लेकर नहीं किया। सदैव प्रसन्नतापूर्वक किया। उनके सुयश का राज यही है।

चीनी तत्वज्ञ कन्फ्यूसीस भी यही कहते हैं-  Choose a job you love, and you will never have to work a day in your life. मराठी भाषा का एक शब्द है- ‘ढोर मेहनत’। अध्ययन मे केवल’ ढोर मेहनत’ (अर्थात बगैर सोचे केवल परिश्रम ही करना) नहीं चाहिए। एक तेलधानी में जुटे लगे हुए बैल जैसा काम नहीं करना चाहिए। अध्ययन के साथ प्रेम और आनंद मिलाया जाए तो अध्ययन आसान और सहजता से हो जाता है।

अध्ययन मतलब एक कठिन कार्य, झंझट, ऐसी दृष्टि ना रखते हुए बल्कि आनंद, मजा ऐसी दृष्टि रखें तो आगे के सभी कार्य सुसंपन्न होंगे।

दृष्टि बदलते ही अध्ययन की सृष्टि भी अपने आप बदलती है। कुछ अन्य करना अनावश्यक होगा।

अध्ययन- अभ्यास केवल परीक्षा के लिए, केन्द्रित किया जाए तो स्वभाविक रुप से आनंद प्रवाह क्षीण होगा और फलस्वरूप गुणवत्ता विलोपित होगी।

कबीर द्वारा बुने वस्त्र बिक जाते थे, कारण था उनकी गुणवत्ता। अन्य बुनकरों को आश्चर्य के साथ जलन भी होती थी। किसी ने इस संबंध में पूछा भी, कबीर का उत्तर था- मैं ये वस्त्र ग्राहकों के लिए नहीं बनता, मै तो बुनता हूं अपने ‘भगवंत’ के लिए।

कबीर की यही दृष्टि उनकी कृति को श्रेष्ठ बनाती है। भक्ति से कार्य श्रेष्ठ बनता है। विद्यार्थी, पालक, शिक्षक अथवा अन्य किसी ने भी ऐसी दृष्टि को स्वीकार अपनाए गए कार्यों में आनंद, प्रसन्नता, समाधान, संतुष्टि प्राप्त होकर गुणवत्ता प्राप्त होगी। अध्ययन में एक बार आनंद आने लगा तो इस अनुभव के लिए और अधिक अध्ययन करने की इच्छा जागृत होगी। महात्मा गांधी कहते थे live as if were to die tomorrow, learn as if you were to live forever.

वास्तव में देखा जाए तो सृष्टि की हर वस्तु आनंद का स्त्रोत है। एक तत्वज्ञानी के अनुसार There is not a blade of grass, there is no colour of this world is not intended to make us rejoice.

जब प्रत्येक से आनंद की प्राप्ति हो सकती है तो फिर अध्ययन से क्यों नहीं।

मुझे अभ्यास-अध्ययन पसंद नहीं, अध्ययन में आलस आता है, अध्ययन कठिन लगता है ऐसा जो अनुभव करते हैं तब आनंद हमारे आस पास भी नहीं भटकता। ऐसी सोच मन से दूर करनी होगी।

अध्ययन अर्थात आनंद। मुझे अध्ययन करना पसंद है ऐसा मन में बार बार सोचकर चमत्कार देखिये।

सीमेन वेल ने अध्ययन में आनंद की तुलना दौड़ते समय उठने वाले सांस से की है। सांस के बगैर दौड़ना असम्भव है। ठीक उसी प्रकार आनंद के बिना पढ़ना असंभव होगा।

आनंद संसर्गजन्य होता है। इसीलिए हमारे आस पास का मित्रमंडल कैसा है यह परखना आवश्यक है। जिन्हें अध्ययन पसंद है जो उत्साह पूर्वक अभ्यास करता है ऐसे लोगों से मित्रता करनी चाहिए।

हम उत्सव पर्व पर आनंद का अनुभव करते हैं, नए वस्त्र धारण करते हैं, नए जूते, मोबाइल, साइकिल आदि नई वस्तुएं क्रय कर आनंद उठाते हैं। किन्तु ध्यान रहे, वैज्ञानिक दृष्टि से भी देखने पर ये आनंद तात्कालिक होते हैं, अल्पकालिक होते हैं। अध्ययन और भक्ति का आनंद दीर्घकालिक होता है

इसलिए – प्रसन्नता से आनंद से अध्ययन करें, अध्ययन से आनंद लें!!

(लेखक शिक्षाविद, स्वतंत्र लेखक, चिन्तक व विचारक है।)

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