पाती बिटिया के नाम-34 (आओ फिर से दिया जलाएँ)

 – डॉ विकास दवे

प्रिय बिटिया!

दीपोत्सव का पर्व फिर आ गया है, आपके और आपके मित्रों के मन में उमंग हिलोरे लेने लगी अभी से। प्रयाग को मिठाई का स्वाद ललचाने लगा है तो अक्षय के कानों में बम पटाखों की आवाज भी गूंजने लगी है। हर्ष नए कपड़ों को पाने की कल्पना में अपने नाम को सार्थक किए जा रहा है। जानती हो दिवाली का यह पर्व हमें क्या संदेश दे रहा है? घनी काली अमावस के अंधेरे को पराजित कर नन्ना सा दीपक हमें यही कह रहा है- ‘मैं छोटा ही सही लेकिन अपना कार्य ठीक से कर रहा हूँ इसलिए यह घना अंधेरा भी मेरे सामने हार गया है।’

आप सब भी आयु में भले ही छोटे हो लेकिन यदि राष्ट्र कार्य के लिए अपने आपको ठीक प्रकार से सन्नद्ध कर लो तो माँ भारती को फिर से सर्वोच्च सिंहासन पर विराजित होने से कोई नहीं रोक सकता। अपने देश के राष्ट्रपति जी जहां भी प्रवास पर जाते हैं नन्हे-मुन्ने बच्चों से अवश्य बात करते हैं और सब से एक ही बात कहते हैं लक्ष्य बड़ा हो और प्रयत्न ईमानदारी से किया जाए तो भारत वर्ष विख्यात महाशक्ति बनकर उभरेगा ही।

हम सब दीपोत्सव के इस पर्व पर यह तो तय कर ही सकते हैं कि नन्हे बालक सा आत्मविश्वास लेकर इस अंधकार को अवश्य विजय पाएंगे। भगवान भी वामन अवतार लेकर हमें यही संदेश देते हैं। हमें अब यही उद्घोष करना होगा- ‘हमारे कद पर मत जाइए, हम तीन पग से संपूर्ण ब्रह्मांड नाप लेने की क्षमता रखते हैं।’

लेकिन केवल अपने प्रकाश से कुछ नहीं होगा। अपने जैसे और भी दीपक प्रज्वलित करना होंगे। अंधकार के पराभव तक हमारा एक ही मंत्र होगा- ‘आओ फिर से दिया जलाएं।’

तुम्हारे पापा

(लेखक इंदौर से प्रकाशित देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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