सा विद्या या विमुक्तये
– डॉ विकास दवे
प्रिय बिटिया!
रंगों के पर्व होली की ढेरों शुभकामनाएँ। जब बात होती है रंगों की तो याद आने लगती है धमाल, मस्ती और रंगों से सराबोर होली की। रंगों का यह पर्व आता है तो संपूर्ण समाज अपनी सभी पहचानों को समाप्त कर एक रंग में रंग जाता है। यह रंग होता है संस्कृति का रंग। और बात जब रंगों की हो तो रहीम की ये पंक्तियाँ याद आती हैं, ‘रहिमन कारि कामरी पर, चढ़त न दूजो रंग।’
वैसे तो प्रायोगिक रूप से यह सहज ही लगता है कि काले रंग पर दूसरा कोई रंग नहीं चढ़ता किन्तु कई बार कुछ और रंग भी दिखाई दे जाते हैं जिन पर दूसरा कोई रंग नहीं चढ़ता। ऐसा ही एक रंग है देशभक्ति का। ‘मेरा रंग दे बसंती चोला ….’ कहते हुए बिस्मिल, भगतसिंह, आजाद जैसे सैकड़ों जवानों ने फाँसी के फँदे चुमे और बंदुक को अपनी कनपटी पर रखकर राष्ट्रदेव के चरणों में अपने जीवन रूपी ताजे फूल को चढ़ा दिया। क्या उन्हें नहीं समझाये होंगे उनके अपनों ने सुखी जीवन बिताने के तरीके किन्तु बात तो वही थी ‘चढ़त न दूजो रंग’ की।
कारगिल संघर्ष के बाद आयी इस होली को मनाते समय क्या हमें अपने ही लहू से होली खेलने वाले वे शहीद याद नहीं आएंगे जिनके परिजन और नन्हें बच्चे पिछली होली याद कर इस बार आँसुओं में डुबे होंगे। उन पर भी तो वही देश सेवा का रंग चढ़ा था। और इस रंग में रंगे लोग भी होली तो अवश्य खेलते हैं किन्तु वे प्रतिक्षा नहीं करते ‘होली पर्व’ के आने की। तभी तो कवि कह उठता है-
‘जब देश में थी दीवाली वो खेल रहे थे होली,
जब हम बैठे थे घरों में, वो झेल रहे थे गोली।’
आओ रंगों का पर्व होली मनाएँ तो सही किन्तु उन देशभक्तों को याद करते हुए जिन पर बस एक ही रंग चढ़ा। दूजा नहीं। बलिदानियों को न तो अपने बच्चों के प्रसन्न चेहरों की लाली रोक पाई, न बहनों की राखी के चटक रंग, न पत्नी की माँग का सिन्दूरी रंग रोक पाया और न माता-पिता की आँखों में चमकता अपनत्व का रंग। उनके प्रति श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए यही प्रार्थना करें कि ईश्वर हमें भी राष्ट्रभक्ति के उसी रंग में रंग जाने की प्रेरणा दे जिस पर दूसरा कोई रंग नहीं चढ़ता।
(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)
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