सुसंगति मिलती रहे

 – दिलीप बसंत बेतकेकर

“तैयार हो गये क्या? जल्दी करो, देर हो रही है”, माँ ने अजय को चौथी बार याद दिलाते हुए कहा, परंतु अजय से कोई प्रतिसाद नहीं मिला। माँ की सहनशक्ति सीमा पार कर चुकी थी। कुछ उत्तर न आता देख वह अपना काम छोड़कर अजय कर क्या रहा है यह देखने आयी, परन्तु देखा तो अजय ने अभी तक शाला का गणवेश भी पहना न था! शाला जाने की कुछ भी तैयारी नहीं थी। अजय कुछ नाराज सा है, ये बात ध्यान में आई।

“क्यों अजय, शाला नहीं जाना क्या?”

“नहीं!” अजय ने दृढ़ता से उत्तर दिया।

“क्यों? क्या हुआ?” माँ ने कारण जानने का प्रयास किया। अजय चुप बैठा रहा। अब माँ से न सहा गया, और गुस्से से एक धप्पा अजय की पीठ पर जड़ दिया। फिर भी अजय वैसा ही बैठा रहा।

“मैं शाला नहीं जाउंगा” अजय चिल्लाते हुए बोला!

दो-चार दिन शाला जाते समय इसी प्रकार यू हीं चलता रहा। अब माँ को गुस्से के साथ चिंता अनुभव होने लगी। पांचवें दिन वह गुस्सा न होते हुए, अजय के पास बैठी और पूछने पर शाला न जाने का कारण जानकर उसे धक्का लगा। अजय के मित्र उसका मजाक उड़ाते, चिढ़ाते कि अजय के पापा के पास उसे शाला में पहुँचाने के लिये कार न थी!

अजय आठवीं कक्षा में अध्ययनरत था, उसने शाला छोड़ दी। माँ-बाप ने हर प्रकार के प्रयास किये, परंतु सारे व्यर्थ! ये कहानी सत्य है, काल्पनिक नहीं। पर्वरी में घटित घटना है। अजय के पड़ोस में रहने वाले मेरे एक प्रधानाचार्य मित्र ने भी खूब समझाया, प्रयास किए, परंतु कुछ लाभ नहीं हुआ।

किसी व्यक्ति के जीवन में उसके साथी, मित्र किसी भी प्रकार का मोड़ ला सकते हैं। अनेक बार देखा गया है कि युवावस्था में, माँ-पिता से भी अधिक प्रभाव मित्रों का ही होता है। उस समय यदि उचित संगत, साथ मिला तो ठीक, नहीं तो बहुत हानि होती है।

बचपन में माँ-पिता के साथ प्रत्येक जगह और प्रत्येक बार जाने की जिद करने वाले बालक युवा होने पर माँ-पिता द्वारा साथ चलने हेतु कहने पर भी जाने को राजी नहीं होते। शादी-ब्याह, मेला आदि स्थानों पर भी माँ-पिता के साथ जाने की इच्छा नहीं रहती। नवीं-दसवीं और उससे उच्च कक्षा के बालकों को तो अपने पालकों द्वारा पालक-शिक्षक सभा के लिये शाला में आना भी अच्छा नहीं लगता। जीवन के इस मोड़ पर मित्रों का स्थान महत्वपूर्ण, निर्णायक होता है। दसवीं कक्षा के पश्चात किस शाखा का चयन उच्च शिक्षा के लिये करना, और किस उच्च माध्यमिक विद्यालय अथवा महाविद्यालय में प्रवेश लेना इस महत्वपूर्ण बात का निर्णय लेते समय भी, अपना स्वयं का रुझान, प्राप्त अंक, आगे क्या करना है आदि का भला-बुरा विचार न करते हुए, केवल मित्र ने फलां शाखा अथवा महाविद्यालय में प्रवेश लिया है इसलिये हमने भी लिया, ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं। सच्चा और भला मित्र न पहचानने के कारण चयन में गलती होती है और असीमित हानि उठानी पड़ती है।

मित्रों का दबाव अधिक होता है। उस दबाव से स्वयं को बचाना हर व्यक्ति के बस में नहीं होता। जिसे इस नकारात्मक दबाव से छुटकारा मिल पाया, उसका जीवन कल्याणकारी होगा। परंतु जो इस दबाव के शिकार हुए, समझो उसका जीवन बरबाद हुआ। अच्छे मित्र मिलने से बिगड़ती जीवन शैली में भी सुधार हुआ, ऐसे भी अनेक उदाहरण हैं।

भर्तृहरि ने मित्र का वर्णन किया है वह अति सुन्दर और उचित है-

पापान्निवारयति योजयते हिताय

गुह्यं च गुह्यति गुणान् प्रकटीकरोति।

आपद्गतं च न जहाति ददाति काले

सन्मित्रो लक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः।।

अर्थात् पाप कर्मों से निवारण करने वाला, मित्र के हितार्थ सदैव योजना करने वाला, मित्र के बुरे गुणों को समाज से छिपाकर रखने वाला, मित्र के अच्छे गुणों को समाज में सदैव प्रकाशित करने वाला, मित्र के संकट काल में उसे छोड़कर न जाने वाला, मित्र के परेशानी वाले समय में उसे सहायता करने वाला, ऐसे लक्षण जिसमें उपलब्ध रहते हैं उसे ‘सन्मित्रा’ कहते हैं।

अध्ययन में भी मित्र का स्थान महत्वपूर्ण है। हम 25 प्रतिशत शिक्षकों से और 25 प्रतिशत मित्रों से सीखते हैं। अच्छे पढ़ने वाले मित्र हों तो अध्ययन में उसका लाभ हमें मिलता है। अपने बच्चों के मित्रों द्वारा कुछ सुझाव मिलते हैं तो उपयुक्त होते हैं।

इसीलिये पालकों को अपने बच्चों के मित्रों के संबंध में जानकारी प्राप्त करना चाहिये और मित्रों को किसी भी निमित्त से अपने घर बुलाना चाहिये। उनसे खुले दिल से और मित्रतापूर्वक बातचीत करना चाहिये। कुछ बच्चे थोड़े अबोल होते है। अकेले रहना पसंद करता है। मित्र बनाने की क्रिया में अपना बच्चा कैसा है? वह ‘सोशल’ नहीं है तो उसका कारण क्या है? और उसे ‘सोशल’ बनाने हेतु क्या उपाय कर सकते हैं इस पर पालकों ने विचार करना चाहिये।

सोशल शब्द से याद आया, ‘सोशल मीडिया’। आजकल इसकी बहुत चर्चा चलती है।

पहले मित्र शाला और गांव के ही होते थे। अब मित्र और मित्रता की परिधि दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। गांव, तहसील, जिला और देश की सीमा के पार से भी मित्रता का दायरा बढ़ रहा है। फेसबुक, व्हाटस्एप, गूगल आदि के कारण सीमाएं धुंधली हो रही है। “ग्लोबल विलेज” की भाषा प्रत्येक दिशा में फैल रही है। इस प्रकार की मित्रता के फायदे और नुक्सान, दोनों ही हैं। ‘सोशल मीडिया’ एक दुधरी शस्त्रा है। कुशलता से उपयोग किया तो लाभकारी, उपयुक्त है, अन्यथा जीवन में कभी भी पूर्ति न करने वाला नुक्सान भी है। इसीलिये उसके मित्र कौन हैं, मित्रता का हेतु क्या है, इस संबंध में बच्चों को जागरुक करना आवश्यक है।

दिनभर बच्चे कहां होते हैं? शाला में। और शाला पश्चात् घर में, है न? परंतु शाला और घर के अतिरिक्त बच्चों का समय गुजरता है मित्रगणों के सान्निध्य में। शाला में, कॉलेज में, ट्यूशन, खेल खेलने में, आना-जाना आदि का हिसाब किया जाए तो समझ में आयेगा कि अधिकतर समय मित्रों के साथ बीतता है। कुछ लोग तो केवल आपस में बातचीत में घण्टों गुजार देते है।

शाला और घर में गुजारा समय जैसा ही मित्रों के साथ का समय भी महत्वपूर्ण है। ये समय अच्छा और बुरा दोनों दृष्टि से बच्चों पर गहरा प्रभाव करने वाला और परिणामकारी होता है। शाला और घर बच्चों को जो भी अच्छा देने का प्रयास करता है वह मित्रों के साथ गुजारे समय में अधिक दृढ़ भी हो जाता है अथवा घर के संस्कारों को पूर्णतया निष्प्रभावी भी कर सकता है। शाला और घर में किये परिश्रम कुसंगति के कारण बेकार साबित हो सकते हैं। समुपदेशन हेतु प्राप्त होने वाली अनेक पालक-पाल्य कथाएं, इनकी पुष्टि करती हैं।

इसीलिये पालकों ने बारीकी से बच्चों के मित्रों को ‘पहचानना’ चाहिये, जानना चाहिये।

(लेखक शिक्षाविद् है और विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष है।)

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