सा विद्या या विमुक्तये
– नम्रता दत्त
शिशु के खिलौने एवं वस्त्र
22 जून को आर्यांश एक वर्ष का हो गया था। उसके जन्मदिन के अवसर पर परिवार में मेरा भी जाना हुआ। शाम को खूब धूमधाम से परिवार एवं अतिथियों ने होटल में जन्मदिन मनाया। उपहार भी ढेर सारे आए। रात को पार्टी के बाद घर के बङे बच्चों ने उपहारों को खोलने की जिद्ध की। उपहार खोले गए। अधिकांशतः उपहारों में खिलौने और वस्त्र ही निकले। इससे अच्छे उपहार हो भी क्या सकते थे! बच्चे को इसकी आवश्यकता है, ऐसा जानते और समझते हुए ही यह सामग्री भेंट स्वरूप दी गई। आर्यांश तो सो चुका था, परन्तु बङे बच्चों ने खिलौनों का खूब आनन्द लिया। बैटरी/चाबी से चलने वाले सभी खिलौने बहुत आकर्षक थे। किसी में लाइट जलती थी, किसी में संगीत बजता था, कोई संगीत के साथ नाचता/चलता था। खिलौने देखने से ही उनकी कीमत का अनुमान लगाया जा सकता था। मध्यम वर्गीय परिवारों ने भी जन्मदिन की दी गई पार्टी को देखते हुए महंगे उपहार दिए।
यही हाल वस्त्रों का भी था। वस्त्र तो कीमती थे परन्तु गर्मी के मौसम में एक वर्ष का शिशु उन्हें पहनकर आराम/सुखद अनुभव नहीं कर सकता, ऐसा आभास उन्हें देखने मात्र से ही हो रहा था। अतः इस अवस्था में खिलौने और वस्त्रों के चयन करने का ज्ञान एवं दृष्टि भी माता पिता को स्पष्ट होनी चाहिए क्योंकि शिशु को संस्कारित करने अथवा शिशु शिक्षा और विकास में इनकी अहम् भूमिका है।
जन्म के पश्चात् शिशु की ज्ञानेन्द्रियां सक्रिय हैं और कर्मेन्द्रियों को वह स्वयं सक्रिय करने का प्रयास करता है। ऐसी अवस्था में खिलौनों एवं वस्त्रों की अहम् भूमिका है। खिलौनों के रंग एवं ध्वनि बच्चे को आकर्षित करते हैं। यही आकर्षण उसकी ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों को सक्रिय करता है। वस्त्र भी ऐसे हों जिसमें उसकी कर्मेन्द्रियां (विशेषकर हाथ और पैर) सहजता का अनुभव करें। आइए इसकी आवश्यकता और सावधानियों की सूक्ष्मता को समझने का प्रयास करें –
हम जानते हैं कि यह शरीर पंचमहाभूत तत्वों से बना है। इस प्रकृति में व्याप्त प्रत्येक गुण से इस शरीर का विकास होता है। इसीलिए शिशु स्वयं ही प्रकृति के सानिध्य में रहना चाहता है। माता पिता को भी इस बात का बोध होना चाहिए और उन्हें यह प्रयास करना चाहिए कि उसकी आवश्यकता और उपयोग में आने वाली वस्तुएं भी सम्भवतः प्राकृतिक हों।
शिशु के खिलौने
शिशु के लिए कीमती वस्त्रों से अधिक महत्व स्वास्थ्यप्रद वस्त्रों का है।
शिशु को लाड-प्यार से पालने का अर्थ केवल धन व्यय करना ही नहीं है बल्कि उसकी आवश्यकता के अनुरूप साधन सामग्री को जुटाने की है। विकास के उपयोगी एवं संस्कारित साधन आसपास के परिवेश में बिना धन खर्च किए भी मिल सकते हैं। धन को उसके भविष्य के लिए बचा कर रखें। यह दृष्टि हीन भावना की नहीं अपितु संसाधनों का उचित उपयोग करने की है।
(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)
और पढ़ें : शिशु शिक्षा 23 (जन्म से एक वर्ष के शिशुओं की माताओं का शिक्षण-3)
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