– वासुदेव प्रजापति
नेहरु व सरकार की बेतुकी सफाई
सभी लोग राष्ट्रगान की सच्चाई जानने को उत्सुक थे। इसलिए बाध्य होकर पं. नेहरु को संविधान सभा में यह सफाई देनी पड़ी, जिसकी मुख्य बात यह है। “सन् 1947 को न्यूयार्क में संयुक्त राष्ट्र की जनरल एसेंबली में हमारे प्रतिनिधि से राष्ट्रगान की रिकॉर्डिंग मांगी गई थी। हमारे पास उस समय किसी उपयुक्त राष्ट्रगान की रिकार्डिंग नहीं थी, जिसे हम न्यूयार्क भेज सकते। संयोग से उस समय हमारे प्रतिनिधि के पास जन-गण-मन की रिकॉर्ड थी जिसे आर्केस्ट्रा को दे दी गई। जब आर्केस्ट्रा पर इसे बजाया गया तो अनेक देशों के विदेशी प्रतिनिधियों ने इसे बहुत पसंद किया। इस नई तर्ज का रिकॉर्ड बनाकर भारत भेज दिया गया, तब से यही हमारी सेना, विदेशी दूतावासों आदि में आवश्यक अवसरों पर बजाया जाता है। मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया है कि संविधान सभा में अंतिम निर्णय न होने तक जन-गण-मन ही राष्ट्रगान के रूप में गाया जाता रहेगा। इसके बाद में पश्चिम बंगाल सरकार का संदेश मिला है कि वन्देमातरम् को ही राष्ट्रगान बनाए रखा जाए।
भारत सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग ने दो पुस्तिकाएँ, ‘फेक्ट्स एबाउट इंडिया’ और ‘अवर नेशनल सोंग्स’ प्रकाशित की थीं। इन दोनों में राष्ट्रगान से सम्बन्धित कुछ विचारणीय बिन्दु निम्नलिखित हैं –
“वन्देमातरम् और जन-गण-मन दोनों का ही आभायुक्त इतिहास है, अतः दोनों ही पुरानी स्मृतियाँ जगाते हैं। दोनों ही महान लेखकों की कृतियाँ हैं। राष्ट्रगान में राष्ट्रीय भावना होनी चाहिए और वह गेय होना चाहिए। यद्यपि वन्देमातरम् ने देशभक्तों को महानतम बलिदान देने हेतु प्रेरित किया है, तथापि इसको राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार करने में कठिनाई यह है कि इसका ‘हार्मोनाइजेशन’ नहीं हो सकता। विशेषज्ञों का मत है कि यह गीत कुछ आकारहीन और आनन्ददायी गुण के विषय में संदिग्ध है। और वन्देमातरम् में संगीत की दृष्टि से लय, ताल व सुर का भी अभाव है।”
सफाई से उभरे प्रश्न व उनका समाधान?
उपर्युक्त सफाई में तनिक भी सच्चाई नहीं है, इसलिए अनेक ज्वलन्त प्रश्न उभरे हैं, जो अधोलिखित हैं –
- राष्ट्रगान पर संविधान सभा में प्रस्ताव द्वारा निर्णय क्यों नहीं लिया गया? बार बार इस विषय को टालने के पीछे किसका हाथ था और क्यों?
राष्ट्रगान के विषय को स्वयं नेहरु जी ने उलझाए रखा। वे अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए मुसलमानों को नाराज नहीं करना चाहते थे। मुसलमानों की वाहवाही लूटने तथा रवीन्द्र समर्थकों को खुश करने के लिए पं. नेहरु ने ‘टैगोर शतवार्षिकी ग्रंथमाला की भूमिका में लिखा था कि –
“कविगुरु के साथ मेरी अंतिम मुलाकात के मौके पर मैंने उनसे नये भारत के लिए नया राष्ट्रगान लिखने का अनुरोध किया था, जिसे उन्होंने आंशिक रूप से स्वीकार भी किया था। तब हमारे दिमाग में जन-गण-मन की बात नहीं आई थी। उसके बाद में कविगुरु दिवंगत हो गए। इसलिए अब मुझे यह बताने में अत्यन्त प्रसन्नता हो रही है कि कुछ वर्षों के बाद भारत के आजाद हो जाने पर हमने उनके ‘जन-गण-मन’ को ही राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त किया है। मुझे सन्तोष है कि मैं स्वयं काफी हद तक इस निर्णय के लिए जिम्मेदार रहा। यह एक महान राष्ट्रगान तो है ही, साथ में यह हमें कविगुरु रवीन्द्रनाथ का स्मरण भी करवाता रहेगा। “नेहरुजी की यह गर्वोक्ति स्वयं उनको वन्देमातरम् के विरुद्ध मुख्य षडयंत्रकारी सिद्ध करने हेतु पर्याप्त है।
- दि. 24 जनवरी 1950 की संविधान सभा में अन्तिम समय में अध्यक्ष द्वारा घोषणा करने के पीछे किसकी योजना थी? घोषणा में कहा गया कि ‘यह उचित समझा गया’ तो यह किसने समझा?
उक्त दिन संविधान सभा के अन्तिम समय में अध्यक्ष द्वारा घोषणा करवाने के पीछे नेहरुजी की योजना थी, उन्होंने ही ऐसा करना उचित समझा था। यदि योजना सबकी सहमति से बनी होती तो पुरुषोत्तमदास जी टण्डन कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र नहीं देते।
- न्यूयार्क स्थित हमारे प्रतिनिधि के पास जन-गण-मन की रिकार्ड कहाँ से आई? वन्देमातरम् की रिकॉर्ड प्राप्त करने के प्रयास क्यों नहीं किए गए?
नेहरु जी शुरु से ही मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे थे। इसलिए उन्होंने योजनापूर्वक जन-गण-मन की रिकॉर्ड ही भिजवाई थी। तब 15 अगस्त 47 को राष्ट्रसंघ की जनरल एसेंबली में जन-गण-मन की रिकॉर्ड बजी थी। यदि प्रयत्न किया जाता तो उस समय अनेक देशभक्त बंगाली परिवार न्यूयार्क में रहते थे, उनसे वन्देमातरम् की रिकॉर्ड लेकर बजवाई जा सकती थी।
- नेहरु जी ने अज्ञान का परिचय देते हुए कहा कि न्यूयार्क में उपस्थित संभ्रांत विदेशी प्रतिनिधियों ने जन-गण-मन धुन की बहुत सराहना की थी। क्या राष्ट्रगान के चयन की कसौटी विदेशी प्रतिनिधि होते हैं?
कितनी हास्यास्पद बात है कि जन-गण-मन की धुन विदेशियों को पसन्द आई इसलिए उसे राष्ट्रगान बना दिया गया। राष्ट्रगान राष्ट्र की आत्मा का प्रतीक होता है और राष्ट्र के धर्म व संस्कृति का परिचायक होता है। किसी राष्ट्रगान का पूर्व इतिहास, स्वतंत्रता संग्राम में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका सर्वाधिक मायने रखती है। जिस गान की धुन एवं शब्द स्वदेशवासियों को स्वदेशप्रेम का पाठ सिखाए, उसके गान से देशभक्तों की धमनियों में खून खोलने लगे, वही राष्ट्रगान की सही कसौटी होती है। अमरीका में बैठे कुछ विदेशियों की पसन्द हमारे राष्ट्रगान के चयन की कसौटी कैसे हो सकती है? किसी भी राष्ट्र में विदेशियों की पसन्द का राष्ट्रगान चुना जाना, आज तक किसी भी व्यक्ति ने नहीं सुना होगा।
- राष्ट्रगान के विषय पर अनेक संस्थाओं ने जनमत संग्रह क्यों करवाया था?
संविधान सभा में राष्ट्रगान का निर्णय होने से पहले ही नेहरुजी ने अपनी मर्जी से वन्देमातरम् को हटाकर एक बिल्कुल नये गान को राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त कर दिया, जो नेहरुजी की तानाशाही थी। इस तानाशाही के विरुद्ध सांकेतिक जनमत संग्रह किया गया था। सन् जुलाई 1949 में ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद’ ने जो जनमत संग्रह आयोजित किया था, उसमें 5,19,435 लोगों ने भाग लिया था। उस जनमत संग्रह में 95% लोगों ने राष्ट्रगान के रूप में वन्देमातरम् के पक्ष में अपना मत डाला था। अतः पूरा देश वन्देमातरम् को ही राष्ट्रगान बनाना चाहता था, परन्तु नेहरुजी की तानाशाही जीत गई।
- सरकारी सूचना पुस्तिकाओं में हास्यास्पद जानकारी क्यों दी गई?
दोनों पुस्तिकाओं में लिखी बातें मनघडंत थी। सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग को जन-गण-मन का कौनसा आभायुक्त इतिहास दिखाई दे गया और इसने कौनसी पुरानी स्मृतियों को जगा दिया? जबकि वास्तविकता यह है कि वन्देमातरम् का इतिहास तो आभायुक्त है, परन्तु जन-गण-मण का तो कोई आभायुक्त इतिहास ही नहीं है। फिर भी जन-गण-मन को महान बताने वाली मिथ्या बातें हास्यास्पद नहीं तो ओर क्या है।
- वन्देमातरम् के लिए आकारहीन व आनन्ददायी गुणों का अभाव जैसी बातें क्यों कही गई?
वन्देमातरम् को पदच्युत करने के लिए ऐसे असत्य विमर्श गढ़े गए, अन्यथा जिसने भी इसका भावार्थ समझा है, वह तो आनन्दित हो नाच उठा था। स्वयं गांधीजी ने कहा है कि “मैंने जब वन्देमातरम् को गाए जाते हुए सुना तो मैं आत्मविभोर हो गया।” फिर इसमें आनन्ददायी गुणों का अभाव कहाँ से आ गया।
- वन्देमातरम् पर महत्वपूर्ण यह आपत्ति क्यों उठाई गई कि इसका हार्मोनाइजेशन नहीं हो पाता? इसमें सुर, ताल व लय का अभाव है तथा पाश्चात्य आर्केस्ट्रा पर इसकी धुन नहीं बैठती।
उनका यह आरोप भी मिथ्या व दुराग्रहपूर्ण है। तत्कालीन सुविख्यात संगीतज्ञ मास्टर कृष्णराव ने सन् 1940 से पहले ही वन्देमातरम् को स्वरबद्ध करके झिंझोटी राग में उसकी रिकॉर्डिंग तैयार कर एक पत्र के साथ भारत सरकार को भेज दी थी। उस पत्र में उन्होंने दावा किया था कि इस सरल धुन पर चालीस-पच्चास हजार लोगों के मुख से गवाकर देख लिया है, अनुभव बहुत अच्छा रहा। अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि लाखों मनुष्य इसे समवेत स्वर में गा सकते हैं। इस तर्ज पर गाने से वातावरण भी अत्यंत गरिमामय बन जाता है। इसे पुलिस परेड के कदमों के साथ भी गाया जा सकता है। सरदार पटेल के आदेश पर उन्हें रेडियो पर भी गाया था। अनेक संवाददाताओं के दबाव से स्वयं नेहरु ने इन्हें अपने सामने गाने का अवसर दिया था। जनरल करिअप्पा के आदेश पर बैंड चीफ लाजपत सिंह के सम्मुख इस धुन को बैंड पर बजाया गया, उन्होंने सन्तुष्ट होकर अपनी सहमति दी। ब्रिटिश बैंड कमांडर सी.आर. गार्डन ने स्वयं बजाकर देखा और प्रसन्नतापूर्वक प्रमाणपत्र दिया कि यह धुन ब्रिटिश बैंड पर बहुत बढ़िया बैठती है। कहने का अर्थ यही है कि वन्देमातरम् पर जो जो मिथ्या आरोप लगाए गए थे उन्हें मास्टर कृष्णराव ने गलत सिद्ध कर दिया था, फिर भी नेहरुजी ने उनके अथक परिश्रम पर पानी फेर दिया। अतः यह कहा जा सकता है कि असंदिग्ध रूप से यह नेहरुजी प्रदत्त वन्देमातरम् को अपदस्थ करने का एक पूर्वनियोजित नाटक मात्र था।
हमारी अभिलाषा…
राष्ट्रगान राष्ट्र का अनन्य प्रतीक होता है। इस पवित्र प्रतीक का प्रथमतः अंगभंग करके, द्वितीयत: इसको पदच्युत करके हमने जननी जन्मभूमि के प्रति जो जघन्य अपराध किया है, उसका प्रायश्चित करने से ही राष्ट्र की चिति एवं विराट का जागरण होगा, परिणामस्वरूप राष्ट्र अपना सर्वतोमुखी अभ्युदय करेगा। सम्पूर्ण वन्देमातरम् को पुनः राष्ट्रगान के पद पर अभिषिक्त करके जब राष्ट्र की आबाल-वृद्ध सभी सन्तानें इस मातृस्तोत्र के नित्य गान द्वारा ज्ञान, शक्ति व समृद्धि की प्रतीक स्वदेश माता की, इन विभूतियों को प्राप्त करने हेतु संकल्प करेंगी, तभी ये हमें प्राप्त होंगी।
सुखदा, वरदा माता प्रसन्न होकर हमें निश्चित रूप से सम्पूर्ण विश्व को धारण और भरण करने योग्य ज्ञान, शक्ति व समृद्धि प्रदान करेंगी। हमें इस सनातन राष्ट्र के स्वर्णिम भविष्य में अटल विश्वास है, अतः भविष्य में हम अपने इन्हीं चर्मचक्षुओं से पुनः वन्देमातरम् के उत्कर्ष को देखेंगे।
राष्ट्र की जय चेतना का गान वन्देमातरम्।
राष्ट्र भक्ति प्रेरणा का गान वन्दे मातरम्।।
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(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व सचिव है।)