बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-24 (आंग्ल भाषा शिक्षण)

 – रवि कुमार

भारत में आंग्ल भाषा सीखना एक भूत की तरह है, जिसका डर हमेशा लगा रहता है। यह स्वाभाविक भी है। आंग्ल भाषा यह भारतीय भाषा नहीं है और न ही इसका भारतीय भाषाओँ से सरोकार है। इसकी लिपि एवं उच्चारण किसी भी भारतीय भाषा से मिलता नहीं है। भारतीय भाषाओँ की गंगोत्री संस्कृत को कहा जाता है इस कारण भारतीय भाषाओँ में काफी कुछ मिलता जुलता है। आंग्ल भाषा आंग्ल प्रदेश यानि इंग्लैंड से यहाँ आई है। भारत की स्वतंत्रता के पश्चात आंग्ल भाषा का उपयोग समाप्त होकर भारतीय भाषाओँ का ही सर्वत्र उपयोग होना चाहिए था। परन्तु इस सब के लिए आम जनमानस की दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता होती है।

आज आंग्ल भाषा आम जनमानस में अपना स्थान बनाए हुए है। विद्यार्थी जीवन में आंग्ल भाषा पढ़ना सभी को अनिवार्य लगता है। केवल आंग्ल भाषा ही नहीं आंग्ल माध्यम से पढ़ना अभिभावकों की प्रथम मांग रहती है। एक नई भाषा एवं सम्पर्क की भाषा के रूप में आंग्ल भाषा सीखना तो ठीक है। परन्तु सभी विषय आंग्ल भाषा में सीखना यह अनुचित है। आंग्ल माध्यम के कारण विद्यार्थी न तो विषय सिख पाता है और न ही भाषा। फिर आंग्ल माध्यम है तो पुस्तकें भी आंग्ल भाषा में है। परन्तु देशभर में आंग्ल भाषा का शिक्षण ही स्थानीय भाषा में होता है यानि भाषा रूपान्तर करके पढ़ाया जाता है। आंग्ल भाषा के शिक्षकों को यदि कहा जाए कि आपको कक्षा के 40 मिनट में आंग्ल भाषा में ही पढाना है तो 90% शिक्षकों को कठिनाई आएगी, साथ ही विद्यार्थियों को भी। यहाँ आंग्ल भाषा का विरोध नहीं है बल्कि वस्तुस्थिति की समीक्षा है।

आंग्ल भाषा कैसे सिखाएं :  सबसे पहले आंग्ल भाषा के डर को विद्यार्थी के मन से निकालना होगा। मन में डर रहेगा तो सीखना कठिन है। सरल से कठिन की ओर ले जाना होगा। भाषा उतनी आती है जितनी अधिक उपयोग करते है। अतः कक्षा शिक्षण में आंग्ल भाषा का जितना अधिकाधिक उपयोग अध्यापक व विद्यार्थी करेगा भाषा उतनी आएगी। संभव हो तो अध्यापक द्वारा आंग्ल भाषा की कक्षा में सूचना दी जाए कि कक्षा में जो भी संवाद करना है आंग्ल भाषा में करना है, स्थानीय भाषा में नहीं, जैसी भी टूटी-फूटी आती है उसी में। अध्यापक को भी आंग्ल में ही पढ़ाना व संवाद करना है। ऐसा करने से धीरे-धीरे कक्षा में आंग्ल भाषा बोलने का विश्वास बढ़ने लगेगा। मन से डर निकलने पर एवं विश्वास बढ़ने पर शुद्धता की ओर ध्यान दिया जाए। कक्षाकक्ष में गतिविधि आधारित पढ़ाया जाए न कि भाषण आधारित।

भाषा में शब्दों की आवश्यकता रहती है। विद्यार्थी का शब्दकोष छोटा है तो भाषा बोलने में कठिनाई रहती है। विद्यार्थियों को नए-नए शब्द सीखने के लिए प्रेरित किया जाए। इसके लिए शब्दकोष का उपयोग करना सिखाए। विद्यार्थी को प्रतिदिन पांच नए शब्द अर्थ सहित अपनी कॉपी में लिखने को कहे। इससे विद्यार्थी के शब्दकोष का विस्तार होगा। विद्यार्थी आंग्ल भाषा का समाचार पत्र, कहानियों की पुस्तक आदि पढ़े। प्रारंभ में समझ कम आएगा, धीरे धीरे समझ आना बढ़ता जाएगा और भाषा का स्तर भी बढ़ेगा।

कक्षा शिक्षण के दौरान विभिन्न गतिविधियाँ :

  1. चित्र वर्णन (Picture Description) – इस गतिविधि में कोई एक दृश्य का चित्र विद्यार्थियों के सामने रखा जाए और उसे देखकर चित्र में क्या है यह आंग्ल में बताने को कहे। विद्यार्थी को जो समझ आएगा, वह उसे कहेगा। इससे देखकर वर्णन करने की क्षमता बढ़ेगी।
  2. समूह चर्चा (Group Discussion) – कक्षा को विभिन्न ग्रुपों में बाँट कर विषय देकर चर्चा करने को कहे। चर्चा के दौरान समूह प्रमुख चर्चा में आए बिन्दुओं को सूचीबद्ध करे और चर्चा पश्चात उन बिन्दुओं को सभी के सम्मुख रखे। सारा संवाद आंग्ल भाषा में हो और विषय पाठ्यक्रम आधारित हो।
  3. कथा कथन (Story Telling) : पाठ्यपुस्तक में आई कथा को अपने शब्दों में व्यक्त करने को कहे। एक ही कथा को सभी अपने शब्दों में व्यक्त करे। कोई विषय या दृश्य बताकर कथा निर्माण के लिए भी बता सकते है।
  4. वाक्य निर्माण (Sentence Making) : विद्यार्थियों को एक शब्द देकर या दृश्य बताकर न्यूनतम पांच वाक्य निर्माण को कहे। वाक्य निर्माण के पश्चात सभी के सम्मुख वाक्य पढ़ने को कहे। गलत वाक्य देकर ठीक वाक्य लिखने को कहे। विभिन्न शब्दों के फ्लेश कार्ड देकर वाक्य बनाने को कहा जाए।

इसी प्रकार आंग्ल भाषा में कविता पाठ, गीत गायन, भाषण प्रतियोगिता, नाट्य मंचन आदि गतिविधियां कक्षा कक्ष में करवा सकते है। व्याकरण को पाठ्यपुस्तक के साथ ही सिखाया जाए। व्याकरण प्रयोग आधारित सिखाया जाता है तो रुचिकर रहता है अन्यथा अरुचिकर। अन्ततोगत्वा व्याकरण का उपयोग तो सामान्य व्यव्हार में भाषा के शुद्धरूप में ही होता है।

आंग्ल माध्यम में शिक्षण होने से रटने की प्रवृति बढ़ी है। रटने से परीक्षा में अंक तो आ जाते है परन्तु अधिगम न के बराबर होता है। आंग्ल भाषा न आने के कारण और उसी में सभी विषय होने से ऐसा होता है। अतः विद्यार्थी को रटने की बजाय समझ कर पढ़ने के लिए प्रेरित करने का कार्य करना होगा।

    

एक भ्रम सभी के मन में रहता है कि आंग्ल भाषा में ही सब ज्ञान निहित है। यह भ्रम भी विद्यार्थियों में से निकालना आवश्यक है। भारत का ज्ञान भारतीय भाषाओँ में लिपिबद्ध शास्त्रों में है और ज्ञान अनुभवजन्य है यानि अनुभूति से प्राप्त होता है। लिपिबद्ध को पढ़ने से केवल जानकारी प्राप्त होती है। और पश्चिम अभी भी भारत के ज्ञान के आसपास भी नहीं पहुंचा है।

एक नई भाषा, संपर्क भाषा एवं विषय के रूप में आंग्ल भाषा को सीखना उचित होगा। अधुरा अधिगम अच्छा नहीं है अतः जो सीखे पूरा सीखे, ठीक सीखे और सिखाएं।  

(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)

और पढ़ें : बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-23 (शारीरिक शिक्षा)

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