बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-23 (शारीरिक शिक्षा)

  – रवि कुमार

स्वामी विवेकानन्द के अनुसार ‘श्रीमद भगवदगीता’ जैसे ‍पवित्र ग्रंथ के अध्ययन से पूर्व फुटबॉल खेलना ज्यादा आवश्यक है। ‘श्रीमद भगवदगीता’ वीरों का शास्त्र है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा महारथी अर्जुन को दिया गया दिव्य उपदेश है। उनका मानना था कि शरीर का बल बढ़ना आवश्यक है। शरीर स्वस्थ होगा तो समझ भी परिष्कृत होगी।

शारीरिक व खेलकूद का विद्यार्थी जीवन में अत्यधिक महत्व है। गत दिनों सीबीएसई ने एक सर्कुलर द्वारा विद्यालयों को आदेशित किया कि कक्षा 9 से 12 में शारीरिक का कालांश अनिवार्य रूप से होना चाहिए। और फिट इंडिया के नाम से एक प्रकल्प लांच किया जिसके अंतर्गत विद्यालय में शारीरिक व खेलकूद की गतिविधियों का संचालन होना है। जिस विद्यालय में शारीरिक की गतिविधियों का संचालन ठीक होगा उन्हें फिट इंडिया सर्टिफिकेट व फ्लैग प्रदान किया जाएगा। सीबीएसई द्वारा उपरोक्त सर्कुलर आदेशित करना व फिट इंडिया प्रकल्प लांच करना विद्यार्थी जीवन में शारीरिक व खेलकूद की महत्ता को दर्शाता है।

एक कार्टून आता है जिसमें दो दृश्य बने है, एक दृश्य 1990 के दशक का है। पुत्र मैदान में खेल रहा है, उसकी मां उसका कान खींचकर घर की ओर ले जा रही है और पढ़ने के लिए कह रही है। दूसरा दृश्य आज का है जिसमें बालक मोबाइल में लगा है और मां उसका कान पकड़कर घर से बाहर की ओर ले जा रही है तथा खेलने के लिए कह रही है। यह कार्टून वस्तुस्थिति को अभिव्यक्त कर रहा है।

विद्यार्थी जीवन में शारीरिक व खेलकूद में सहभागिता रहती है तो उसका प्रभाव जीवनभर रहता है। बालक में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। शारीरिक विकास व वृद्धि ठीक से होती है। मौसम परिवर्तन का स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। खेलकूद से सामुदायिक भावना का विकास होता है।

परंतु वस्तुस्थिति यह है कि बालक घर, गली-मोहल्ले, पार्क आदि  में नहीं खेलता और विद्यालय में भी सभी बालकों को अवसर नहीं मिलता। मुख्य विषयों की पढ़ाई, पाठ्यक्रम पूर्ण करना और परीक्षा तैयारी के नाम पर शारीरिक का कालांश शहीद हो जाता है। सत्र प्रारम्भ के कुछ मास अधिक गर्मी के होते है और अंत के परीक्षा की तैयारी के। दोनों स्थितियों में शारीरिक व खेलकूद नहीं होता। जहां खेलकूद होता है, वहां कुल संख्या के 5 से 10% को अवसर मिलता है। शेष बालक मात्र दर्शक बनकर रहते है। परंतु यह नई पीढ़ी के निर्माण के लिए सर्वथा अनुचित है। सभी घटकों को मिलकर इस स्थिति को बदलने की आवश्यकता समय की मांग है।

शारीरिक व खेलकूद का क्रियान्वयन विद्यालय में कैसे करे

विद्यालय में शारीरिक शिक्षक है या नहीं, सभी आचार्यों का शारीरिक प्रशिक्षण होना आवश्यक है ताकि बालकों को अधिकाधिक सिखाया जा सके। प्रथमतः वंदना सभा में दिवसानुसार शारीरिक क्रियाकलापों का समायोजन करना अच्छा रहता है। उसमें दस मिनट न्यूनतम शारीरिक (वार्मअप एक्सरसाइज़), व्यायाम योग, सूर्यनमस्कार, आसन आदि हो सकते है। वंदना सभा में शारीरिक होने से उसका प्रभाव दिनभर रहता है। कक्षा शिक्षण के दौरान बालक गतिमान व एकाग्रचित होकर अध्ययन करता है। दो विद्यालयों में दस मिनट न्यूनतम शारीरिक वंदना सभा में होने लगा। वहां बातचीत में आचार्यों से पूछा गया कि न्यूनतम शारीरिक का कक्षा शिक्षण पर क्या प्रभाव हो रहा है? आचार्यों ने अपनी कक्षा शिक्षण अनुभव के आधार पर बताया कि अब विद्यार्थी कक्षा में अंतिम कालांश तक चुस्त व एकाग्र रहते रहते है, आलस्य उनके निकट नहीं आता। केवल प्रातः दस मिनट के शारीरिक का इतना प्रभाव!

कालांश व्यवस्था: प्राथमिक कक्षाओं में साप्ताहिक छह कालांश, उच्च प्राथमिक कक्षाओं में साप्ताहिक तीन तथा माध्यमिक व उच्च माध्यमिक कक्षाओं में दो-दो साप्ताहिक कालांशों को व्यवस्था हो और यह कालांश मैदान में जाकर ही सम्पन्न हो। कालांश में समता, संचलन, 3-4 मिनट के सभी की सहभागिता वाले खेल हो। शारीरिक कालांश की व्यवस्था वर्षभर की रहे। किसी भी अवस्था में यह समाप्त न की जाए।

वार्षिक कार्यक्रम: वर्ष में एक बार खेलकूद दिवस या सप्ताह मनाया जाए। इस दौरान खेलकूद स्पर्धाओं में सभी को भाग लेने का अवसर प्राप्त हो, ऐसी व्यवस्था बने। वर्ष में एक बार सूर्य रथसप्तमी के अवसर पर सूर्यनमस्कार महायज्ञ का आयोजन हो और एक बार घोष वादन के साथ संचलन का कार्यक्रम किया जाए।

विद्यालय एथलेटिक्स के अलावा कोई दो खेल का चयन कर उसकी टीम के सतत अभ्यास की व्यवस्था बनाए। अभ्यास का समय विद्यालय समय से पूर्व अथवा पश्चात हो ताकि 60 मिनट वार्मअप, शारीरिक क्रियाएं, स्ट्रेचिंग आदि हो और 30 मिनट खेल का अभ्यास हो सके।

विद्यालय में शारीरिक व खेलकूद के क्रियान्वयन की बात होती है तो अधिकांशतः कुछ एक जैसी बाते सुनने में आती है। यथा हमारे यहाँ मैदान नहीं है, खेलकूद कैसे करवाए, हमारे यहाँ शारीरिक आचार्य नहीं है। विद्यार्थी गर्मी सहन नहीं कर सकते, खेलने से चोट लग सकती है, इस प्रकार के भय भी रहते है। एक धारणा सर्वदूर बनी है कि मिट्टी में नहीं खेलना चाहिए। मिट्टी में खेलने से कपड़े व शरीर गन्दा हो जाता है। मैदान के खेल बालिकाओं के लिए नहीं है।

मैदान यदि विद्यालय में नहीं है तो आसपास होगा, बस वहां आने जाने के लिए यातायात की व्यवस्था करनी होगी। मैदान निकट में नहीं है, दूर है तो सप्ताह में आधा दिवस कक्षाएं क्रमशः ले जाने की व्यवस्था बन सकती है। विद्यालय परिसर में कम स्थान होने पर इंडोर गेम्स की व्यवस्था बनाई जा सकती है। कम स्थान में क्या-क्या शारीरिक क्रियाकलाप हो सकते है, इसकी योजना बनाई जाए एवं आचार्यों को इसका प्रशिक्षण दिया जाए। गर्मी व चोट से डरते रहेंगे तो शारीरिक विकास कैसे होगा। इसके लिए आचार्य व बालक के मन से भी भय निकालने की आवश्यकता है। इस विषय में अभिभावक को भी जागरूक करने की आवश्यकता है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि जो बालक बाल्यकाल में मिट्टी के अधिक संपर्क में रहे है उन्हें बाद में धूल आदि से कोई एलर्जी नहीं होती और वे अन्यों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ व निरोगी रहते है।

प्रत्येक विद्यार्थी नियमित खेलना चाहता है। क्या आचार्य व अभिभावक उसकी यह इच्छा पूर्ण करने का मनोभाव रखते है? विद्यार्थी जीवन में हुआ शारीरिक विकास व नियमित व्यायाम की आदत जीवनभर साथ रहती है। इससे एक स्वस्थ भारत की कल्पना कर सकते है। क्या आचार्य व अभिभावक इस विषय में अपना योगदान दे सकता है? यह हम सबके लिए विचारणीय प्रश्न है।

(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)

और पढ़ें : बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-22 (संस्कृत भाषा शिक्षण)

 

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