ज्ञान की बात 42 (सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ में संस्कार)

 – वासुदेव प्रजापति

इससे पूर्व हमने मनोवैज्ञानिक सन्दर्भ में संस्कारों को समझा है। मनोवैज्ञानिक सन्दर्भ के अन्तर्गत दो प्रकार के संस्कारों को जाना। पहले प्रकार में कर्मज संस्कार, ज्ञानज संस्कार और भावज संस्कार आते हैं और दूसरे प्रकार के संस्कारों में पूर्वजन्म के संस्कार, आनुवंशिक संस्कार, संस्कृति के संस्कार एवं वातावरण के संस्कारों का समावेश होता है। आज हम सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ में आने वाले संस्कारों को जानेंगे। किन्तु इससे भी पूर्व हम संस्कारों से सम्बन्धित एक छोटी-सी कथा का आनन्द लेंगे।

देने का संस्कार

एक संन्यासी भिक्षाटन हेतु नगर में गए। नगर में जाकर एक घर के आगे आवाज लगाई – भिक्षां देहि। घर में से एक छोटी-सी बालिका बाहर आई और बोली- बाबा! हम बहुत गरीब हैं, इसलिए हमारे पास देने को कुछ भी नहीं है।

वे महात्मा बोले- बेटी! घर आए अतिथि को कुछ न कुछ तो देना ही चाहिए, कभी भी उसे खाली हाथ लौटने नहीं देना चाहिए। परन्तु मैं क्या दूं? मेरे पास तो देने जैसा कुछ भी नहीं है। वे कहने लगे- बेटी देख! मना मत कर। तेरे पास देने को कुछ भी नहीं है तो ऐसा कर अपने आँगन की धूल ही दे दे। बच्ची ने अपने आँगन में से एक मुट्ठी धूल उठाई और महात्मा जी के भिक्षा पात्र में डाल दी। संन्यासी वह भिक्षा लेकर अपने शिष्य के साथ आगे बढ़ गए। मार्ग में उस शिष्य ने पूछा- गुरुजी! धूल भी कोई भिक्षा है? आपने उस बालिका को धूल देने के लिए कहा ही क्यों?

महात्मा बोले- बेटा! आज यदि उसने नहीं दिया होता तो वह बड़ी होकर भी कभी नहीं दे पाती। धूल दी तो क्या हुआ, देने का संस्कार तो बना। देने का संस्कार होना आवश्यक है, आज धूल दी है कल वह अन्न भी देगी। इस प्रकार उसमें देने का संस्कार तो जगा।

अब शिष्य की समझ में आया कि भिक्षाटन में महत्त्व वस्तु का नहीं, देने के भाव का है। अतः जो कुछ मिल जाय, उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए।

संस्कार की सांस्कृतिक परिभाषा

अब तक हमने संस्कार की मनोवैज्ञानिक परिभाषा जानी। इसमें चित्त पर पड़ने वाली छाप को हमने संस्कार माना। यहाँ हम संस्कार की सांस्कृतिक दृष्टि से परिभाषा क्या है? उसे जानेंगे। भारतीय संस्कृति में गुणों व अवगुणों पर बहुत बल दिया गया है, इसलिए सांस्कृतिक परिभाषा भी गुणों व अवगुणों के सन्दर्भ में दी गई है, जो इस प्रकार है —

दोषापनयनं गुणान्तराधानं संस्कार:।

किसी भी वस्तु या व्यक्ति में दोषों को दूर करना अर्थात् उसमें सुधार करना, उसके गुण बदलना और नये गुणों का निर्माण करना ही संस्कार है। इस परिभाषा में तीन करणीय बातों का समावेश है।

  • जो दोष हैं, उन्हें दूर कर उसका शुद्धिकरण करना।
  • उसके गुणों में परिवर्तन करना अर्थात् उनका अवांछित स्वरूप बदल कर उनको वांछित बनाना।
  • उसमें जो गुण नहीं है, ऐसे अपेक्षित गुण जोड़ना।

संस्कार परिभाषा की व्याख्या

इस परिभाषा को समझने के लिए हम उपर्युक्त तीनों बातों को खाद्य पदार्थों पर लागू करके देखते हैं। हम ग्वारफली की सब्जी बनाते हैं, परन्तु ग्वारफली वायु करती है। इसके वायु दोष को दूर करने के लिए हम इसमें अजवायन का छौंक लगाते हैं। अर्थात् ग्वारफली को अजवायन से संस्कारित करने पर उसका वायु दोष दूर हो जाता है। इसी प्रकार पानी के भारीपन को दूर करने के लिए हम उसे उबालते हैं, उबालने से पानी हल्का हो जाता है। इसे कहते हैं दोषापनयनं।

हम सब यह जानते हैं कि तिल से तेल निकलता है। तिल को ढाणी में पेलकर उसका तेल निकाला जाता है। यह तेल कफ व वात का नाश करता है। परन्तु तिल व गुड़ को मिलाकर जब हम चिक्की बनाते हैं तो यही चिक्की कफवर्धक हो जाती है। इस प्रकार एक ही पदार्थ के गुणों को भिन्न प्रक्रिया करके बदला जा सकता है। इसे कहते हैं, गुणान्तर करना अर्थात् उसके गुणों को बदलना।

हमारी एक बहुत अच्छी परम्परा है। शरद पूर्णिमा की रात्रि में हम खीर बनाकर उसे चाँद की चाँदनी में रखते हैं। ऐसा करने से क्या होता है? खीर के गुण बढ़ जाते हैं। खीर को चाँदनी में रखने से चन्द्रमा के प्रकाश का पित्तशामक और शीतलता का गुण खीर में संक्रांत होने से उसके पित्तशमन के गुणों में वृद्धि हो जाती है। इसे कहते हैं, गुणों का आधान करना। इस प्रकार परिभाषा की तीनों बातें स्पष्ट हो जाती हैं।

विद्यारम्भ का संस्कार

विद्यारम्भ के संस्कार से बालक के दोष दूर होते हैं, उसके गुणों में वांछित परिवर्तन हो जाता है और उसके गुणों को बढ़ाया जाता है। कुछ उदाहरणों से यह बात समझ में आ जाती है।

वीर पुरुषों व वीरांगनाओं की कथाएँ सुनने से बालकों के कायरता व दीनता के दोष दूर हो जाते हैं। इस प्रकार दोषापनयन होता है। जब कोई व्यक्ति दूसरे की हानि ही करता रहे, किन्तु सामने वाला व्यक्ति जानते हुए भी सदा उसका उपकार ही करे तो पहले वाले व्यक्ति के द्वेषभाव का रूपान्तर स्नेह में हो जाता है। इस प्रकार गुणान्तर हो जाता है। विद्यारम्भ संस्कार से बालक में विद्या प्रीति का गुण आता है। इस प्रकार गुण का आधान होता है। इतना मूल्यवान है यह संस्कार।

समाज में संस्कार व्यवस्था

समाज को श्रेष्ठ बनाने के लिए धर्मवेत्ता विद्वान भिन्न-भिन्न प्रकार के शास्त्रों की रचना करते हैं। सबके लिए एक श्रेष्ठ जीवनचर्या निर्धारित करते हैं। इस जीवनचर्या के अनुसार शिक्षा दी जाती है। इस प्रकार समाज के छोटे व बड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए दोषापनयन, गुणान्तर और गुणाधान की व्यवस्था समाज में होती ही है। जैसे- कथा, वार्ता, सत्संग, उपदेश, साहित्य, कृपा, अनुकम्पा, सहायता, सहयोग, सहानुभूति, रक्षण, पोषण, शिक्षण, दण्ड व न्याय आदि से व्यक्ति को संस्कारी बनाने की व्यवस्था अच्छा व श्रेष्ठ समाज करता ही है। समाज में व्यक्ति को संस्कारी बनाने की व्यवस्था होने से व्यक्ति तथा समाज दोनों ही संस्कारवान बनते हैं और परस्पर सहयोग करते हुए अपना-अपना विकास करते हैं।

घर में अनुकरण से संस्कार

जिस घर में सब लोग जल्दी सोते और जल्दी जगते हैं, उस घर के बालकों को जल्दी सोने व जाने की प्रेरणा अपने आप मिल जाती है। अर्थात् उस घर के बालक देख-देख कर सीख जाते हैं।

घर में किशोर अवस्था के पुत्र को सूर्य-नमस्कार करना न आता हो तो पिता स्वयं उसे सूर्य-नमस्कार करके दिखाए, उसे सिखाए और साथ रहकर आग्रह पूर्वक प्रतिदिन करवाए। ऐसा करने से उस किशोर बालक में प्रतिदिन सूर्य-नमस्कार करने का संस्कार बन जाता है।

घर में स्वच्छता, पवित्रता, शान्ति और संस्कारमय वातावरण हो तो घर में आने वाले आगंतुकों को भी अपने घर का वातावरण संस्कारक्षम बनाने की इच्छा होती है, अथवा ऐसा न करने पाने का संकोच होता है। अतः आगंतुक भी अपने घर में ऐसा ही बनाने के प्रेरित होता है।

घर के बालकों को राम-रावण जैसी कथाएँ कहना और यह समझाना कि राम जैसा बनना, रावण जैसा नहीं। ऐसी कथाएँ कहना भी संस्कार करने की एक पद्धति है। अन्यथा टीवी में दिखने वाले अभिनेता व अभिनेत्रियों की नकल करने लग जाते हैं, जिससे उनमें कुसंस्कार ही आते हैं। इस प्रकार कुसंस्कारों से बचाए रखने में भी घर की महती भूमिका है।

कभी-कभी माता-पिता स्वयं अज्ञानवश अपने रोने वाले पुत्र को चुप करवाने के लिए कहते हैं- चुप हो जा! वरना बाबा आकर ले जायेगा। इस प्रकार अनजाने में भय का बीज बोने वाले माता-पिता भी कुसंस्कार ही डालते हैं, जो नहीं होना चाहिए।

इस प्रकार घर में एक प्राकृत बालक संस्कार प्राप्त कर संस्कारी बालक बनता है। अतः व्यक्ति जीवन में सामाजिक व सांस्कृतिक संस्कारों का बड़ा महत्त्व है।

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

और पढ़ें : भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात 41 (मनोवैज्ञानिक सन्दर्भ में संस्कार)

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