भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-12 (करणों का विकास)

-वासुदेव प्रजापति

ज्ञानार्जन के करणों में हमने बहि:करण एवं अन्त:करण को जाना। बहि:करण में कर्मेन्द्रियों व ज्ञानेन्द्रियों के कार्यों को समझा और अन्त:करण में मन, बुद्धि, अहंकार तथा चित्त की शक्तियों से परिचित हुए। इसी क्रम में आज हम इन करणों का विकास कैसे होता है? इसका उत्तर जानने का प्रयत्न करेंगे।

करण अर्थात् साधन, ज्ञानार्जन के करण अर्थात् ज्ञान प्राप्त करने के साधन। ये साधन हमें प्राप्त नहीं करने पड़ते, सबको जन्म से ही मिले हुए हैं। हाँ, इन साधनों का विकास अवश्य करना पड़ता है। साधनों का विकास क्यों करना चाहिए? इसका उत्तर हम सभी जानते हैं कि साधन जितने सक्षम होंगे, वे उतना ही अधिक अच्छा काम कर पायेंगे। यदि साधन अक्षम हुए तो कार्य होगा ही नहीं अथवा खराब होगा। अच्छे कार्य के लिए अच्छे साधन होना अनिवार्य है। अत: साधनों का विकास आवश्यक है। ज्ञानार्जन के इन साधनों के विकास का अर्थ क्या है और यह विकास होता कैसे है? अब इस बिन्दु को समझेंगे।

कर्मेन्द्रियों का विकास

ज्ञानार्जन के सबसे पहले साधन हैं – कर्मेन्द्रियाँ एवं ज्ञानेन्द्रियाँ। कर्मेन्द्रियों का विकास करना अर्थात् उनका बल, कौशल एवं गति बढ़ाना। हाथों व पैरों का बल बढ़ना, हाथों व पैरों की कुशलता बढ़ना तथा हाथों व पैरों के द्वारा काम करने की गति बढ़ाना ही कर्मेन्द्रियों का विकास करना है।

यह विकास क्या करने से होगा? यह जानना आवश्यक है। इस विकास के लिए उस प्रकार की गतिविधियाँ तथा प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी पड़ती है। बल बढ़ता है सात्विक आहार लेने से, बल बढ़ता है पर्याप्त निद्रा लेने से, बल बढ़ता है प्रतिदिन व्यायाम करने से। तथा कौशल बढ़ता है किसी भी क्रिया के छोटे से छोटे भाग को सही पद्धति से करने के आग्रह से। और गति बढ़ति है प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक निरन्तर अभ्यास करने से। इनमें से कुछ कार्य विद्यालय में सिखाने व प्रेरणा देने के हैं, और कुछ कार्य प्रत्यक्ष घर में करने के हैं। अत: जब विद्यालय तथा घर दोनों मिलकर प्रयत्न करते हैं तो निश्चय ही कर्मेन्द्रियों का विकास होता है ।

ज्ञानेन्द्रियों का विकास

ज्ञानेन्द्रियों का विकास होता है, अनुभवों की विविधता से और नाड़ी-शुद्धि से। यदि अनुभवों की दुनिया का सम्पर्क ही नहीं होगा तो अनुभव नहीं मिलेंगे व संवेदन नहीं जगेंगे। संवेदनों के वहन का मार्ग नाड़ीतंत्र है। यदि नाड़ीतंत्र ही शुद्ध नहीं होगा तो संवेदन सही स्वरूप में ग्रहण नहीं हो सकेंगे। प्रतिदिन नाड़ीशुद्धि प्राणायाम से यह विकास होता है। अत: विद्यालय में नाड़ी शुद्धि प्राणायाम सिखाना व करवाना यह पहला काम है।

मन का विकास

ज्ञानार्जन के साधनों में मन एक महत्त्वपूर्ण साधन है। मन बड़ा चंचल है, मन की चंचलता का अर्थ है कि वह हमेशा इधर-उधर भागता ही रहता है, कभी एक स्थान पर टिकता नहीं है। ऐसे चंचल मन के विकास का अर्थ है मन को एकाग्र करना, मन को शान्त करना, मन को अनासक्त बनाना, मन को विकारों से मुक्त करना तथा सद्गुणों से युक्त करना।

ये सब बातें क्या करने से होंगी?  ये सब बातें ध्यान करने से, सेवा करने से तथा  सत्संग से होती है। स्नेह, दया तथा सद्भाव जैसे सद्व्यवहार से होती है। संगीत मन को शान्त करने का सबसे उत्तम साधन है। जिस शिक्षा में ये सब बातें होतीं हैं वहाँ के विद्यार्थियों के मन सम्यक् विचारवान तथा सद्भावना रखने वाले होते हैं। मन बुद्धि के कहे अनुसार चलने वाला बनता है। अविकसित मन व्यक्ति को पतन की ओर ले जाता है, जबकि विकसित मन व्यक्ति को बुलंदियों के शिखर पर पहुँचाता है।

बुद्धि का विकास

बुद्धि विकसित होती है, अपनी शक्तियों के विकास से। उसकी शक्तियाँ हैं – निरीक्षण व परीक्षण, संश्लेषण व विश्लेषण, तर्क व अनुमान। इन शक्तियों को जब अधिकाधिक अवसर मिलते हैं तो ये विकसित होती हैं। किन्तु हम तो इन शक्तियों को अवसर न देकर आधुनिक यंत्रों कम्प्यूटर व केलकुलेटर का उपयोग कर अपना काम सरलता से साध तो लेते हैं परन्तु ऐसा करने से हमारी बुद्धि का विकास नहीं हो पाता, फलस्वरूप हम इन यंत्रों पर पूर्णरूप से निर्भर हो जाते हैं। जबकि विकसित बुद्धि वालों को सामान्य कार्यों के लिए यन्त्रों की आवश्यकता ही नहीं होती।

अहंकार का विकास

अहंकार बुद्धि के द्वारा प्राप्त यथार्थ ज्ञान को कर्ता भाव से ग्रहण करता है। ऐसे अहंकार का विकास करना अर्थात् उसके कर्तापन का, ज्ञातापन का तथा भोक्तापन का विकास करना है। यह विकास उसमें दायित्व के बोध से होता है। विद्यार्थियों को विद्यालय के छोटे-छोटे कार्यों को स्वतंत्र बुद्धि से करने के अवसर देकर तथा घर में भी उसके करने योग्य काम करवाने से उसमें दायित्व बोध आता है। ऐसा न होने की स्थिति में बालक का एक ही उत्तर होता है, मैं क्यों करूँ? जबकि दायित्व बोध वाला बालक कहता है, यह काम मैं करूँगा। यही अहंकार का विकास है।

चित्त का विकास

चित्त का विकास करने का अर्थ है चित्त को निर्मल करना। चित्त निर्मल होता है, सात्त्विक आहार से। हमारे शास्त्र कहते हैं- “आहार शुद्धौ सत्त्वशुद्धि।” सात्त्विक आहार से सत्त्व की शुद्धि होती है। चित्त शुद्धि होती है ईशभक्ति से, राष्ट्रभक्ति से एवं मातृभक्ति से। चित्त का विकास होता है पूर्व के सभी साधनों का विकास होने से। मन के सद्गुणी व सद्भावी होने से, बुद्धि के सदबुद्धि व विवेकी होने से तथा अहंकार के दायित्ववान होने से भी चित्त का विकास होता है।

जब सब साधनों का सम्यक् विकास हो जाता है तो वह व्यक्ति विलक्षण सामर्थ्य का धनी बन जाता है। आओ! हम ऐसे विलक्षण प्रतिभा के दर्शन इस पौराणिक कथा में करते हैं।

विलक्षण प्रतिभा के धनी

यह कथा महाभारत कालीन है और महर्षि वेदव्यास से जुड़ी हुई है। भारतीय साहित्य में इनका महत्वपूर्ण योगदान है। व्यासजी ने वेदों का संकलन किया, ब्रह्मसूत्र की रचना की, पुराण लिखे, इतना करने पर भी जब मन नहीं भरा तब उन्होंने एक लाख श्लोकों का बृहद् ग्रंथ महाभारत लिखने का निश्चय किया। उस समय तक व्यासजी वृद्ध हो चुके थे। उनके लिए इतना बड़ा ग्रंथ लिखना कठिन था। इसलिए उन्होंने लिपि के देवता श्रीगणेश जी से यह ग्रंथ लिखवाना तय किया।

व्यासजी ने गणेशजी के सामने प्रस्ताव रखा। गणेशजी ने ऐसे महान ग्रंथ का लेखक बनना तो स्वीकार किया किन्तु अपनी एक शर्त रखी। मैं जब लिखना प्रारम्भ करूँगा तब लगातार लिखता रहूँगा, बीच में रुकूँगा नहीं। इसलिए आपको लगातार बोलते रहना होगा। व्यासजी ने गणेशजी से कहा मुझे आपकी शर्त स्वीकार है, परन्तु आपको भी मेरी शर्त माननी होगी। मैं जो बोलूँगा आप उसे समझे बिना नहीं लिखेंगे।

दोनों ने एक दूसरे की शर्तें मान ली। ग्रंथ लेखन प्रारम्भ हुआ। व्यासजी संस्कृत में श्लोक बोलते, गणेशजी उस श्लोक का अर्थ समझते फिर लिखते। गणेशजी अर्थ समझ कर लिखते तब तक व्यासजी नया श्लोक रच लेते। इस प्रकार एक लाख श्लोकों वाला ग्रंथ महाभारत रचा गया।

इतना कठिन कार्य इतनी सरलता से कैसे पूर्ण हो गया? बड़ा सीधा सा उत्तर है। व्यासजी व गणेशजी दोनों के ज्ञानार्जन के साधन पूर्ण विकसित थे। एक को नया-नया सूझता था और दूसरे को तुरन्त समझ में आता था। परिणाम स्वरूप दोनों की इस युगल बंदी ने, “न भूतो न भविष्यति” जैसा महान कार्य सम्पन्न कर लिया। इसलिए महाभारत ग्रंथ के सम्बन्ध में कहा गया है –

“धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतवर्षभ।

“यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्।।”

अर्थात् धर्म,अर्थ,काम व मोक्ष के विषय में जो इस ग्रंथ में है, वही अन्यत्र भी है, और जो यहाँ नहीं है वह कहीं नहीं है।

हमारी गुरुकुल शिक्षा व्यवस्था में सोलह वर्ष तक की शिक्षा केवल ज्ञानार्जन के साधनों का विकास करने के लिए होती थी। बाद की शिक्षा इन विकसित साधनों के द्वारा कठिनतम विषयों के ज्ञान को प्राप्त करने के लिए होती थी। आज हमें इसी शिक्षा की आवश्यकता है।

और पढ़े : भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-11 (ज्ञानार्जन के साधन : चित्त)

(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

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