विद्यालयीन शिक्षा के संदर्भ में राष्ट्रीय शिक्षा नीति को धरातल पर उतारने की चुनौती


 – पिंकेश लता रघुवंशी

बहुप्रतीक्षित राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 की भारत सरकार द्वारा घोषणा व स्वीकृति पश्चात देश व समाज में इस विषय को लेकर विमर्श का वातावरण बनना स्वभाविक है। इसके साथ ही नीति के समर्थन व विरोध में अनेक स्वर भी सुनाई देने लगे हैं। इस शिक्षा नीति में वैश्विक शिक्षा पद्धतियों के समानांतर व राष्ट्रीय हितों को समाहित किये हुये परिवर्तन स्वागत योग्य हैं, विशेषकर विद्यालयीन शिक्षा के संदर्भ में। यह “राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतवर्ष की तीसरी इस प्रकार की शिक्षा नीति है जो पुरानी शिक्षा नीतियों के गुणदोषों की समीक्षा के साथसाथ अपना दृष्टिकोण लेकर आई है। जहाँ अनेक संभावनाएं भी हैं और संशय के कारण भी। अतः पूर्व की योजनाओं और आयोगों के विषय में जानना भी आवश्यक है। भारत में पहला शिक्षा आयोग “विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग”  नाम से डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में सन् 1948 में गठित हुआ, इसके पश्चात 1952 में “मुदलियार आयोग”  और 1964-66  में डॉ दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में विद्यालयीन शिक्षा में अनेक क्रांतिकारी कदमों की सिफारिशों के साथ “राष्ट्रीय शिक्षा आयोग” का गठन हुआ। वर्ष 1985 में “शिक्षा की चुनौती” नाम से एक रिपोर्ट तैयार की गयी जिसमें भारत के बौद्धिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, प्रशासनिक एवं व्यावसायिक वर्गों ने अपने सुझाव दिये थे, और तब 1986 में तत्कालीन भारत सरकार ने “नयी शिक्षा नीति1986” का प्रारूप तैयार किया था। 1992 में फिर इस नीति में आंशिक बदलाव किये गये।

वर्तमान सरकार ने अपने घोषणा पत्र के अनुरूप 2017 में सेवानिवृत्त इसरो वैज्ञानिक के. कस्तूरीरंगन जी की अध्यक्षता में नयी शिक्षा नीति या राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रारूप बनाने समिति का गठन किया गया।

21 जुलाई 2020 को केंद्र सरकार ने इस नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति को स्वीकृति प्रदान की। इस नीति ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नाम को अब शिक्षा विभाग में बदल दिया है।

इस नीति को धरातल पर लाने में संभावित समस्याएं एवं प्रश्न-

०1-  क्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 नयी सदी की चुनौतियों का सामना करने में समर्थ होगी ?

०2  शिक्षा नीति की सभी अनुशंसायें सराहनीय और स्वागतयोग्य हैं, किंतु क्या ये धरातल पर संभव हो पायेंगी ?

०3क्या समूचे समाज की आंकाक्षाओं, आग्रहों और सोच को यह शिक्षा नीति संतुष्ट कर पाएगी, क्योंकि व्यावहारिक आवश्यकताओं और शिक्षा नीति के सैद्धांतिक बिंदुओं को पालन करना, इसमें बहुत बड़ा अंतर है।

०4शिक्षा नीति का महत्वपूर्ण बिन्दू है प्राथमिक स्तर पर भारतीय भाषाओं /मातृभाषा में शिक्षा देना किंतु पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार शिक्षा के निजीकरण व व्यवसायीकरण से अंग्रेजी के प्रति समाज का जो आग्रह देखा गया है क्या ऐसे वातावरण में शिक्षा प्रणाली में भारतीय भाषाओँ / मातृभाषा में शिक्षा संभव हो पायेगी ?

०5अल्पसंख्यक विद्यालयों में मदरसों को छोडकर अन्य अल्पसंख्यक विद्यालयों अर्थात मिशनरीज स्कूलों में बहुसंख्यक विद्यार्थियों के प्रवेश पर कोई रोक या नियम बनेंगे ? यदि नहीं तो फिर मातृभाषा में अध्ययन का क्या विधान होगा ?

०6–  त्रिभाषा नियम किस प्रकार लागू होगा ? उदाहरण तमिलनाडु त्रिभाषा नियम को स्वीकार करने तैयार नहीं, वहाँ केवल तमिल और अंग्रेजी दो ही भाषाओं को लागू करना चाहते हैं। विरोध के स्वर अन्य राज्यों से भी उठ सकते हैं।

०7–  कक्षा छः के पूर्व छात्रों को रचनात्मक क्रियाकलापों से जोड़ा जायेगा और कक्षा छः के बाद व्यावसायिक गतिविधियों से तो क्या यह संभव है? क्या कक्षा छः की आयु वाले विद्यार्थी में इतना बौद्धिक सामर्थ्य होगा ?

०8 क्या कक्षा छः के अध्ययनरत ग्रामीण विद्यार्थियों के लिये संसाधन और प्रशिक्षण की व्यवस्था हो पायेगी ? क्या सभी विद्यालयों में मनचाहे विषय पढाने वाले शिक्षक होंगे ?

०9. क्या निजी एवं शासकीय विद्यालयों के छात्रों में अमीरी- गरीबी के भेद को पाटना संभव होगा?

10–  क्या निजीकरण के इस समय में माता-पिता अंग्रेजी के मोह को त्याग मातृभाषा में अपने पाल्यों को पढाने के लिये तैयार होंगे ?

इन शंकाओं के समाधान व अपेक्षित परिणामों हेतु नीतियां

01– राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में शिक्षा अंतिम छात्र तक उपलब्ध हो, समानता एवं गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा सभी के लिये सहज व सुलभ हो व छात्रों में उत्तरदायित्व का विकास करे इस हेतु प्राथमिक शिक्षा को दो स्तरों में विभाजित किया गया है-

  • 3 वर्ष से 6 वर्ष की आयु के बच्चों के लिये आँगनवाड़ी/बालवाटिका/शिशुवाटिका के माध्यम से निःशुल्क, सुरक्षित व गुणवत्ता पूर्ण प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा अर्थात Early childhood care and Education.- ECCE की उपलब्धता सुनिश्चित होगी।
  • विद्यालयों में अभी तक की शिक्षण पद्धति के अनुसार बच्चों की शिक्षा कक्षा एक से आरंभ होती है वहीं अब तीन वर्ष के प्री- प्रायमरी अर्थात विद्यालय पूर्व शिक्षा के बाद कक्षा तीन से पांच तक सम्मिलित हैं। तत्पश्चात कक्षा 6 से 8 तक की माध्यमिक शिक्षा और चतुर्थ श्रेणी के रुप में कक्षा 9 से 12 तक चार वर्ष की शिक्षा होगी। जहाँ पहले कक्षा 11 में विषय चुने जाते थे अब कक्षा 9 में ही चयन कर सकेंगे।
  • कक्षा 6 से ही शैक्षिक पाठ्यक्रम में व्यावसायिक शिक्षा को सम्मिलित किया जायेगा और इसमें इन्टर्नशिप की व्यवस्था भी दी जायेगी जिससे छात्र सभी व्यवसायों व कामों के प्रति सम्मान का भाव रख सकेंगे।
  • महत्वपूर्ण परिवर्तन यह है कि अब पांचवीं तक के शिक्षण का माध्यम मातृभाषा, स्थानीय भाषा अथवा क्षैत्रीय भाषा होगी।

अब इन लक्ष्यों की प्राप्ति कैसे संभव है–  

०1सन् 2025 तक सभी प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा 3 तक के सभी छात्रों के लिये बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान पर एक राष्ट्रीय मिशन  National Mission on Foundation Literacy and Numeracy की स्थापना अपेक्षित है।

०2– NCERT राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान प्रशिक्षण परिषद द्वारा विद्यालयीन शिक्षा हेतु राष्ट्रीय पाठ्यक्रम योजना NCFSE तैयार की जायेगी। जिसमें छात्रों में कौशल विकास हेतु अनुभव आधारित शिक्षण के साथ तार्किक चिंतन को प्रोत्साहन और पाठ्यक्रम के बोझ को कम करते हुए कला, विज्ञान, व्यावसायिक एवं शैक्षणिक विषयों और पाठ्यक्रम व पाठ्येत्तर गतिविधियों के मध्य समन्वय रहेगा। प्रौढ़ शिक्षा में गुणवत्ता एवं तकनीकी आधारित विकल्पों को सम्मिलित किया जायेगा। जैसे कि नये ऐप्स का निर्माण, ऑनलाइन पाठ्यक्रम अथवा माड्यूल्स, सेटेलाईट आधारित टीवी चैनल्स, आनलाइन पुस्तकें व पुस्तकालय, प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र को विकसित किया जायेगा। त्रि-भाषा फार्मूला रहेगा। संस्कृत और अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं का विकल्प भी होगा परंतु विद्यार्थियों पर कोई भी भाषा थोपी नहीं जाएगी।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार कक्षा तीन, पांच व आठ में भी परीक्षाएं होंगी। कक्षा 10 एवं 12 की बोर्ड परीक्षाओं को वर्ष में दो बार आयोजित करवाना अथवा परीक्षाओं को दो भागों में बांटकर वस्तुनिष्ठ एवं व्याख्यात्मक आयोजित करने का सुझाव है। परीक्षाओं का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों का ज्ञान परीक्षण होगा। जिससे विद्यार्थियों में रटने की प्रवृति समाप्त होगी और योग्यता व वास्तविक क्षमता का परीक्षण किया जायेगा। सबसे अच्छा अनुभव अधिक अंकों की होड़ का दबाव हटेगा और भविष्य में माता- पिता कोचिंग संस्थानों के चंगुलों व चक्करों से मुक्ति पा सकेंगे।

NIOS  द्वारा उच्चतर शिक्षा कार्यक्रम जो कक्षा 10 और 12 के समकक्ष होंगे, व्यावसायिक शिक्षा पाठ्यक्रम, प्रौढ-शिक्षा और समृद्ध जीवन कार्यक्रम भी चयन हेतु उपलब्ध होंगे। NCERT एक विद्यालय पूर्व शिक्षा हेतु पाठ्यक्रम एवं शिक्षण विधि खाका NCPFECCE तैयार करेगा, जो आठ वर्ष तक बच्चों की शिक्षा के लिये होगा। वर्तमान समय की आवश्यकता व अनिवार्यता को देखते हुये कक्षा ६ से ही छात्रों को कोडिंग भी सिखाई जायेगी। स्थानीय स्तर पर लोक कला, ऐतिहासिक ज्ञान व भौगोलिक जानकारियों के लिये स्थानीय जानकार तथा विषय विशेषज्ञों को अनुबंध पर लिया जा सकता है। कला एवं संगीत को पाठ्यक्रम में सम्मिलित कर प्रोत्साहन दिया जायेगा। -पाठ्यक्रम को बढ़ावा देने के लिये राष्ट्रीय शैक्षिक टेक्नोलॉजी फोरम का गठन किया गया है जिसके लिये वर्चुअल लैब तैयार की जा रही हैं।

मौलिक साक्षरता एवं संख्यात्मकता पर शिक्षा मंत्रालय राष्ट्रीय मिशन तैयार किया जायेगा, जिसमें छात्र के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य और पोषण का भी ध्यान रखा जायेगा। छात्र के लिये पौष्टिक भोजन एवं नियमित स्वास्थ्य परीक्षण की व्यवस्था रहेगी। विद्यार्थियों को स्वास्थ्य कार्ड दिये जायेंगें जिससे उनके स्वास्थ्य की निगरानी रखी जा सके। पूर्व प्राथमिक शिक्षा एवं शैक्षिक पाठ्यक्रम ECCEC  की योजना व क्रियान्वयन की समीक्षा शिक्षा मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग और जनजातीय मामलों के विभाग मिलकर करेंगें। सभी विद्यालयों में छात्र-शिक्षक अनुपात दो प्रकार से लागू होगा। संपन्न क्षेत्रों में ३०:०१ और सामाजिक-आर्थिक रुप से पिछड़े क्षेत्रों के विद्यालयों में यह अनुपात 25:01 का होगा।

शिक्षा नीति में राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद NCTE को शिक्षकों के लिये 2022 तक एक समान मानक तैयार करने के लिये कहा है। ये मानक शिक्षको के लिये National Professional Standard for Teachers कहलायेंगे। यह कार्य सामान्य शिक्षा परिषद के निर्देशन में पूरा होगा। इसी प्रकार शिक्षकों के लिये बी.एड. पाठ्यक्रम हेतु नये मापदंड होंगे। वर्ष 2030 तक सभी बहुआयामी महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पठन-पाठन के पाठ्यक्रमों को संस्थानों के अनुरूप अद्यतन करना होगा। वर्ष 2030 तक शिक्षकों के लिये न्यूनतम अहर्ता बी.एड. होगी, जिसकी अवथि चार वर्ष हो जायेगी। साथ ही बी.एड. की दो वर्ष की डिग्री उन स्नातक छात्रों को मिलेगी जिन्होंने किसी विशेष विषय में चार वर्ष अध्ययन किया हो।

शिक्षा शास्त्र की समस्त विधियों को सम्मिलित करते हुये नये बी.एड. कोर्स का पाठ्यक्रम तैयार किया जायेगा। जिसमें साक्षरता, संख्यात्मक ज्ञान, बहुस्तरीय अध्ययन एवं मूल्यांकन को विशेष रूप से सिखाया जायेगा। इसके अलावा शिक्षण विधि में तकनीकी को विशेष रुप से जोडा जायेगा। अयोग्य शिक्षक हटाये जायेंगे, स्तरहीन विद्यालय बंद किये जायेंगें। पूरे देश में एक जैसे शिक्षक और एक जैसी शिक्षा को आधार बनाकर इस समिति की अनुशंसाओं को लागू किया गया है।

सारांश यह है कि हर स्तर पर अनुभव से सीखने की पद्धति को सम्मिलित किया गया है। अर्थात मात्र पुस्तकीय ज्ञान के बजाय उसे करके सीखना या परंपरागत पद्धतियों के स्थान पर रोचक व नवाचारित प्रयोगों द्वारा पढाया जायेगा – जैसे कथा एवं कहानियों के माध्यम से, खेलों के द्वारा सीखने की कला द्वारा आदि। पढ़ाने और सीखने के तरीके को और अधिक चर्चात्मक बनाने, पाठ्यक्रम में नवाचार, मौलिक सिद्धांत समझने , समस्याओं के समाधान खोजने वाले दृष्टिकोण को महत्व दिया जायेगा। साथ ही पाठ्यक्रम के कंटेट को इस प्रकार कम किया जायेगा जिससे विषय के मूल तत्वों पर प्रभाव न पड़े और उसमें आलोचनात्मक चिंतन को भी सम्मिलित किया जा सके। इसके साथ ही अन्वेषण, अनुसंधान, परिचर्चा व विश्लेषण आधारित सीखने को महत्व दिया जायेगा।

छात्रों को 360 डिग्री होलिस्टिक रिपोर्ट कार्ड अर्थात छात्र का समग्र विकास या सर्वांगीण विकास अंकसूची दी जायेगी। जिसमें  छात्रों के सभी  विषयों के अंकों के साथ ही दूसरे कौशल व उसके अन्य व्यावहारिक बिंदुओं को स्थान दिया जायेगा। अर्थात नयी अंक सूची में मात्र विषयों के अंक ही नहीं, बल्कि छात्र के व्यावहारिक पक्ष को भी इंगित किया जायेगा। शिक्षा मंत्रालय एक व्यावसायिक शिक्षा की एकीकृत अध्ययन समिति NCIVE का गठन करेगी जिससे व्यावसायिक ज्ञान को अधिकतम विद्यार्थियों तक पंहुचाया जा सके। इस पाठ्यक्रम को लोकविद्या नाम दिया गया है। वर्तमान समय में ऑनलाइन शिक्षा और बढ़ते हुये ई-कंटेट की लोकप्रियता व उपयोगिता को देखते हुये अब ई-कंटेट केवल हिंदी अथवा अंग्रेजी भाषा में ही नही अपितु क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध होंगे।

इस शिक्षा नीति से शिक्षा प्रणाली में बड़े बहुआयामी एवं दूरदर्शी परिवर्तन होने वाले हैं। इस नीति में व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल विकास को महत्व दिया गया है जिससे छात्र पूर्ण रूपेण आत्मनिर्भर हो सकें। प्रत्येक विद्यार्थी को सेवा एवं स्वरोजगार के लिये पूर्ण प्रशिक्षण का भी प्रावधान है जिससे भविष्य में बेरोजगारी कम हो सके। विद्यालय पूर्व शिक्षा ECCE शिक्षकों के आरंभिक शिक्षक तैयार करने के लिये आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को NCERT पाठ्यक्रम के अनुसार प्रशिक्षण दिया जायेगा। आर्थिक विरोधाभास तथा संसाधनों की कमी का जो विषय आ रहा है उस हेतु शिक्षा के लिये कुल जी.डी.पी. का छः प्रतिशत व्यय करने का लक्ष्य तय किया गया है अतः कोई आर्थिक समस्या नहीं आयेगी।

शिक्षकों की भूमिका और अधिक प्रभावी हो, शिक्षण एक सम्मानित एवं आदर्श का विषय बने और शासन शिक्षकों के महत्व और योग्यता को समझे, इस हेतु शिक्षकों को भी अन्य शासकीय सेवाओं से अपने कार्य और जिम्मेदारी को अलग समझना होगा। क्योंकि इस शिक्षा नीति में अयोग्य शिक्षकों को निकालने का भी एक विषय आया है, हालांकि वो कितना व्यावहारिक होगा यह कहा नहीं जा सकता। संभवतः ऐसा करने पर शासकीय संस्थानों को न्यायालयीन प्रक्रियाओं का सामना करना पड़े। स्तरहीन विद्यालय बंद करने की व्यवस्था भी राजनैतिक विरोध का विषय बन सकती है अतः इस शिक्षा नीति के सुझावों को लागू करने में राज्य व केन्द्र दोनों ओर के प्रयासों की ही आवश्यकता होगी।

इस शिक्षा नीति में ऐसे अनेक सकारात्मक एवं क्रांतिकारी सुझाव हैं जो भारत की शिक्षा व्यवस्था की दशा और दिशा बदलकर नये मानक स्थापित करने में सहायक होंगे। अतः हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का स्वागत अधिक और विरोध आंशिक है। कुछ शंकाओं का समाधान समय के साथ ही होगा। बस इसकी सफलता केवल शासन, प्रशासन व नीति निर्धारकों के प्रयास द्वारा ही सम्भव नहीं, बल्कि शिक्षकों, अभिभावकों, छात्रों व समाज के समेकित प्रयास ही हमारी इस विश्व स्तरीय शिक्षा नीति को सफल करने के लिये आवश्यक हैं।

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