पाती बिटिया के नाम-13 (‘नेताजी’ शब्द गाली नहीं)


 – डॉ विकास दवे

प्रिय बिटिया!

कुछ समय पूर्व की बात है। दो भैया आपस में लड़कर अपनी शिकायत लेकर मेरे पास आए थे। दोनों का पक्ष सुना और सुनकर बहुत हँसा, क्योंकि दोनों के बीच लड़ाई का कारण था एक भैया द्वारा दूसरे को ‘नेताजी’ कहकर चिढ़ाना। सोचकर आश्चर्य भी हुआ कि क्या ये लोग इस शब्द से इतनी चिढ़ रखते हैं? शायद यह आजकल के राजनेताओं के कारण हुआ हो। किन्तु आज हम एक ऐसे व्यक्तित्व का स्मरण करने जा रहे हैं जिसने सही अर्थों में इस ‘नेताजी’ शब्द को इसकी गरिमा प्रदान की थी।

हाँ! तुम्हारा अन्दाजा बिल्कुल सही है मैं चर्चा कर रहा हूँ हम सभी के आदर्श एवं हमारे देश के स्वतन्त्रता के युद्ध के सेनापति – ‘नेताजी सुभाष चन्द्र बोस’ की। एक सामान्य से परिवार में जन्मे सुभाष का बचपन भी आप लोगों की तरह ही खेलने पढ़ने में निकला। किन्तु दृढ़ इरादों के रहते यह बालक उस जमाने की सबसे कठिन परीक्षा आई. सी. एस. को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने वाले युवक के रूप में सामने आया। उस जमाने में जबकि आय. सी. एस. उत्तीर्ण करने के बाद सारा जीवन एशो आराम के साथ बिताया जा सकता था। सुभाष ने उस विदेशी शिक्षा और विदेशी उपाधि को ठुकराकर स्वदेश प्रेम का एक ज्वलन्त उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत किया।

धीरे-धीरे यही युवक समाज सेवा से राजनीति का सफर तय करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष के पद तक पहुँचा। उस समय के सभी ताकतवर नेताओं के विरोध के बावजूद भी वे लगातार आगे बढ़ते रहे। अन्तत: उग्र विचारों के धनी श्री बोस को अपने ही राष्ट्र की सेवा तथा माँ भारती की स्वतन्त्रता की चाह की वजह से अपने देश से दूर विदेशों की धरती पर अपने ही जैसे हजारों नौजवानों का एक संगठन ‘आजाद हिन्द फौज’ के रूप में खड़ा करना पड़ा।

तुम बहिनों को – जो कि हर बात में यह कहकर पीछे हट जाती हो कि ‘हम क्या कर सकते हैं?’ यह जानकर आश्चर्य होगा कि उस काल में माँ भारती की पुकार पर बहनों ने भी ‘रानी झाँसी रेजीमेन्ट’ बनाकर नेताजी के राष्ट्रसेवा के पुनीत कार्य में हाथ बंटाया था। आजकल हमारे अधिकांश विद्यालयों में एनसीसी के रूप में सैनिक शिक्षा प्रारंभ हो चुकी है। सैनिक शिक्षा के इस कालांश में आज फिर आप एक नई ‘आजाद हिन्द फौज’ की तैयारी कर रहे हैं जो इस राष्ट्र की बाहर और अन्दर के शत्रुओं से रक्षा कर सकेगी।

अफसोस है कि राष्ट्र का यह सेवक चुपचाप एक ऐसी यात्रा पर चल दिया जहाँ से फिर कभी लौटा नहीं। उनकी मृत्यु की प्रामाणिकता को लेकर आज भी बहस जारी है। हमें तो बस यही ध्यान रखना है कि यदि वे इस पृथ्वी पर थे तब भी और नहीं है तब भी, आप सभी से यह आशा लगाए हुए हैं कि आप ही उनके स्वप्रों को साकार करेंगे। हम प्रण करें कि शिक्षा हो या कोई अन्य क्षेत्र ‘स्वदेशी से करेंगे प्यार, विदेशी से हमें इनकार।‘ और हाँ मन लगाकर सैनिक शिक्षा ग्रहण करेंगे और गर्व के साथ ‘नेताजी’ बनने का प्रयास करेंगे। और हाँ इस शब्द से चिढ़ोगी तो नहीं ना अब?

-तुम्हारे पापा

(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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