भारतीय शिक्षा – ज्ञान की बात-6 (ज्ञानार्जन के साधन: ज्ञानेन्द्रियाँ)


– वासुदेव प्रजापति

कमेंन्द्रियाँ के समान ही ज्ञानेन्द्रियाँ भी बहिःकरण हैं। अर्थात् ज्ञानेन्द्रियाँ भी ज्ञानार्जन के बाहरी साधन हैं। इनके नाम से ही स्पष्ट है कि ज्ञान प्राप्त करने वाली इन्द्रियों को हम ज्ञानेन्द्रियाँ कहते हैं। ये पाँच हैं और पांचों ही ज्ञानेन्द्रियों की ज्ञानार्जन में अपनी-अपनी भूमिका है। आँख, कान, नाक, जिह्वा, और त्वचा ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। हम इन सबसे भली-भाँति परिचित हैं, फिर भी ज्ञानार्जन में इनकी क्या भूमिका हैं? यहाँ इसका विचार करेंगे।

आँख : आँख का काम है दर्शन करना अर्थात् देखना। काम के आधार पर इसे दर्शनेन्द्रिय भी कहते हैं। आँख दर्शनेन्द्रिय है, दर्शनेन्द्रिय देखने का काम करती है। आँख से हम किसी भी वस्तु या व्यक्ति का रूप, रंग और आकार देखते हैं। बड़ी वस्तु को देखते हैं, तो छोटी वस्तु को भी देखते हैं। निकट में देखते हैं तो दूर भी देखते हैं। आँख ही वह साधन है, जिसकी सहायता से हम देखकर ज्ञान प्राप्त करते हैं। यदि आखें नहीं हो तो हमें कुछ भी दिखाई नहीं देगा। अर्थात् देखकर प्राप्त होने वाले ज्ञान से हम वंचित रह जायेंगे। इसलिए आँखें हमारे लिए अत्यधिक उपयोगी साधन है।

कान : कान से हम श्रवण करते हैं अर्थात् सुनते हैं। जिस इन्द्रिय से श्रवण होता है, उसे श्रवणेन्द्रिय कहते हैं। कानों से हम अनेक प्रकार की आवाजें सुनते हैं। इन कानों से ही हमें ज्ञान होता है कि सुनाई देने वाली आवाज कर्कश है या मधुर, आवाज धीमी है अथवा तेज, आवाज दूर है या निकट, आवाज में भय है या निडरता, आवाज में व्यंग्य है अथवा प्रेम, आवाज में आदर है या तिरस्कार। सुनने से जो कुछ भी ज्ञान होता है, उसका साधन ये कान ही हैं।

नाक : नाक का काम सूँघना है। नाक को घ्रोणेन्द्रिय भी कहते हैं। गन्ध का ज्ञान नाक से होता है। नाक ही हमें बतलाता है कि यह गन्ध कैसी है? दुर्गन्ध है या सुगन्ध है गन्ध तेज है या धीमी है, गन्ध अमुक स्थान पर ही है या सर्वत्र है। अमुक पुष्प की गन्ध ऐसी है तो दूसरे की वैसी है। सभी मिठाइयों का स्वाद तो मीठा है, परन्तु उनकी गन्ध अलग-अलग है। आम की गंध अलग है तो अनानास की गंध अलग है। गन्ध से प्राप्त होने वाला ज्ञान हमें नाक से मिलता है। इसलिए नाक भी ज्ञानार्जन का बहिःकरण है।

जिह्वा : जिह्वा को रसना भी कहते हैं। जीभ रस ग्रहण करती है, इसलिए वह रसना कहलाती है। रस ग्रहण करने के लिए हिन्दी में शब्द है स्वाद। स्वाद ग्रहण करने वाली इन्द्रिय स्वादेन्द्रिय कहलाती है। जीभ से ही हम जानते हैं कि किसका स्वाद कैसा है? जिह्वा हमें बतलाती है कि केला मीठा है, नीबू खट्टा है, मिर्ची तीखी है, करेला कड़वा है, आँवला कसैला है, खीरा फीका है, इत्यादि। यदि जीभ न हो तो हम इन षडरसों से अनभिज्ञ ही रह जायेंगे। इस तरह स्वाद से हाने वाला ज्ञान हमें जिह्वा से प्राप्त होता है, इसलिए जिह्वा भी ज्ञानार्जन का एक साधन है।

त्वचा : त्वचा अर्थात् चमड़ी। हमारे पूरे शरीर की बाहरी सतह त्वचा है। त्वचा में स्पर्श का गुण है। इसलिए त्वचा को स्पर्शेन्द्रिय भी कहते हैं। त्वचा स्पर्श करके हमें बतला देती है कि यह वस्तु कठोर है और यह मुलायम है। यह चिकनी है और यह खुरदरी है। यह उबड़-खाबड़ है और यह समतल है। इसकी धार तीखी है और मोटी है। यह स्पर्श प्यार भरा है और यह द्वेष भरा है, यह स्पर्श अपनों का है अथवा यह परायों का है। स्पर्श से होने वाला सारा ज्ञान त्वचा से होता है, इसलिए त्वचा भी ज्ञानार्जन का बाहरी साधन है।

“ज्ञानेन्द्रियाँ और ज्ञानार्जन : हमने ज्ञानेन्द्रियों के कार्यों को जाना। सबके कार्य भिन्न-भिन्न हैं। आँखे देखती हैं, कान सुनते हैं, नाक सूँघता है, जीभ स्वाद लेती है और त्वचा स्पर्श से ज्ञान प्राप्त करती है। देखने से, सुनने से, सूंघने से, स्वाद लेने से और स्पर्श करने से जो ज्ञान प्राप्त होता है, वही ज्ञानेन्द्रियाँ से प्राप्त ज्ञान हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने कार्यों से अनुभव प्राप्त करती हैं। इसलिए ज्ञानेन्द्रिय जनित ज्ञान अनुभवात्मक ज्ञान कहलाता है। क्रिया के पश्चात् अनुभव यह ज्ञानार्जन प्रक्रिया की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। अतः बाल्यवस्था की शिक्षा क्रिया आधारित एवं अनुभव आधारित होनी चाहिए।

ज्ञानेन्द्रियाँ है तो दुनियाँ है : यह दुनियाँ पंच महाभूतों से मिलकर बनी हुई हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पंच महाभूत हैं। इन पाँचों महाभूतों के अपने-अपने विषय हैं। पृथ्वी का विषय गन्ध है, जल का विषय रस है, अग्नि का विषय रूप है, वायु का विषय स्पर्श है और आकाश का विषय शब्द है। ज्ञानेन्द्रियाँ पंचमहाभूतों के इन विषयों को ग्रहण करती हैं। गन्ध को नाक, रस को जिह्वा, रूप को आँखें, स्पर्श को त्वचा और शब्द को कान ज्ञानेन्द्री ग्रहण करती है। हम प्रात:स्मरण में इसी आशय का श्लोक बोलते हैं

पृथिवी सगन्धा सरसास्त्थाप: स्पर्शी च वायुर्ज्वलनं च तेज: ।
नभ: सशब्दं महता सहैव कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ।।

(गंध गुण से युक्त पृथ्वी, रसगण से मुक्त जल, स्पर्शगुण से युक्त वायु, ज्वलनगुण से युक्त अग्नि तथा शब्द गुण से युक्त आकाश आदि पञ्चमहाभूत और महत् (समष्टि बुद्धि) सहित मेरे प्रभात को मंगलमय करें ।) अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों के कारण ही हम दुनियाँ से जुड़े हुए हैं। यदि ज्ञानेन्द्रियाँ न हो तो दुनियाँ के होते हुए भी वह हमारे लिए नहीं होगी। ज्ञानेन्द्रियाँ है, इसीलिए यह दुनियाँ हमारे लिए सुन्दर है, कलात्मक है और मनोहारी है।

आओ! हम ज्ञानेन्द्रियों की महिमा बताने वाली कथा का रसपान करें।
दृष्टि-दृष्टि में भिन्नता

एक गुरुकुल में दो राजकुमार पढ़ते थे। दोनों गहरे मित्र थे। एक दिन गुरूजी उन दोनों को अपने साथ भ्रमण पर ले गये। वे घूमते-घूमते अमराइयों में पहुँच गये। सब ओर आम के वृक्ष ही वृक्ष थे। वृक्षों पर पके आमों से डालियाँ झुकी हुई थीं। आमों की सुगन्ध चहुँ ओर फ़ैल रही थीं। दोनों राजकुमारों की ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों का पान कर तृप्त हो रही थीं।

गुरूजी ने देखा एक बालक वहाँ आया और एक पेड़ पर डंडा मार-मार कर पके आम तोड़ने लगा। वह बार-बार पेड़ को डंडा मारता और पेड़ से गिरे पके आमों को उठा लेता। गुरूजी ने राजकुमारों से पूछा – ‘क्या तुम दोनों ने यह दृश्य देखा?’ हाँ गुरुदेव! हमने भी अपनी आँखों से यह दृश्य देखा है। गुरूजी ने फिर पूछा – ‘तुमने इस दृश्य से क्या सीखा ?’

पहले राजकुमार ने बताया – गुरुदेव! मैंने इस दृश्य को देख कर सोचा कि जब वृक्ष भी बगैर डंडा खाये फल नहीं देता, तब बिना दबाव के किसी मनुष्य से कैसे काम निकाला जा सकता है? यह आँखों देखा दृश्य एक महत्वपूर्ण सामाजिक सत्य की ओर संकेत करता है। यह दुनिया राजी-ख़ुशी नहीं मानने वाली, उस पर दबाव डालकर ही कोई काम निकाला जा सकता है।

गुरूजी! मुझे तो कुछ और ही समझ में आ रहा है, दूसरा राजकुमार कहने लगा। यह पेड़ डंडे खाकर भी मधुर फल दे रहा है। पेड़ के समान ही मनुष्य को भी स्वयं दुःख सहकर दूसरों को सुख देना चाहिए। यदि कोई हमारा अपमान भी करे तो उसके बदले में हमें तो उसका उपकार ही करना चाहिए। यही सज्जन लोगों का धर्म है।

गुरुदेव मुस्कराये और उन दोनों को समझाने लगे, देखो तुम दोनों ने अपनी -अपनी दर्शनेन्द्रिय से एक ही दृश्य को देखा, किन्तु उसे अलग-अलग रूप में ग्रहण किया। क्योंकि तुम दोनों की दृष्टि में भिन्नता है। आँख अच्छा और बुरा, सही और गलत दोनों पक्ष देखती है। मनुष्य अपनी दृष्टि के अनुसार ही शिक्षा ग्रहण करता है। तभी तो हमारे पुरखों ने कहा है– ‘जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि’। गुरूजी ने पहले राजकुमार से कहा तुम सब कुछ अधिकार से पाना चाहते हो ,जबकि तुम्हारा यह मित्र प्रेम से सब कुछ पाना चाहता है।

यह कथा हमें बताती है कि जैसी हमारी दृष्टि होगी, हमें यह दुनिया वैसी ही प्रतीत होगी। हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ तो केवल देखने, सुनने या सूँघने आदि का ही कार्य करती हैं, परन्तु क्या देखना और क्या नहीं देखना? इसका विचार तो अन्त: करण करता है। इस अन्त:करण को हम अगले अंक में जानेंगे।
(लेखक शिक्षाविद् है, भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

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