राष्ट्रीय शिक्षा नीति का क्रियान्वयन

 – डॉ. रवीन्द्र नाथ तिवारी

भारतीय संसद द्वारा राष्ट्र के समग्र विकास की परिकल्पना को साकार करने हेतु पारित की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने अपने 02 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। सरकार तथा शिक्षा के क्षेत्र में अनुकरणीय कार्य कर रहे राष्ट्रवादी शैक्षिक संगठनों के अथक प्रयास से समाज में भारत केंद्रित समाज पोषित शिक्षा की दिशा में बहुत ही सकारात्मक परिणाम मिले हैं। कोरोना महामारी जैसी आपदा के बावजूद राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने अपने दो वर्ष की यात्रा में निर्धारित लक्ष्यों को लगभग पूर्ण कर लिया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के विस्तृत विश्लेषण से पूर्व इसके निहितार्थ को जानना एवं समझना आवश्यक होगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में राष्ट्र को पुनः परम वैभव की ओर ले जाकर विश्वगुरु बनाने का संकल्प द्रष्टव्य होता है। संकल्प निश्चित रूप से विशाल है किंतु यह राष्ट्र के प्रत्येक जन-जन को दुर्लभ अवसर भी प्रदान करता है। देश के दूरदर्शी एवं यशश्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने उद्बोधन में कहा है कि शिक्षा नीति एक सर्कुलर नहीं है, भारत के वर्तमान एवं भविष्य को बनाने हेतु हम सबके लिए एक महायज्ञ है, 21वीं सदी में हमें मिला एक अवसर है।

यह विदित है कि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है अतः इसके क्रियान्वयन हेतु केंद्र और राज्य सरकारों का आपस में समन्वय अति आवश्यक है। क्रियान्वयन की व्यापकता महत्वपूर्ण है तथा यह नीति एक व्यापक दृष्टिकोण एवं समग्रता रखती है जिसके अवयव आपस में अविछिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सर्वोच्च प्राथमिकता वर्ष 2025 तक प्राथमिक विद्यालय में मूलभूत साक्षरता और संख्या ज्ञान प्राप्त करना होगा। वर्ष 2025 तक प्री-प्राइमरी विद्यालयों से माध्यमिक स्तर तक 100 प्रतिशत सकल नामांकन अनुपात का लक्ष्य प्राप्त करना है। शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानकों का एक सामान्य मार्गदर्शक सेट 2022 तक विकसित किया जाना है। वर्ष 2030 तक शिक्षण के लिए न्यूनतम योग्यता 4 वर्षीय एकीकृत बी.एड. डिग्री आवश्यक होगी। राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा रूपरेखा इसी वर्ष तैयार किया जाना है। विद्यालयीन और उच्चतर शिक्षा प्रणाली के माध्यम से कम से कम 50 प्रतिशत विद्यार्थियों को वर्ष 2025 तक व्यावसायिक  प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा जिसके लिए लक्ष्य और समय सीमा के साथ एक स्पष्ट कार्य-योजना विकसित किया जाना है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन का उल्लेख है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में बहुविषयक संस्थान जो अध्ययनरत विद्यार्थियों को 1 वर्ष में सर्टिफिकेट, 2 वर्ष में डिप्लोमा, 3 वर्ष में डिग्री तथा 4 वर्ष पूर्ण करने पर मास्टर डिग्री प्रदान करेंगे। एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट, राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन तथा भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग का गठन किया जाएगा। वर्ष 2035 तक सकल नामांकन अनुपात 50 प्रतिशत करना होगा। वर्ष 2030 तक प्रत्येक जिले में अथवा उसके समीप कम से कम एक बहुविषयक उच्चतर शिक्षा संस्थान स्थापित होगा। वर्ष 2040 तक सभी वर्तमान उच्चतर शिक्षा संस्थानों का उद्देश्य अपने को बहुविषयक संस्थानों के रूप में स्थापित करना होगा।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को कर्नाटक, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में पिछले सत्र (2021-22) से ही लागू कर दिया गया है। हाल ही में उत्तराखंड में प्री-प्राइमरी स्तर पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू करने वाला राज्य बना है, शैक्षिक सत्र 2022-23 से नए पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाई प्रारंभ होगी। विद्यालयीन शिक्षा हेतु बाल वाटिका में गुणवत्ता ईसीसीई, निपुण भारत, विद्या प्रवेश, परीक्षा सुधार तथा कला-एकीकृत शिक्षा, खिलौना आधारित शिक्षा शास्त्र जैसे अभिनव शिक्षण जैसे पहल बेहतर अधिगम परिणामों एवं बच्चों के समग्र विकास के लिए अपनाई जा रही हैं। बहुविध शैली (मल्टी मॉडल) शिक्षा हेतु स्वयं, दीक्षा, स्वयं प्रभा, वर्चुअल लैब्स तथा अन्य ऑनलाइन संसाधन पोर्टलों पर प्रवेश एवं छात्र पंजीकरण में तीव्र वृद्धि देखी गई है। यूजीसी ने मुक्त एवं दूरस्थ अधिगम/शिक्षा (ओडीएल) तथा ऑनलाइन कार्यक्रम विनियम अधिसूचित किए हैं, जिसके तहत 59 उच्च शिक्षण संस्थान (एचईआई) 351 पूर्ण ऑनलाइन कार्यक्रम तथा 86 एचईआई 1081 ओडीएल कार्यक्रम संचालित कर रहे हैं।

अनुसंधान, ऊष्मायन एवं स्टार्ट-अप की संस्कृति निर्मित करने हेतु नवीन शिक्षा नीति के साथ गठबंधन नवाचार उपलब्धि पर संस्थानों की अटल रैंकिंग ऑफ इंस्टिट्यूशंस ऑन इनोवेशन अचीवमेंट (आरआईआईए) प्रारंभ की गई है। एआईसीटीई द्वारा 100 संस्थानों को आइडिया डेवलपमेंट, इवैल्यूएशन एंड एप्लीकेशन (आईडीईए) लैब्स के लिए अनुभवात्मक अधिगम के लिए उद्योग की भागीदारी के साथ वित्त पोषित किया गया है। भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहन देने हेतु दीक्षा मंच पर शिक्षण सामग्री 33 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराई गई है। एनआईओएस ने माध्यमिक स्तर पर भारतीय सांकेतिक भाषा (आईएसएल) को भाषा विषय के रूप में पेश किया है। एनटीए ने 13 भाषाओं में जेईई परीक्षा आयोजित की है। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) में एक भारतीय ज्ञान प्रणाली (आईकेएस) प्रकोष्ठ स्थापित किया गया है तथा संपूर्ण देश में 13 आईकेएस केंद्र खोले गए हैं, जिसके माध्यम से भारतीय ज्ञान प्रणाली को प्रोत्साहित किया जा रहा है।

यूजीसी ने 3 महत्वपूर्ण निर्णय लिए हैं- 1.एक साथ दो डिग्री (यूजी, पीजी या डिप्लोमा) प्राप्त करने का अवसर; 2.भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग के लिए विनियम तैयार करना और 3. यूजी छात्रों को स्नातक के बाद पीएचडी करने की अनुमति दी जाएगी। इनका मुख्य उद्देश्य शिक्षा की एक बहु-विषयक प्रकृति को बढ़ावा देना है जिसमें विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, वाणिज्य, कला और मानविकी के बीच कोई निश्चित सीमा नहीं है। यह उद्देश्य एनईपी 2020 के साथ भी मजबूती से जुड़ा हुआ है जो छात्रों को अपनी पसंद का रास्ता अपनाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग के गठन का प्रस्ताव सरकार के पास है जिसे अगले कुछ दिनों में पारित किया जा सकता है।

इस वर्ष से सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों और इच्छुक राजकीय विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में स्नातक स्तर पर प्रवेश के लिए एनटीए के माध्यम से कॉमन एंट्रेंस टेस्ट लिया जा रहा है। इसी प्रकार स्नातकोत्तर स्तर पर प्रवेश परीक्षाएं आयोजित की जा रहीं हैं। राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एनआरएफ) के लिए  50,000 करोड़ राशि का आवंटन किया गया। शिक्षा बजट ने एक लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है किंतु अभी भी यह जीडीपी के 6 प्रतिशत के वांछित स्तर से कम है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन में सबसे बड़ी चुनौती अधोसंरचना की कमी, रिक्त पदों पर शिक्षकों की नियुक्ति, प्रतिभावान विद्यार्थियों का इस पेशे में अपेक्षाकृत कम रुझान, जागरूकता की कमी इत्यादि हैं। यह सार्वभौमिक सत्य है कि किसी भी राष्ट्र का समग्र विकास शिक्षा के माध्यम से ही संभव है तथा इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षक हैं। वास्तव में राष्ट्र का प्राण शिक्षण है तथा शिक्षण का प्राण शिक्षक है। आदर्श शिक्षक से ही आदर्श समाज तत्पश्चात् आदर्श राष्ट्र बनता है। आदर्श शिक्षण के द्वारा ही भारत पुनः सिरमौर बनकर सम्पूर्ण विश्व का मार्गदर्शन करेगा।

(लेखक शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.) में भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष है एवं भारतीय शिक्षण मण्डल महाकौशल प्रान्त अनुसंधान प्रकोष्ठ के प्रान्त प्रमुख हैं।)

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