शिशु शिक्षा 30 – शिशु की अवांछनीय आदतें एवं निराकरण

 – नम्रता दत्त

शून्य से पांच वर्ष तक की अवस्था शिशु में संस्कार निर्माण की श्रेष्ठतम अवस्था होती है। अतः इस समय में डाली गई आदतें ही भविष्य में परिपक्व होकर संस्कार बन जाती हैं। ये आदतें सही भी हो सकती हैं और गलत भी। जिस प्रकार सही/अच्छी आदतें बार बार दोहराने से परिपक्व हो जाती हैं और सुसंस्कार बन जाती हैं, उसी प्रकार गलत/बुरी आदतें भी बार बार दोहराने से परिपक्व हो जाती हैं और कुसंस्कार बन जाती हैं। यदि इस समय में ऐसी आदतों को न रोका जाए तो कई बार यह आदतें युवावस्था तक भी बनी रहती हैं। यह कुसंस्कार शिशु में न हो इसके लिए इन आदतों के कारण को समझना और उनका निवारण करने की योग्यता माता-पिता/परिवार के सदस्यों में होनी चाहिए। इस सोपान में कुछ ऐसी ही अवांछनीय आदतों एवं उनके निराकरण पर बात करेंगे –

  1. अंगूठा चूसना – श्रीमती सीमा (काल्पनिक नाम) एक बैंक में सर्विस करती है। उसकी बिटिया गौरा दो वर्ष की है। सामान्यतः फेसबुक पर जब मैं परिवार के फोटो देखती हूँ तो दिखाई देता है कि गौरा ने मुंह में दो अंगुलियां डाली हुई हैं। मैंने सीमा से फोन पर बात की तो उसने बताया वह तो जन्म से ही दो अंगुलियां चूसती है। मैं तो दिन भर बैंक में होती हूँ। मम्मी (सासू मां) भी सोचती हैं कि अंगुलियां चूसती है तो परेशान नहीं करती और वे भी उसे कुछ नहीं कहतीं। उसकी इस आदत के कारण उसके दांत (जबङा) भी ठीक दिखाई नहीं देते, बाहर को निकल आए हैं।

मुझे ध्यान में आया कि गौरा के छः माह का होने पर ही सीमा ने बैंक में जाना शुरु कर दिया था। इसलिए गौरा को जब भी मां के दूध की याद आती थी तो वह अंगुलियां चूसने लगी होगी और उसकी इस आदत पर किसी ने ध्यान नहीं दिया तो वह दो वर्ष की होने पर भी ऐसा ही करती है।

मैंने अपने बाल्यकाल में एक ऐसी दुल्हन को देखा है जिसे बार बार यह याद दिलाया जा रहा था कि अंगूठा नहीं चूसना है (कुछ बच्चे अंगूठा चूसते हैं)। आज मनोविज्ञान को समझने पर ध्यान में आता है कि शिशु अवस्था में उनकी (दुल्हन की) माता का देहांत हो गया था और चाचा ने उनका पालन पोषण किया। अतः स्वयं को असुरक्षित सा अनुभव करने के कारण ही उसकी यह आदत परिपक्व होकर संस्कार बन गई होगी।

इन कारणों के अतिरिक्त दांत निकलते समय मसूङों में खुजली होने के कारण भी शिशु अपना अंगूठा चूसने लगता है।

निराकरण

  • स्तनपान करने में शिशु को माता के स्पर्श, स्नेह एवं सान्निध्य से सुरक्षित होने की अनुभूति होती है। किसी भी प्रकार की परिस्थितियों के कारण स्तनपान के अभाव में भी माता को शिशु को अपना स्पर्श, स्नेह और सानिध्य भरपूर मात्रा में देना चाहिए।
  • माता की उपस्थिति न होने पर भी यदि उसे आनन्ददायी वातावरण दिया जाए तो भी वह सुरक्षित अनुभव करता है। इस प्रकार उसे ऐसी आदतों से बचाया जा सकता है।
  • अंगूठे को जबरदस्ती खींच कर बाहर नहीं निकालना चाहिए। अंगूठा चूसते समय उसके ध्यान को किसी रोचक कार्य में लगा देना चाहिए। शिशु को अकेला/असुरक्षित नहीं छोङना चाहिए।
  • दांत निकलते समय उसके गले में एक छुआरा धागे में पिरोकर पहना देना चाहिए। वह उस छुआरे को ही मसूङों से दबाएगा तो उसके मसुङों की खुजली को भी आराम मिलेगा और उसका रस भी उसके पेट में जाएगा।
  1. बिस्तर गीला करना

एक से तीन वर्ष के बच्चों के लिए वर्तमान समय में इस समस्या का समाधान डॉयपर है। परन्तु यह समाधान ही अपने आप में समस्या है। हम कहते हैं कि सामान्यतः बच्चा दो कारणों से रोता है – भूख लगने पर और गीला करने पर। उसकी स्पर्शेन्द्रिय जागृत होती है, तब ही तो वह ऐसा करता है। लेकिन डॉयपर उसकी स्पर्शेन्द्रिय (Tactile/sence) को चेतन करने के स्थान पर उसको मृत (Dead) बना देता है। इसके कारण उसकी पेशाब करने की संवेदना समाप्त हो सकती है। ऐसे में बच्चे बङी उम्र में उस समय बिस्तर गीला करते हैं, जब उन्हें डॉयपर नहीं लगाया जाता। बिस्तर गीला करने के कुछ अन्य कारण भी हैं जैसे –

  • परिवारिक क्लेश अथवा डरावने सपने से भयभीत होने पर भी बच्चे बिस्तर गीला करते हैं।
  • शारीरिक एवं मानसिक अस्वस्थता भी इसका कारण हो सकती है।
  • पेट में कीङे होना भी इसका कारण हो सकता हैं।
  • रात्रि में पेशाब करके न सुलाना भी इसका कारण है।

निराकरण

  • शारीरिक एवं मानसिक अस्वस्थता तथा पेट में कीङे आदि की दवाई आयुर्वैदिक वैद्य से लेनी चाहिए (एलौपैथिक दवाइयां शिशु के आन्तरिक कोमल तंत्र के लिए हानिकारक होती है)।
  • डरावने दृश्य एवं पारिवारिक क्लेश से शिशु को दुर रखना चाहिए। शिशु को आनन्दपूर्ण वातावरण में रखकर निर्भय बनाना चाहिए।
  • सोने से कुछ समय पहले दूध पिलाएं। दूध पिलाकर तुरन्त सुलाना नहीं चाहिए।
  • रात्रि में सोने से पूर्व उसे पेशाब करके ही सुलाएं।

  1. दांत किटकिटाना/पीसना (Bruxism)

एक से तीन वर्ष के अधिकांश शिशु दांत किटकिटाते हैं। इसका मुख्य कारण तो पेट में कीङे (stomach bug/worm) होना है।

  • पेट में गर्मी के कारण भी ऐसा होता है।
  • चॉकलेट (कैफीन युक्त पदार्थ) तथा मीठी चीजें खाने से दांतो में कीङे हो जाते हैं, जिसके कारण वह दांत किटकिटाने लगता है।
  • कुछ डाक्टर दांत पीसने का कारण मानसिक तनाव को भी बताते हैं। उनके अनुसार इसको हल्के में नहीं लेना चाहिए।
  • सांस लेने में परेशानी होने के कारण भी शिशु दांत पीसने लगते हैं।
  • दांत निकालते समय शिशु के कान में दर्द होने के कारण भी शिशु दांत किटकिटाता है।

निराकरण – दांत पीसने की इस आदत को सहज नहीं लेना चाहिए। इससे दांतों की चमक खराब होती है, दांत टूटने और गले में फंसने की सम्भावना भी रहती है। दांतों के बीच में जीभ और गाल आदि के दबने का भी डर रहता है। अतः इस आदत/बीमारी का उपचार यथा शीघ्र करना चाहिए –

  • दांत किटकिटाने के कारण की जांच यथा शीघ्र करानी चाहिए। यदि कारण कोई शारीरिक बीमारी (पेट/कान दर्द, सांस लेने में परेशानी या पेट में जलन आदि) से जुङा है तो वैद्य से दवाई लें।
  • चॉकलेट, टॉफी कम खिलाएं। मीठा खाने के बाद दांत साफ करने चाहिए।
  • सोते समय शिशु को लोरी/कहानी सुलाकर सुलाएं ताकि वह तनाव मुक्त होकर सो जाए।
  1. मिट्टी खाना – नजर बचाकर बच्चे मिट्टी खा लेते हैं। इसका कारण कैल्शियम की कमी है। प्राकृतिक खाद्य पदार्थों जैसे – केला, खजूर आदि खिलाकर इस कमी को दूर करेंगे तो बच्चा स्वतः ही मिट्टी खाना छोङ देगा।
  2. जनांगों (Mass organs) से खेलना – कभी कभी बालक अपने जनांगों को पकङकर खेलते हैं। यह गंभीर समस्या नहीं है। बालक को कपङे पहनाकर रखेंगे तो यह आदत सरलता से छूट जाती है अन्यथा………
  3. अन्य अवांछनीय आदतें – माँ का पेट/चोटी पकङकर सोना, नाखून कुतरना, जिद करना और चुगली करना ये सारी अवांछनीय आदतें है। इन सारी आदतों के पीछे शारीरिक अथवा मानसिक कारण होते हैं। अतः इनके कारण को जान शीघ्र ही निराकरण करना चाहिए।

सजग और सचेत माता-पिता ऐसी आदतों को संस्कार का रूप नहीं लेने देते। इन आदतों को समय रहते ही समाप्त कर देते हैं।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह संयोजिका है।)

और पढ़े : शिशु शिक्षा 29 – शिशु का आहार, स्वास्थ्य एवं संस्कार

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