सा विद्या या विमुक्तये
– नम्रता दत्त
शून्य से पांच वर्ष तक की अवस्था शिशु में संस्कार निर्माण की श्रेष्ठतम अवस्था होती है। अतः इस समय में डाली गई आदतें ही भविष्य में परिपक्व होकर संस्कार बन जाती हैं। ये आदतें सही भी हो सकती हैं और गलत भी। जिस प्रकार सही/अच्छी आदतें बार बार दोहराने से परिपक्व हो जाती हैं और सुसंस्कार बन जाती हैं, उसी प्रकार गलत/बुरी आदतें भी बार बार दोहराने से परिपक्व हो जाती हैं और कुसंस्कार बन जाती हैं। यदि इस समय में ऐसी आदतों को न रोका जाए तो कई बार यह आदतें युवावस्था तक भी बनी रहती हैं। यह कुसंस्कार शिशु में न हो इसके लिए इन आदतों के कारण को समझना और उनका निवारण करने की योग्यता माता-पिता/परिवार के सदस्यों में होनी चाहिए। इस सोपान में कुछ ऐसी ही अवांछनीय आदतों एवं उनके निराकरण पर बात करेंगे –
मुझे ध्यान में आया कि गौरा के छः माह का होने पर ही सीमा ने बैंक में जाना शुरु कर दिया था। इसलिए गौरा को जब भी मां के दूध की याद आती थी तो वह अंगुलियां चूसने लगी होगी और उसकी इस आदत पर किसी ने ध्यान नहीं दिया तो वह दो वर्ष की होने पर भी ऐसा ही करती है।
मैंने अपने बाल्यकाल में एक ऐसी दुल्हन को देखा है जिसे बार बार यह याद दिलाया जा रहा था कि अंगूठा नहीं चूसना है (कुछ बच्चे अंगूठा चूसते हैं)। आज मनोविज्ञान को समझने पर ध्यान में आता है कि शिशु अवस्था में उनकी (दुल्हन की) माता का देहांत हो गया था और चाचा ने उनका पालन पोषण किया। अतः स्वयं को असुरक्षित सा अनुभव करने के कारण ही उसकी यह आदत परिपक्व होकर संस्कार बन गई होगी।
इन कारणों के अतिरिक्त दांत निकलते समय मसूङों में खुजली होने के कारण भी शिशु अपना अंगूठा चूसने लगता है।
निराकरण
एक से तीन वर्ष के बच्चों के लिए वर्तमान समय में इस समस्या का समाधान डॉयपर है। परन्तु यह समाधान ही अपने आप में समस्या है। हम कहते हैं कि सामान्यतः बच्चा दो कारणों से रोता है – भूख लगने पर और गीला करने पर। उसकी स्पर्शेन्द्रिय जागृत होती है, तब ही तो वह ऐसा करता है। लेकिन डॉयपर उसकी स्पर्शेन्द्रिय (Tactile/sence) को चेतन करने के स्थान पर उसको मृत (Dead) बना देता है। इसके कारण उसकी पेशाब करने की संवेदना समाप्त हो सकती है। ऐसे में बच्चे बङी उम्र में उस समय बिस्तर गीला करते हैं, जब उन्हें डॉयपर नहीं लगाया जाता। बिस्तर गीला करने के कुछ अन्य कारण भी हैं जैसे –
एक से तीन वर्ष के अधिकांश शिशु दांत किटकिटाते हैं। इसका मुख्य कारण तो पेट में कीङे (stomach bug/worm) होना है।
निराकरण – दांत पीसने की इस आदत को सहज नहीं लेना चाहिए। इससे दांतों की चमक खराब होती है, दांत टूटने और गले में फंसने की सम्भावना भी रहती है। दांतों के बीच में जीभ और गाल आदि के दबने का भी डर रहता है। अतः इस आदत/बीमारी का उपचार यथा शीघ्र करना चाहिए –
सजग और सचेत माता-पिता ऐसी आदतों को संस्कार का रूप नहीं लेने देते। इन आदतों को समय रहते ही समाप्त कर देते हैं।
(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती शिशुवाटिका विभाग की अखिल भारतीय सह संयोजिका है।)
और पढ़े : शिशु शिक्षा 29 – शिशु का आहार, स्वास्थ्य एवं संस्कार
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