बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा- 28 (भारतीय शिक्षा दर्शन)

 – रवि कुमार

शिक्षा समाज व राष्ट्र जीवन का महत्वपूर्ण भाग है। शिक्षा क्या है और शिक्षा की क्यों आवश्यकता है? यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यह प्रश्न आज का भी है और जब से शिक्षा व्यवस्था है तब से तो है ही। हर काल में यह प्रश्न रहेगा ही। इसकी खोज करना भी शिक्षक व शिक्षार्थी दोनों का कार्य है।

शिक्षा क्या है? शिक्षा ज्ञान की व्यवस्था है। ज्ञान परंपरा बनाना, ज्ञान परंपरा बनी रहे, अखंड रूप से चलती रहे, यदि खंडित हुई तो पुनः स्थापित करना यह शिक्षा का कार्य है। ज्ञान ब्रह्म का स्वरूप है। ब्रह्म स्वरूप ज्ञान को विश्व रूप में प्रकट करना शिक्षा का कार्य है। शिक्षा को देखना यानि शिक्षक को देखना। अतः शिक्षक को ज्ञाननिष्ट होना आवश्यक है। शिक्षा का संबंध जीवन के साथ है, रोजगार के साथ नहीं। शिक्षा आजीवन होती है, सार्वत्रिक होती है। ज्ञान पवित्रतम है अतः शिक्षा भी पवित्रतम है और उसके साथ व्यवहार भी वैसा ही अपेक्षित है।

शिक्षा के तीन प्रमुख कार्य है –

१ प्राचीन ज्ञान नवीन पीढ़ी को स्थानांतरित करना

२ नव ज्ञान का सृजन करना

३ जीवन के संघर्ष व चुनौतियों का सामना करने के लिए नवीन पीढ़ी को सुसज्ज करना

प्रथम दो में ज्ञान का ही वर्णन है। अतः ज्ञान क्या है? ज्ञान व सूचना में क्या अन्तर है? ज्ञान व शिक्षा का क्या संबंध है? ये प्रश्न स्वाभाविक है। शिक्षा का उद्देश्य समझने के लिए ज्ञान के विषय में स्पष्ट संकल्पना जानना आवश्यक है।

आजकल शिक्षा जगत पाठ्यक्रम, पुस्तक, कालांश, परीक्षा व अंक में फस कर रह गया है। पुस्तक में जो लिखा है उसे ही कक्षाकक्ष में पढ़ाया जाता है। जो विषयवस्तु पुस्तक में है उसे ही ज्ञान मान लिया जाता है। क्या पुस्तक में प्रकाशित विषय वस्तु ज्ञान है? वो तो मात्र सूचना है। आजकल डिजिटल तकनीक के कारण सूचनाएं इंटरनेट पर भरी पड़ी है। वह सब सुचना है तो ज्ञान क्या है?

स्वामी विवेकानन्द ने ज्ञान के विषय में कहा है – “समस्त ज्ञान, चाहे वह भौतिक हो अथवा आध्यात्मिक, मनुष्य की आत्मा में है। बहुधा वह प्रकाशित न होकर ढका रहता है और जब आवरण धीरे धीरे हट जाता है तो हम कहते हैं कि, हम सीख रहे हैं।”

दूसरे शब्दों में बालक आपने ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रिय द्वारा सुनता, देखता, स्पर्श आदि करता है, सूचनाएं प्राप्त करता है। इन सूचनाओं पर चिंतन-मनन करता है, उस विषय में स्वयं अनुभव करता है और उस अनुभूति से जो प्राप्त होता है वह ज्ञान है।

सूचना व ज्ञान में बड़ा भारी अंतर है यह आज शिक्षा जगत को समझने की आवश्यकता है।

ज्ञान सार्वभौमिक है और शिक्षा राष्ट्रीय। इसके विषय में भी प्रश्न आता है कि यह कैसे संभव है? आजकल वैश्वीकरण की बात होती है। शिक्षा राष्ट्रीय है तो विद्यार्थी का विकास विश्व के अनुसार कैसे होगा? गणित व विज्ञान में जो सूत्र व अवधारणाएं रहती है वह राष्ट्र की सीमाओं से बाहर भी वैसी ही रहेगी। परंतु उसका मानव जीवन के लिए उपयोग राष्ट्र की आवश्यकता के अनुसार होगा। जैसे जल एक तत्व है रसायन शास्त्र में H2O इसका सूत्र है। H2O की अभिक्रिया अलग अलग तत्वों/धातुओं के साथ होंगी तो उसका परिणाम भी सभी स्थानों पर एक जैसा रहेगा। परंतु जल तत्व के प्रति भावना, उसका संरक्षण, जल स्त्रोतों का विकास व संवर्धन, जल को पूज्य मानना या नहीं मानना यह राष्ट्र की भावना के अनुसार होगा। कपड़ा मूलतः तन ढकने के काम आता है। परंतु तन कैसे ढका जाए यह राष्ट्र की संस्कृति के अनुसार होगा। इसलिए कहा है कि ज्ञान सर्वभौमिक है और शिक्षा राष्ट्रीय।

स्वामी विवेकानन्द ने कहा है – “Education should be routed to culture and target to progress.”

फिर राष्ट्र क्या है?

राष्ट्र की संकल्पना सांस्कृतिक है जिसका सम्बन्ध तीन बातों से है – १ भूमि, २ भूमि पर रहने वाली प्रजा, जो उसे अपनी माता मानती है और ३ प्रजा का दर्शन। हर राष्ट्र की प्रजा का एक दर्शन होता है जिसे उस राष्ट्र का जीवन दर्शन कहते है। भूमि, प्रजा और जीवन दर्शन तीनों को मिलाकर राष्ट्र की संकल्पना है। भूमि पर रहने वाली प्रजा में राष्ट्र निष्ठा उत्पन्न हो यह शिक्षा का उद्देश्य है।

भारत के संदर्भ में शिक्षा का क्या उद्देश्य है?

१ विश्व का कल्याण

२ राष्ट्र को परम वैभव के पथ पर ले जाना। परम वैभव के आयाम – अभ्युदय (वैभव व समृद्धि की प्राप्ति) व निःश्रेयस (परम कल्याण की प्राप्ति)।

३ व्यक्ति का समग्र विकास

व्यक्ति का सर्वांगीण विकास किस लिए करना है? समाज को सत्य और धर्म के मार्ग पर ले जाते हुए राष्ट्र को परम वैभव के पथ पर लेकर जाना ताकि विश्व का कल्याण हो।

धर्म वैश्विक नियम है। जो धारण किया जाता है वो धर्म है। ‘राष्ट्र निर्माण के लिए व्यक्ति विकास’ ऐसा स्वामी विवेकानन्द ने कहा है। राष्ट्र निर्माण के लिए व्यक्ति का विकास सबसे अंत में है। व्यक्ति विकास का मुद्दा पश्चिम से आया है। भारतीय विचार कहता है – ‘समस्त सृष्टि के लिए मैं’, और सेमेटिक यानि पश्चिम का विचार कहता है – ‘मेरे लिए समस्त सृष्टि’। भारतीय विचार सबके कल्याण के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है। हमारा दायित्व बनता है कि हम शिक्षा व्यवस्था के क्रम को बदले।

सर्वांगीण विकास व समग्र विकास की संकल्पना क्या है? सर्वांगीण अर्थात पंचकोशीय विकास – व्यक्ति की क्षमताओं का विकास। यह लक्ष्य नहीं साधन है। व्यष्टि से समष्टि के विनियोग में व्यक्ति की क्षमताओं का विकास अर्थात समग्र विकास।

तीन प्रकार की शिक्षा है। कुटुंब की शिक्षा जिसका संचालन सूत्र माता-पिता है। विद्यालयीन शिक्षा का शिक्षक व समाज शिक्षा का संचालन सूत्र मठ-मंदिर-धर्माचार्य है। शिक्षक, माता-पिता और धर्माचार्य का समन्वय शिक्षा को करना है।

शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन करना है तो परिवर्तन का केंद्र कहाँ है? परिवर्तन का केंद्र है कक्षा कक्ष। कक्षाकक्ष के केंद्र में शिक्षक व छात्र है। कक्षाकक्ष में विचारों, कौशलों व भावनाओं का आदान प्रदान होता है। कक्षाकक्ष के पाठ में संकल्पना, भावना, कौशल, विचार, दृष्टि, व्यवहार व क्रियाकलाप होता है। कक्षाकक्ष की शिक्षा में यह सब हुआ तो ही शिक्षा में आमूलचूल परिवर्तन होगा। इस परिवर्तन का वाहक शिक्षक को बनना है।

(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)

और पढ़े : बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-27 (21वीं सदी के अभिभावकों की शिक्षा)

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