शिशु शिक्षा 15 (प्रारंभिक बाल्यावस्था में अनौपचारिक शिक्षा का महत्व)

 – नम्रता दत्त

कुछ वर्ष पूर्व मुझे कुरूक्षेत्र में होने वाले लाइट एण्ड साउंड शो को देखने का अवसर मिला। शो में बालक अभिमन्यु के चक्रव्युह भेदन की घटना को दिखाया गया था। शो की समाप्ति के पश्चात् भीङ धीरे धीरे बाहर की ओर निकल रही थी। मेरे आगे आगे एक दंपति अपने 4-5 वर्ष के बालक के साथ चल रहे थे। बालक ने जिज्ञासा वश अभिमन्यु के विषय में माता-पिता से प्रश्न पूछने प्रारम्भ किए। एक दो प्रश्नों का उत्तर शो के आधार पर देने के बाद माता-पिता झुंझला गए और बालक को डांटने लगे क्योंकि उन प्रश्नों के उत्तर वे भी नहीं जानते थे। ऐसा लगता था कि बालक अभिमन्यु की कहानी उन्होंने शो देखने से पूर्व कभी सुनी ही नहीं थी।

बच्चे के प्रत्यक्ष सीखने की प्रक्रिया उसके जन्म से ही प्रारम्भ हो जाती है और जीवन पर्यन्त चलती है। परन्तु जीवन के प्रत्येक पङाव पर सीखने के विभिन्न स्तर हैं। जैसे बाल्यावस्था में बच्चा ज्ञानेन्द्रियों (आंख, कान, नाक, जिह्वा और स्पर्श) से अनुभव प्राप्त करता है और कर्मेन्द्रियों (हाथ, पैर और वाणी) से उसकी अभिव्यक्ति करके सीखता है। अपनी स्वाभाविक विशेषताओं के कारण वह आसपास के वातावरण में जो कुछ ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से अनुभव करता रहता है बिल्कुल वैसा ही अभिनय करने का प्रयास करता है और यह अभिनय ही धीरे धीरे उसके संस्कार अर्थात शिक्षा का रूप ले लेते है। इसका अर्थ यह हुआ कि बाल्यावस्था में उचित वातावरण दिया जाए जिससे प्रेरणा पाकर बच्चा उचित ही अभिव्यक्ति करना सीखे।

प्रातःकालीन सैर के समय मैं पार्क के चारों ओर चक्कर लगा रही थी। मेरे आगे-आगे ही एक लगभग 5 वर्ष का बालक साईकिल चलाने का अभ्यास कर रहा था। उसके साथ उसके पिता भी थे। पार्क का चक्कर लगाते हुए वह जब पूर्व दिशा की ओर चला तो उसने थोङा आगे चलने के बाद रूककर सूर्य देव को प्रणाम किया। पिता इतने में थोङा आगे निकल चुके थे। बालक ने आवाज लगाई पिता जी सूर्य को नमस्कार तो करो। पिता ने कहा इतनी दूर आकर तुम्हें नमस्कार याद आया है। बालक ने कहा – रोज बाबा मेरे साथ आते हैं तो यहीं से नमस्कार कराते हैं। मैने गौर किया तो ध्यान में आया कि वहां से ही सूर्य देव के दर्शन स्पष्ट हो रहे थे।

प्रारम्भिक बाल्यावस्था बहुत जिज्ञासु होती है। क्या, क्यों, कैसे में बच्चा हर समय उलझा ही रहता है। उसके पास अथाह ऊर्जा है। इस ऊर्जा को वह सही प्रकार से प्रयोग करे, बस इसी का ही ध्यान स्वयं ऊर्जावान होकर रखने की आवश्यकता है। बच्चे का पहला विद्यालय ‘घर’ और दूसरा स्कूल है। अतः दोनों को ही इस दिशा में स्पष्ट संकल्पना एवं बोध होना चाहिए। केवल बोध ही नहीं इसके लिए योग्य एवं सामर्थ्यवान बनना होगा। क्योंकि जिस प्रकार अग्नि ही अग्नि का सृजन कर सकती है, उसी प्रकार जीवन ही जीवन दे सकता है।

संस्कृत में एक श्लोक है –

सुवर्णानि सरोजानि निर्मातुं सन्ति शिल्पिनः।

तत्र सौरभं निर्माणे चतुरः चतुराननः।।

अर्थ है एक सोने का कमल बनाने के लिए अनेक शिल्पी (सुनार) मिलेंगे। परन्तु एक स्वर्ण कमल को सुगन्धित करना हो तो अनेक शिल्पी आने से भी नहीं होगा। सुगन्धित करने के लिए साक्षात् चतुरानन याने ब्रह्मा/सृष्टिकार चाहिए। कहने का भाव है कि शिल्पकार के मन में सृष्टिकार का भाव हो। बच्चे का सर्वागीण विकास करना केवल ठोक पीट कर गढने का विषय नहीं है। वह जीवन्त है। उसमें जीवन फूंकने के लिए स्वयं उस जीवन को जीना होगा। सृष्टिकार का दृष्टिकोण रखना होगा। माता पिता एवं अध्यापक को स्वयं का निर्माता बन बच्चे का निर्माण करना है।

प्रारम्भिक बाल्यावस्था में औपचारिक शिक्षा (पढना-लिखना) से भी अधिक अनौपचारिक शिक्षा का महत्व है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी समय की आवश्यकता के साथ इसके महत्व को समझा है और शिक्षा के पहले पङाव को प्रारम्भ्कि बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) कहा है। जिसमें 0 से 6 वर्ष तक की अवस्था को विशेषतः देखभाल और 6 से 8 वर्ष तक को शिक्षा की पूर्व तैयारी (Foundational Literacy and Numeracy) के लिए माना गया है जो कि अनौपचारिक शिक्षण पद्धति पर ही आधारित है।

ECCE की संकल्पना और उद्देश्य पूर्ति के माध्यम अनौपचारिक शिक्षा की ही पुष्टि करते हैं। 3 से 6 वर्ष की आयु तक शरीरिक विकास : स्वास्थ्य, पोषण, स्वावलम्बन, मोटर कौशल, व्यवहार में सहजता, भावनाओं की अभिव्यक्ति करना, किसी कार्य को पुरा करने के लिए लम्बे समय तक बैठ पाना आदि कार्यों को सीखना। सामाजिक अथवा भावनात्मक/संवेगात्मक विकास के लिए सहयोग की भावना, टीम वर्क, करुणा, समता, समावेश, संवाद, सांस्कृतिक सम्मान, प्रसन्नता, जिज्ञासा, रचनात्मकता जैसे जीवन कौशलों के विकास के लिए ही यह अवस्था महत्वपूर्ण है। ECCE इन वर्षों के दौरान अक्षरों, भाषाओं, संख्याओं, गिनती, रंगो, आकारों, चित्रकला/पेंटिंग, इनडोर – आउटडोर खेलों, पहेलियों और तार्किक चिन्तन, दृश्यकला, शिल्प, नाटक, कठपुतली, संगीत और अंग संचालन पर जोर देता है। यह सब क्रियाएं अनौपचारिक ही हैं और यह सब बच्चे के स्कूल जाने की पूर्व तैयारी है। किसी प्रकार की कोई लिखित परीक्षा होगी ही नहीं क्योंकि शिक्षा होगी ही अनौपचारिक, परन्तु बच्चे के विकास का सतत् मूल्यांकन किया जाएगा।

इस सब की जानकारी के लिए माता पिता एवं समाज को बताने एवं सहयोग लेने की आवश्यकता होगी, अतः उनकी जागरूकता के कार्यक्रमों एवं विषय के प्रचार प्रसार के लिए विचार करना होगा।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)

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