शिशु शिक्षा 14 (मूलभूत साक्षरता एवं संख्यात्मक ज्ञान)

 – नम्रता दत्त

व्याकरण की दृष्टि से भाषा के दो प्रकार होते हैं – मौखिक (ध्वनिस्वरूप) एवं लिखित (वर्णस्वरूप)। मौखिक भाषा में सुनना और बोलना दो क्रियाएं होती हैं। यही भाषा विकास के प्रथम दो चरण होते हैं। परन्तु जब हम साक्षरता की बात करते हैं तब उसका अर्थ लिखित भाषा से ही लिया जाता है। लिखित भाषा में भी दो क्रियाएं होती हैं – पढ़ना और लिखना। यह भाषा विकास के अन्य दो चरण हैं। इस प्रकार साक्षरता के लिए क्रमशः चार चरण की यात्रा करनी होती है – सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना।यह चरण ज्ञानेन्द्रियों एवं कर्मेन्द्रियों का परस्पर सम्बन्ध/समन्वय है। सुनना/श्रवर्णेन्द्रिय (ज्ञानेन्द्रिय) का कार्य है तो बोलना/वाणी (कर्मेन्द्रिय) का कार्य है। बच्चा जैसा सुनता है वैसा ही बोलता है। भाषा की परिभाषा भी है – ‘या भाष्यते सा भाषा।’ यह अनौपचारिक प्रक्रिया/शिक्षा है जो स्वाभाविक रूप से होती है। पढ़ना/दृर्श्येन्द्रिय (ज्ञानेन्द्रिय) का कार्य है तो लिखना/हाथ (कर्मेन्द्रिय) का कार्य है। यह औपचारिक प्रक्रिया/शिक्षा है। परन्तु इस औपचारिक शिक्षा का आधार अनौपचारिक शिक्षा (सुनना, बोलना) ही है। क्योंकि बच्चा जैसा सुनता है वैसा ही बोलता है और जैसा सुनकर-बोलकर पढता है वैसा ही लिखता है। अतः यह सुनिश्चित है कि पढ़ने एवं लिखने से पूर्व सुनना और बोलना मजबूत करना ही होगा। इसीलिए बाल मनोविज्ञान के अनुसार छः वर्ष की आयु में ही बच्चे को पढ़ने एवं लिखने का अभ्यास कराना चाहिए। पांच वर्ष की आयु तक के शिशु को अनौपचारिक रूप से जितना अधिक ज्ञान, मूर्त रूप  से दिया जाएगा उतना ही औपचारिक शिक्षा को जानने और समझने में उसको सहजता और सरलता होगी। उदाहरण के लिए ‘क’ से ‘कमल’ लिखने से पूर्व यदि बच्चे ने कमल का फूल देखा होगा तो यह ज्ञान पक्का हो जाएगा क्योंकि शब्द यदि ध्वनि है तो उसका अर्थ जीवन में है। भाषा सीखना अर्थात् शब्द और अर्थ दोनों सीखना। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। भाषा सीखना अर्थात् जीवन की अभिव्यक्ति करना सीखना क्योंकि भाषा को विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम कहा जाता है।

भाषा केवल मात्र सुनना, बोलना, पढ़ना एवं लिखना ही नहीं है इसका सम्बन्ध पांचों कोषों से अर्थात् व्यक्तित्व विकास से है। यह एक संस्कार है। बच्चा सुनने में जैसी संवेदनाओं/भावों की अभिव्यक्ति ग्रहण करता है उसके जवाब में वह वैसी ही संवेदनाएं/भावों को प्रदान करता है। अतः यहां सुनने और बोलने से अर्थ यही है कि बच्चा शुद्ध और संस्कारित भाषा ही सुने ताकि वह वैसा ही बोले। भविष्य में यह उसके पढ़ने और लिखने को भी प्रभावित करती है। केवल पठन लेखन में ही नहीं आपसी बातचीत में भी शुद्ध उच्चारण एवं संस्कारित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। बच्चे को गीत-संगीत सीखायें अथवा कहानी एवं नाटक, शुद्ध उच्चारण एवं संस्कारित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। उच्चारण की शुद्धता के लिए संस्कृत के श्लोक ,सूत्र एवं मंत्रपाठ का गायन/स्मरण कराना चाहिए।

सर्वप्रथम चित्र पठन, शब्द पठन एवं तत्पश्चात् वाक्य पठन, चित्र वर्णन एवं घटना निरूपण करना मौखिक भाषा के लिए उपयोगी क्रम है। पठन के लिए चित्र एवं शब्दों का ही प्रयोग करें न कि वर्णों का क्योंकि शब्द का अर्थ होता है, वर्ण का नहीं। सतत् अभ्यास के पश्चात् बिना चित्र के केवल शब्द का पठन कराएं। फिर शब्द को तोङकर एक-एक वर्ण का उच्चारण कराने से वर्णों की (ध्वनि/आकृति) पहचान सहजता से हो जाती है। भाषा के विकास का विज्ञान भी यही है। एक-एक वर्ण की ध्वनि को जानने से बच्चा स्वयं विभिन्न वर्णों को मिलाकर शब्द बनाने लगता है और उन्हें पढ़ने लगता है। निरन्तर अभ्यास से वह कहानियां और समाचार पत्र आदि भी पढ़ने लगता है और समझ कर धारा प्रवाह पढ़ना ही मूलभूत साक्षरता है। राष्ट्रीय  शिक्षा नीति 2020 में द्वितीय कक्षा तक इसी क्षमता को विकसित करने की बात कही गई है। पढ़ने के पश्चात् लेखन (वर्णों की आकृति बनाना) में बच्चे को विशेष कठिनाई नहीं होती क्योंकि इस आयु वर्ग तक उसकी अंगुलियों की मांसपेशियां विकसित हो जाती हैं। इस स्थिति में शिक्षक को ध्यान देना है कि बच्चे को वर्ण की बनावट सही विधि से बनाने का अभ्यास हो। शब्दों की बनावट सुन्दर एवं सही अनुपात में बने ऐसा निरन्तर अभ्यास कराना चाहिए।

संख्यात्मक ज्ञान (Numeracy) गणित

संख्यात्मक ज्ञान अर्थात् गणित समझने का विषय है रटने का नहीं। मनोवैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो बाल अवस्था में स्मरण शक्ति अधिक होती है और समझ शक्ति कम होती है। प्रायः हम देखते हैं कि घर में बङे बच्चे को गिनती याद करते हुए, सुनकर छोटा बच्चा भी गिनती बोलने लगता है परन्तु यदि उससे पूछा जाए कि 13 टाफियां गिनकर बताओ तो नहीं बता सकता। इसी प्रकार बङे लोगों में समझ विकसित होती है, परन्तु स्मरण शक्ति कम होती जाती है। मेरी दादी अनपढ थीं परन्तु 48 की संख्या बताने के लिए वह कहती थीं कि 50 में 2 कम। इस बात से सिद्ध होता है कि इसका सम्बन्ध व्यवहार से है और यह समझ का विषय है।

मूलभूत संख्यात्मकता का अर्थ है दैनिक जीवन की समस्या समाधान में तर्क करने और सरल संख्यात्मक अवधारणाओं को लागू करने की क्षमता। प्रारम्भिक गणित के प्रमुख पहलू (aspects) और घटक (components) को निम्न प्रकार से समझ सकते हैं –

जिस प्रकार शब्दों के अर्थ जीवन में होते हैं उसी प्रकार गणित भी समष्टि जीवन में होता है। भाषा की भांति ही इसका अभ्यास भी सर्वप्रथम मूर्त वस्तुओं को गिनकर (Pre Number concept) ही कराना चाहिए। धीरे-धीरे निरन्तर अभ्यास से मानसिक समझ स्वतः ही विकसित होने लगती है और बच्चा मानसिक गणना करना सीख जाता है।  गणना सीखते हुए ही जोङना और घटाना भी सीख लेता है जैसे 0 +0 = 00, 00 + 0 = 000……. इसी प्रकार घटाना 000 – 0 = 00, 00 – 0 = 0……… 0 – 0 = 0 (शून्य) तक बताना चाहिए। 1 से 9 तक की संख्या का अभ्यास जोङ और घटा के माध्यम से पक्का कराना चाहिए। इसके बाद गणना 10, 20, 30 ……99 तक बतानी चाहिए और इसके बाद सैकङे की संकल्पना देनी चाहिए। गणना को समझ कर पढ़ने के पश्चात् लेखन का अभ्यास, 1 2 3……(Number and operations on number) कराना चाहिए। इसी प्रकार धीरे धीरे जटिल समस्याओं को सुलझाने के लिए पहाङे याद कराके गुणा एवं भाग सीखाना चाहिए।

विभिन्न अवधारणाओ: छोटा-बङा, पतला-मोटा, हलका-भारी आदि (Measurement) को भी क्रमशः प्रत्यक्ष….मूर्त…..चित्रों के माध्यम से स्पष्ट करना चाहिए।

विभिन्न आकृतियों: गोल, वर्ग, त्रिकोण आदि का ज्ञान एवं उनसे चित्र रचना (Shapes and spatial understanding), तथा कालगणना – दिन, सप्ताह, मास , वर्ष तथा इनके नाम जानना और लिखना। घङी में समय देखना आदि का ज्ञान संख्यात्मक ज्ञान में आता है। जीवन के व्यवहार में इसका उपयोग (Data handling) करना आना ही गणित सीखना है। कक्षा द्वितीय तक बच्चे को इतना सब सीखाना चाहिए।

प्राय: देखा जाता है कि गणित जैसे विषय से बच्चे बाल्यकाल से ही भयभीत रहते है। लेकिन शिक्षण यदि मनोवैज्ञानिक विधि से क्रियाकलाप आधारित होगा तो ऐसा भय बच्चे में कभी नहीं समाएगा। गणित से बुद्धि व्यवस्थित एवं विकसित होती है और अन्य विषय सीखने में भी यह व्यवस्थित बुद्धि सहयोगी बनती है। अतः भाषा और गणित की इस मूलभूत अवस्था पर विशष ध्यान देना अनिवार्य है। भाषा का संस्कारित होना एवं बुद्धि व्यवस्थित होना ही व्यक्तित्व विकास के मापदण्ड हैं।

महात्मा गांधी जी ने कहा है कि प्राथमिक स्तर पर पाठयक्रम क्रिया आधारित होना चाहिए। विद्यार्थियों को संकल्पनाओं का ज्ञान होना चाहिए। इससे अमूर्त, तर्क तथा अव्यवहारिक शिक्षा की अपेक्षा बुद्धि कौशल का विकास हो सकेगा।

(लेखिका शिशु शिक्षा विशेषज्ञ है और विद्या भारती उत्तर क्षेत्र शिशुवाटिका विभाग की संयोजिका है।)

और पढ़ें : शिशु शिक्षा-13 (दश वर्षाणि ताङयेत्)

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *