बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-27 (21वीं सदी के अभिभावकों की शिक्षा)

 – रवि कुमार

‘अभिभावक’ शब्द पर विचार करते हैं तो ध्यान में आता है माता-पिता। एक शब्द और चलता है – ‘पाल्य या पालक’ अर्थात् पालन करने वाले। तीनों शब्दों में संकेत माता-पिता की ओर जाता है। 21वीं सदी के अभिभावक जब कहते हैं तो ध्यान में क्या आएगा? वर्ष 2021 चल रहा है। इस समय विद्यालय में जो बालक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं वे सब 21वीं सदी के विद्यार्थी हैं और उनके अभिभावक 21वीं सदी के अभिभावक।

अभिभावक शिक्षा

बालकों की शिक्षा की चर्चा तो आवश्यक है और वह चर्चा सूक्ष्म रूप में होती है। परन्तु ये अभिभावक शिक्षा क्या है? यह एक अलग प्रकार का प्रश्न अवश्य है। आज अभिभावकों से सब बालकों के सम्बन्ध में चर्चा करते हैं तो वे बालकों सम्बन्धी अनेक विषयों को लेकर दिग्भ्रमित दिखाई देते हैं। अभिभावकों के मन में अनेक प्रकार के प्रश्न रहते है जिनका उन्हें उत्तर चाहिए। बालकों के विषय में कुछ विषयों को लेकर ये सोचते हैं कि क्या करें? इस प्रकार की चर्चा से ध्यान आता है कि उनके प्रश्नों का उत्तर यदि उन्हें मिल जाए एवं बालकों के सम्बन्ध में वे जो दिग्भ्रमित है उन्हें दिशा मिल जाए तो बालकों के विकास की गति अच्छी हो सकती है। बालकों के सम्बन्ध में अभिभावकों का दिशा-दर्शन ही अभिभावक शिक्षा है।

21वीं सदीं के अभिभावकों की शिक्षा क्यों

20वीं सदीं गए 20 वर्ष ही हुए हैं। परन्तु 20वीं सदीं व 21वीं सदीं में अन्तर एक शताब्दी यानि 100 वर्षों का है। इन 20 वर्षों में बहुत अंतर आया है। परिवारों की स्थिति का ध्यान करेंगे तो संयुक्त परिवार एकल परिवारों में बदले हैं। एकल यानि माता-पिता व बालक। संयुक्त परिवार कहीं-कहीं देखने को मिलता है। आजकल एक और शब्द चल पड़ा है – न्यूक्लीयर फैमिली, ये न्यूक्लीयर फैमिली क्या हैं? एक न्यूक्लीयर में एक न्यूटॉन, एक प्रोटॉन व एक इलेक्ट्रान होता है। आजकल एकल परिवार का रूप भी बदला है। न्यूक्लीयर फैमिली अर्थात माता-पिता और एक बालक। संयुक्त परिवार में बालक की चिन्ता करने वालों में माता-पिता, दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई रहते हैं। सामाजिक ताना-बाना बदला है। पूर्व में पड़ोसी व मोहल्ले वाले भी चिन्ता करते थे। आज केवल माता-पिता और उनमें से भी केवल माता चिंता करती है, अनुभव के आधार पर ऐसा कह सकते हैं। संयुक्त परिवार रहने से अभिभावक की भूमिका की जानकारी और प्रशिक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। आज इस विषय में कठिनाई है। सामाजिक ताना-बाना बदलने से अगली पीढ़ी को जो मिलना चाहिए वह नहीं मिल रहा।

21 वीं सदी के अभिभावकों के सामने चुनौतियाँ

21वीं सदी की चुनौतियाँ भी अलग हैं। मोबाइल, टी.वी., इंटरनेट यह 20वीं सदीं में नहीं था। आज इसका प्रभाव अधिक दिखाई देता है। करियर व प्रतियोगिता की अधिक चर्चा व इन विषयों का बालक पर दबाव अधिक है। न्यूक्लीयर फैमिली में अधिक संभाल भी समस्या उत्पन्न करती है।

आज नई पीढ़ी के अभिभावक से जब चर्चा करते हैं तो वह कहता है – आज पहले जैसा नहीं है, युग बदला है। पहले बड़े परिवार होते थे। आज एकल परिवार हैं। पहले माता-पिता पढ़े-लिखे कम होते थे, आज सभी शिक्षित हैं। पहले शिक्षा की जागरूकता नहीं थी,  आज परिवार एवं समाज में शिक्षा की जागरूकता बढ़ी है। पहले शिक्षा के अवसर कम थे या ना के बराबर थे, शिक्षा केन्द्रों की उपलब्धता कम थी, आज शिक्षा के अवसर एवं शिक्षा केन्द्रों की उपलब्धता बढ़ी है। इन सब बातों से तो स्पष्ट हो ही जाता है कि आज पहले जैसा नहीं है, युग बदला है। फिर युग बदला है तो चुनौतियाँ बढ़ी हैं। हर काल में अलग-अलग चुनौतियाँ होती हैं। चुनौतियाँ बढ़ती नहीं बल्कि बदलती है। हाँ, चुनौतियाँ का बढ़ना या न बढ़ना इस बात पर निर्भर करता है कि चुनौतियों का सामना करना व मार्ग निकालना इसकी सिद्धता है या नहीं और है तो सिद्धता कैसी है?

एक व्यक्ति मिलने के लिए आए। वे एक विद्यालय का संचालन करते हैं। उनसे चर्चा हुई कि आजकल शिक्षा का रुझान कैसा है? उनका तुरंत उत्तर था कि आजकल शिक्षा का विषय मोबाइल ने गड़बड़ कर दिया है। बालक घर जाकर मोबाइल में लगा रहता है। पढ़ाई में उसकी एकाग्रता ही नहीं बनती। बालकों में चर्चा का विषय ही मोबाइल रहता है। घर में वह इस ताक में रहता है कि कब मुझे मोबाइल मिले और आज के समय में बालक को मोबाइल से दूर भी नहीं कर सकते। नई टेक्नोलॉजी है, उसे सीखना व उपयोग करना भी आवश्यक है। क्या करें समझ ही नहीं आता? अभिभावकों से पूछते है कि घर में टी0 वी0 देखते हैं? उत्तर है कि देखते हैं। कितना समय और क्या देखते हैं? उत्तर में- “कितना समय तो जब चाहे तब देखते हैं, और कार्टून ज्यादा देखते हैं, उन्हें यह पंसद हैं”। कुछ समय पश्चात् अभिभावक को ध्यान में आता है कि बालक के स्वभाव में परिवर्तन आ रहा है, वह जल्दी उत्तेजित हो जाता है। बालक पलट कर उल्टा-सीधा जवाब देता है। ऐसा क्यों हो रहा है और इसे कैसे ठीक करें, समझ में नहीं आता।

बालक घर में नित नई माँग करता है। अपने लिए व घर के लिए ये चाहिए, वो चाहिए, उस ब्रांड की चाहिए, इस ब्रांड की नहीं चाहिए। अभिभावक सोचते है इतनी छोटी अवस्था में बालक को इतनी सारी बातें कैसे पता होती हैं?और इतनी सारी माँग और महंगे ब्रांड परिवार के बजट से बाहर हैं यह बालक को कैसे समझाएँ? एक घर में पिताजी ने बड़े पुत्र से कहा, “बेटा एक गिलास पानी लाना”। पुत्र की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं। तीन-चार बार कहने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई और ना ही एक गिलास पानी आया। अब छोटे पुत्र ने कहा, “पिताजी, आपको तो पता है बड़ा भाई कुछ काम नहीं करता। आप ऐसा करिए, स्वयं जाकर पानी पीजिए और एक गिलास पानी मेरे लिए भी लेते आइए।’

अभिभावक सोचते हैं कि बालक छोटे-छोटे काम क्यों नहीं करते, बड़ों का कहना क्यों नहीं मानते? कभी-कभी अभिभावकों के मन में प्रश्न आता है, “बालक बड़ा हो रहा है, विशेषकर जब वह कक्षा 9 से 12 में होता है, उस अवस्था में हमारी बात क्यों नहीं मानता? कुछ भी कार्य करना है, कहीं भी आना-जाना है, हमसे न पूछता है न बताता है। हमारे नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है। ऐसा क्यों हो रहा है? जबकि हमने बचपन से अब तक उसकी सब बातों का ध्यान रखा है। उसकी हर माँग को पूरा किया है। उसने मुँह से निकाला नहीं और हमने पूरा किया। फिर भी ऐसा क्यों हो रहा है, समझ में नही आता।

कभी-कभी बालक के सम्बन्ध में ध्यान आता है कि वह जल्दी-जल्दी अस्वस्थ हो रहा है। इस कारण से विद्यालय से बार-बार अवकाश लेना पड़ता है। बालक के अध्ययन पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। डॉक्टर से चर्चा करते हैं कि ऐसा बार-बार क्यों होता है, तो ठीक उत्तर नहीं मिलता। फिर बालक के प्रति धारणा बन जाती है कि ये जल्दी अस्वस्थ होता ही है। जब ऋतु बदलती है तो अस्वस्थ होना ही है। अस्वस्थ जल्दी क्यों हो रहा है अथवा जल्दी अस्वस्थ न हो इसके बारे में समझ में नहीं आता। एक स्थाई विषय ‘जल्दी अस्वस्थ होना’ जीवनकाल में जुड़ जाता है।

उपरोक्त सब बातें हमारे सामने 21वीं सदी की चुनौतियां के रूप में खड़ी हुई हैं। ऐसे में अभिभावकों का प्रबोधन अति आवश्यक हो जाता है। पूर्व में प्रबोधन परिवार व समाज करता था, आज नहीं करता। अतः यह दायित्व विद्यालय पर आ गया है। आज अभिभावकों की शिक्षा 21वीं सदीं की चुनौतियों को ध्यान में रखकर करना समाज व युग की आवश्यकता हो गई है।

(लेखक विद्या भारती हरियाणा प्रान्त के संगठन मंत्री है और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य है।)

और पढ़ें : बाल केन्द्रित क्रिया आधारित शिक्षा-26 (कौशल विकास)

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