बाल साहित्य के प्रचलित मुहावरे बदलने होंगे


-डॉ. विकास दवे

बाल साहित्य जगत में विगत 13-14 वर्षों से आना-जाना होता है। अनेक कार्यक्रम, गोष्ठियाँ, सम्मान समारोह, सेमीनार, विमोचन, समीक्षा आयोजन आदि में उपस्थित रहने का और देश के ख्यातनाम वरिष्ठ बाल साहित्यकारों से मिलने और सुनने का अवसर भी आता है। कुछ बातें जो मुझ जैसे कम आयु वाले व्यक्ति के ध्यान में आई हैं, उन्हें आप सबके साथ बांटने की इच्छा से ही लेखनी उठाई है। सर्वप्रथम मैं चर्चा कर रहा हूँ उन मुहावरों की जो बाल साहित्य जगत में जस के तस एकाधिक व्यक्तियों द्वारा उपयोग किए जाते हैं लेकिन उन मुहावरों में समय और परिस्थितियां परिवर्तन की अपेक्षा रखती हैं।

बालक मिट्टी का लौंदा है – प्रकारांतर से कहें तो बालक पिघला हुआ मोम है जिसे जिस पात्र में डालें, वह वैसा ही आकार ले लेगा। वह ऐसी गिली मिट्टी है जिसे हम यानी बाल साहित्यकार चाहे जैसा आकार दे सकते हैं। अब यदि हम भारतीय दर्शन का अध्ययन करें तो ध्यान में आता है कि प्रत्येक मनुष्य में एक आत्मा है जो परमात्मा का अंश है। जो अंश हममें है, वही बालक में भी है। ऐसे में एक अंश दूसरे अंश के निर्माण या आकार देने का दंभ कैसे भर सकता है। हाँ! बाल साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से बालक की अन्तर्निहित शक्तियों और प्रतिभाओं को उभारने का कार्य अवश्य कर सकता है। यह सब होगा एक उत्प्रेरक के भाव से, निर्माता के भाव से नहीं।

अहिंसा सदैव हिंसा से श्रेष्ठ है – अहिंसा शब्द के मोहपाश में हमारा देश आदिकाल से बंधा रहा है। स्वातंत्र्य आंदोलन में इस शब्द को और नए आयाम मिल गए। उसी मोहपाश के परिणाम स्वरुप बाल साहित्य में हिंसा का पूर्ण निषेद घोषित कर दिया गया। यह घोषणा सिद्धान्ततः आधे-अधूरे रुप में लागू हो पाई। हमने बालक को जितना हिंसा से दूर रखने का प्रयत्न किया, वह उतना ही उसकी ओर आकर्षित होता गया।

आज बालक खिलौनों में सर्वाधिक बन्दूक को पसंद करता है। हिंसक कॉमिक्स पात्र उसका आदर्श हो गए हैं। काश हम प्रारंभ से उसे हिंसा की सात्विकता से परिचित करा पाते। उसे बताते कि राम द्वारा ताड़का जैसी स्त्री के प्रति हिंसा, खर-दूषण का वध, रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के वध उचित हिंसा के परिणाम थे। कृष्ण का पूरा बचपन इसी सात्विक हिंसा से ओत-प्रोत रहा। पूतना से लेकर कंस, जयद्रध तक सारी हत्याएं (यही तो वध का पर्याय है) उचित थीं। आजद, भगतसिंह, सुखदेव, राजगुरु ही नहीं नन्हें खुदीराम तक के द्वारा की गई हिंसा अहिंसा के सारे सिद्धांतों से अधिक अनिवार्य थी। शायद तभी नई पौध सच्चे अर्थों में अहिंसक बन पाती।

क्रोध भी हर समय बुरा नहीं – हिंसा की ही तरह क्रोध भी आज के बच्चों के जीवन का अनिवार्य हिस्सा हो गया है। जो बच्चे क्रोध रहित हैं वे चंचलता विहीन भी हैं। अभिभावक अपने बच्चों के इस दब्बूपन से परेशान हैं। क्या ही अच्छा हो बालक सात्विक क्रोध के महत्व को जाने। देश की ओर उठने वाली हर टेढ़ी नजर को ऊंगली डालकर आँखे निकालकर समाप्त करने की सिद्धता प्रत्येक बच्चे की हो।

क्रोध के लिए ‘मन्यु’ शब्द पर्याय स्वरुप प्रयोग होता है। यह मन्यु यदि देश और परिवार के स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्रकट होता है तो वह अभिमन्यु हो जाता है। क्या आज के बच्चे हमें ‘अभिमन्यु’ की तरह तेजस्वी नहीं चाहिए?

बाल साहित्य की रचना परकाया प्रवेश की प्रक्रिया है – यह श्रृंगारित वाक्य आज बाल साहित्य जगत में बड़े जोर-शोर से उपयोग किया जा रहा है। बड़ी आयु का बाल साहित्यकार ‘परकाया प्रवेश’ का मुहावरा सुनाकर यह सिद्ध करना चाहता है कि वह अपनी अनुभवी आत्मा को बालक के शरीर में प्रवेश कर रही अनुभव कर श्रेष्ठ बाल साहित्य रच लगेगा। इस प्रपंच में वह यह भूल जाता है कि अच्छे बाल साहित्य की रचना के लिए केवल देह नहीं आत्मा भी बच्चे की (बाल सुलभ) चाहिए। यदि केवल देह की लघुता ही अनिवार्य होती तो क्या सर्कस का जोकर एक श्रेष्ठ बाल साहित्यकार सिद्ध नहीं होता? वास्तव में बाल साहित्यकार को केवल कार्यों से नहीं पूरे मन से बच्चा होने का प्रयत्न करना होगा तभी वह बाल मन का रचयिता बन सकेगा।

बाल साहित्यकारों को ज्यादा पढ़ें – अकसर बाल साहित्य अधिक मात्रा में छपने किन्तु कम मात्रा में पढ़े जाने का उल्लेख अत्यन्त कष्ट के साथ किया जाता है। मुझे तो लगता है बाल साहित्यकार को पढ़ने से अधिक उससे मिलना आवश्यक है। यूं तो अनेक साहित्यकारों के जीवन की संध्या सुनी-सुनी सी बिती है लेकिन मैं एैसे अनेक बाल साहित्यकारों से परिचित हुआ हूँ, जो जीवन के उत्तरार्द्ध में पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक संघर्षों के कठिन दौर से गुजर रहे हैं। कहीं-कहीं तो इन संघर्षों ने उन्हें एकान्तवासी और मनोरोगी तक बना दिया है। उनकी लिखी-छपी 400-500 तक पुस्तकें अलमारियों की शोभा बनी है। क्या उनसे प्रेम से मिलना और कुछ घंटे बतियाना कोई छोटा काम होगा?

फिल्में बच्चों को बिगाड़ती हैं – हम सब पठन और स्वाध्याय को अधिक महत्व देने के चक्कर में कभी-कभी दृश्य माध्यमों के कुछ ज्यादा ही विरोधी हो जाते हैं। लेकिन हर साहित्यकार चाहता है उसकी रचना पर धारावाहिक या फिल्म बने। क्या प्रत्येक बाल फिल्म और धारावाहिक पहल बाल साहित्य नहीं है? उदाहरण स्वरुप सई परांजपे की फिल्म ‘चकाचक’ की लोकप्रियता। ‘चकाचक’ अब फिल्म नहीं एक बाल आंदोलन का रुप धारण कर चुकी है। पर्यावरण और स्वच्छता का ऐसा पाठ आज तक बाल साहित्य की कोई पुस्तक नहीं पढ़ा पाई। हैरी पॉटर से प्रभावित होकर अंधविश्वासी हो रही पाश्चात्य बाल पौध से भारत की पर्यावरण प्रिय और स्वच्छता प्रिय नई पौध की तुलना करके देखिए। क्या अब भी हम इन माध्यमों को बस कोसते ही रहेंगे?

बाल साहित्य और रचना कर्म के लक्ष्य की पवित्रता – आज हर छोटे-बड़े आयोजन में वरिष्ठ बाल साहित्यकार यह कहते पाए जाते हैं –

  1. हमारा बसों में किराया माफ होना चाहिए ताकि हम अधिक से अधिक प्रवास कर सकें।
  2. रेल मंत्री से मिलकर हमारा रेल किराया माफ करवाने का प्रयत्न करेंगे।
  3. बाल साहित्यकारों को विधान परिषद ओर राज्यसभा की मानद सदस्यता मिलनी चाहिए।

ऐसी और इससे मिलती जुलती अनेक आकांक्षाएं बाल साहित्यकारों के मन में बलवती होती  दिखाई देती हैं। ये वरिष्ठजन नवोदित बाल साहित्यकारों के समक्ष क्या उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं? क्या बाल साहित्य की रचना इन्हीं ओछी सुविधाओं के लिए करना प्रारंभ किया था? क्या लक्ष्यों की पवित्रता समाप्त हो जाने पर साधन (बाल साहित्य) की पवित्रता बनी रह सकेगी? क्या इन दमित इच्छाओं को इस प्रकार प्रकट करना नई पीढ़ी के लिए लाभदायक होगा?

बाल कल्याण की गतिविधियां आज देशभर में अच्छे प्रमाण में संचालित हो रही हैं। यदि यह प्रमाण कुछ कम भी हो तो किसी को कोसने की आवश्यकता नहीं। भले ही हिमालय की ऊँची चोटी पर चढ़ना हो, कदम तो वही 30 इंच का ही बढ़ाना पड़ता है। आज चल रहे, कार्य ऐसे कई 30 इंच के कदम उठने जैसा है। लक्ष्य पवित्र रहा तो महामहिम पूर्व राष्ट्रपति डॉं. ए.पी.जे. अब्दूल कलाम द्वारा 2020 तक भारत के विकसित राष्ट्र होने के स्वप्न को साकार करने में एक बड़ा योगदान बाल साहित्य जगत देगा। आवश्यकता है बाल साहित्य जगत के प्रचलित मुहावरों को बदलने की।

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(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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