पुस्तक परिचय : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, पांचवां ग्रन्थ – वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा


 – वासुदेव प्रजापति

पुस्तक का नाम : भारतीय शिक्षा ग्रंथमाला, पांचवां ग्रन्थ वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा

लेखन एवं संपादन : इंदुमति काटदरे, अहमदाबाद

सह संपादक : वंदना फड़के नासिक, सुधा करंजगावकर अहमदाबाद, वासुदेव प्रजापति जोधपुर

प्रकाशक : पुनरुत्थान प्रकाशन सेवा ट्रस्ट, अहमदाबाद वेबसाइट – www.punarutthan.org

संस्करण : व्यास पूर्णिमा, युगाब्द, 9 जुलाई 2017

यह तो आप भी चाहेगें कि…..

भारत पुनः विश्वगुरु बनें।

भारतीय ज्ञान चराचर जगत का कल्याण करने वाला हो।

विश्व के सभी देश अज्ञान, गरीबी, असमानता, हिंसा, आतंकवाद जैसे संकटों से मुक्त हों।

भारतीय शिक्षा इन सभी संकटों का निवारण बतलाये।

भारत ने पूर्व में विश्व का मार्गदर्शन किया है, अब पुनः करे।

आज फिर से भारत शिक्षा के माध्यम से विश्व को संकट मुक्त करने की भूमिका निभाए।

भारत आज विश्व का नेतृत्व करने की स्थिति में है, अतः भारत के नेतृत्व में विश्व सुख, शान्ति व समृद्धि की दिशा में अग्रसर हों।

एक भारतीय होने के नाते हम सबका कर्तव्य बनता है कि विश्व स्तर पर भारत अपनी भूमिका निभाने में समर्थ हों। हम भारत की भूमिका को भली-भाँति समझें। भारत की भूमिका समझने में भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला का यह पाँचवा ग्रन्थ पढ़ना बहुत उपयोगी सिद्ध होगा। आओ! हम इस ग्रन्थ का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करें।

पाँचवा ग्रन्थ – वैश्विक संकटों का निवारण भारतीय शिक्षा

इस अन्तिम ग्रन्थ में यह समझाया गया है कि भारत का मूल चिन्तन वैश्विक है, फलतः भारतीय शिक्षा भी विश्व कल्याणक है। इस विश्वकल्याणक पांचवें ग्रन्थ का परिचय यह है।

इस ग्रन्थ में कुल छः पर्व हैं। पहला पर्व अन्तजलि (Internet) पर दी हुई विश्व की वर्तमान स्थिति को दर्शाता है, जैसेः- विश्व का मानचित्र, महाद्वीपशः देशों की सूची, संयुक्त राष्ट्र संघ एवं उसकी संस्थाये, सूचकांक जैसे- मानव विकास सूचकांक, शांति सूचकांक, प्रगति सूचकांक, गरीबी सूचकांक, सुखी सूचकांक तथा पर्यावरण सूचकांक आदि। धार्मिक आबादी की सूची, प्रशासनिक व्यवस्थानुसार देशों की सूची, वैश्विक आर्थिक असमानता, अंतर्राष्ट्रीय रेकिंग की सूची, वैश्विक लिंगगेप रिपोर्ट एवं विश्व खुशी रिपोर्ट दी गई है।

पर्व दो में विश्वस्थिति का आकलन किया गया है। वर्तमान में वैश्विक परिस्थिति क्या व कैसी है? राजनीतिक प्रवाह कौन-कौन से हैं? ‘द प्रिजन’ पुस्तक का सांराश देते हुए बताया गया है कि अमेरिका स्वयं एक समस्या है। आर्थिक हत्यारे की स्वीकारोक्ति एवं अमेरिका का एक्सरे इसके प्रमाण हैं। अन्त में नव साम्यवाद के लक्षण एवं स्वरूप बतलाते हुए राष्ट्रवाद की पश्विमी संकल्पना बतलाई गई है।

पर्व तीन में वैश्विक संकटों का विश्लेषण किया गया है। संकटों का मूल कहाँ है, संकेन्द्री दृष्टि अनर्थक अर्थ में है। आधुनिक विज्ञान एवं गुलामी का समान आधार व कट्टरता की विवेचना करते हुए वैश्विक समस्याओं के स्रोत, युरोपीय आधिपत्य के पाँच सौ वर्षों का इतिहास तथा जिहादी आतंकवाद को उजागर किया गया है।

पर्व चार में भारत की भूमिका स्थापित की गई है, जिसके मुख्य बिन्दु ये हैं- भारत की दृष्टि से देखे, मनोस्वास्थ्य प्राप्त करें, संस्कृति के आधार पर विचार करें, समाज को सुदृढ़ बनाये, आर्थिक स्वतन्त्रता की रक्षा करें तथा युगानुकूल पुनर्रचना करें।

पर्व पाँच में भारतीय शिक्षा की भूमिका बतलाई गई है। भारतीय शिक्षा का स्वरूप बतलाते हुए विश्व को भारतीय शिक्षा अपनाने की बात सुझाई है। अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय का वास्तविक स्वरूप बतलाते हुए प्रशासक और शिक्षक संवाद दिया गया है, साथ में शिक्षक, प्रशासक व मंत्री के वार्तालाप के माध्यम से सबकी भूमिकाओं को स्पष्ट किया गया है। अन्त में हिन्दू धर्म में समाज सेवा को क्या स्थान है? यह बतलाया गया है।

पर्व छः में विविध सामग्री के माध्यम से ग्रन्थ का समापन किया गया है। विविध सामग्री में एक सर्वसामान्य प्रश्नोत्तरी है, विविध आलेख है और पुनरुत्थान विद्यापीठ की समग्र शिक्षा योजना देकर ग्रन्थ को पूर्णता प्रदान की गई है।

फलश्रुति – इस ग्रन्थ को पढ़ने वालों की दृष्टि ‘सर्वभूत हितेरत:’ की बन जायेगी, वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की भावना से अपना जीवन ‘सर्वेभवन्तु सुखिनः’ सम्पूर्ण मानवता के कल्याण में लगायेगा।

फलश्रुति- यह तो ‘भारतीय शिक्षा ग्रन्थमाला’ के पाँचों ग्रन्थों का परिचय मात्र है। जब आप इन ग्रन्थों को पढ़ना प्रारम्भ करेंगे तो निश्चय ही है आपको यह अनुभूति होगी कि ज्ञान का आनन्द अन्य सब आनन्दों से परे है, वह तो आत्मानन्द है।

इति

(लेखक शिक्षाविद् है, इस ग्रन्थमाला के सह संपादक है और विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के सह सचिव है।)

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