पाती बिटिया के नाम-5 (स्वातंत्र्य यज्ञ की वेदी पर वे प्रथम आहूतियाँ)


 – डॉ विकास दवे

प्रिय बिटिया!

सन् 1857, मार्च का महिना, गाँव-गाँव में पता नहीं क्या चल रहा है? कोई, एक अपरिचित-सा व्यक्ति गाँव में आता है और कपड़े से ढकी कोई वस्तु देकर लौट जाता है। यह क्रम हर गाँव हर कस्बे में जारी है। खुसुर-फुसुर होती है और पता लगता है रोटी और कमल आए हैं। ये संकेत हैं क्रांति की शुरूआत के।

पता नहीं क्या है इस संकेत में कि जन-जन में क्रांति का लावा उबलने लगता है? हर व्यक्ति, हर बच्चा, हर माँ-बहन अपनी माँ भारती की वर्षों की गुलामी की जंजीर तोड़ देने को आतुर हो उठते हैं। हर कोई चाहता है आज और अभी गोरों पर टूट पड़े अपनी बन्दूक और तलवार लेकर, लेकिन बुजुर्गों की चेतावनी कानों में गूंजने लगती है- “खबरदार! समय से पहले हमारे व्यवहार और बातचीत में भी आभास न हो कि एक ही दिन और एक ही समय हम सब क्रांति करने वाले हैं।”

लेकिन ऐसी सारी चेतावनियों के बाद भी अंग्रेजी सेना का एक जाँबाज सिपाही अपना धैर्य खो बैठा 29 मार्च 1857 को। पांचवी कम्पनी की 34वीं रेजीमेन्ट में उसका क्रमांक था 1446 । उस दिन काल टहलता हुआ, उसी रेजीमेन्ट में चला आया था मंगल पाण्डे के रूप में। विकराल रूप धारण किए ललकारता मंगल जैसे ही आगे बढ़ा, मेजर हृयूसन ने उसका रास्ता रोका और मंगल की बन्दूक ने क्रांति यज्ञ में पहली आहूति दे दी। यह आहुति थी मेजर हृयूसन की। ऐसा लगता था मानों बन्दूक से धाँय नहीं ‘स्वाहा’ का स्वर निकला हो। इसके बाद तो लेफ्टिनेण्ट बॉब पहुँचा। मंगल पाण्डे की तलवार के एक ही वार ने बॉब की एक भुजा काटकर उसे काल की प्यास बुझाने के लिए रक्त की नदी में लौटने पर मजबूर कर दिया।

अभी यह ‘स्वाहा’ की ध्वनि गूंज ही रही थी कि एक और गोरा आगे बढ़ा तब तक मंगल के साथी ने उसकी खोपड़ी पर बंदूक का वार किया और फिर ‘स्वाहा’। अब कर्नल ब्हीलर का क्रम था लेकिन वह तो इस सिंह की दहाड़ सुनकर ही सैनिकों सहित भाग खड़ा हुआ। इस सब के बाद मंगल अपनी गति, गौरौं के हाथों नहीं बिगाड़ना चाहता था इसलिए उसने अपनी बन्दूक छाती से अड़ाकर गोली चला ली। गोली भी शायद भयभीत थी इस नरसिंह से, इसीलिए वह पसली की तरफ फिसल गई। वह पकड़ लिया गया।

अंग्रेजों के लाख प्रयत्न के बाद भी उसने क्रांति योजना और साथियों की कोई जानकारी नहीं दी। अदालत में न्याय के नाटक के बाद उसे फाँसी की सजा दी गई। बैरकपुर में कोई ऐसा जल्लाद नहीं था जो इस महाकाल का काल बनने को तैयार होता। कलकत्ता से आयातीत जल्लादों ने अंतत: 8 अप्रैल 1857 को इस विद्रोही वीर की देह को मृत्यु दे दी लेकिन उसकी आत्मा के साथ अभी अनेकों आहुतियाँ दी जानी शेष थी। बाद के वर्षों के स्वातंत्र्य यज्ञ में हर ‘स्वाहा’ के साथ एक ही नाम हृदय में चेतना फूंकता रहा – मंगल पाण्डे।

  • तुम्हारे पापा

(लेखक इंदौर से प्रकाशित ‘देवपुत्र’ सर्वाधिक प्रसारित बाल मासिक पत्रिका के संपादक है।)

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